ताटंक छंद / बाल कविता
पापा मुझको बैठा देना, मोटे काले हाथी में।
पीठ चढूँगा मजे कहूँगा, अपने सारे साथी में।
नहीं मिले जब काला हाथी, बैठा देना घोड़े में।
या फिर खुद बन जाना घोड़ा, खुश होऊँगा थोड़े में।
खेल खिलौने रंग बिरंगे, मन को मेरे भाते हैं।
मोटर गाड़ी बड़े सुहाने, सपने में भी आते हैं।
लेते आना खूब मिठाई, आप जहाँ भी जाते हैं।
जैसे माँ की सारी चीजें, आप ढूँढ कर लाते हैं।
आप लौटना जब दफ्तर से, टिकटें भी लेते आना।
पापा मुझको फिल्म दिखाना, चिडिय़ा घर भी घूमाना।
दिन छुट्टी का मेरा हो जब, घर आये नानी नाना।
फूल दिखाने सैर कराने, सुंदर उपवन ले जाना।
थक जाऊँ गर उपवन में, फिर भी झूला झूलाना।
साँझ ढ़ले जब भूख लगे तब, वापस घर में ले आना।
मजा खूब ही आता है जब, साथ घूमने जाते हैं।
इसी बहाने प्यार आपका, हम सब ढ़ेरो पाते हैं।
ललित साहू "जख्मी", छुरा
जिला- गरियाबंद (छ.ग.)

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