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Saturday, 1 October 2016

उड़ जाही हंसा   गीत 


कतको कर ले जतन तेहं तनके,
उड़ जाही ये हंसा अपन मन के ।
चाहे बांध ले..२ चाहे बांध ले
गेरवा म जकन के
उड़ जाही ये पंछी अपन मन के।
करिया गोरिया काया पाके,मोहमाया म लटपटागे।
जनम देवईया दाई ददा के,
सेवा  करे बर भुलागे ।
चाहे धांध ले...२चाहे धांध ले
सोना के भवन मे, उड़ जाही ये पंछी अपन मन के ।
कतको करले जतन......।
नरवा नदिया तरिया पोखर,
सागर म मिल जाही ।
ये तन तो हे फूल बरोबर,
बिनहा खिले अउ संझा मुरझाही ।
नई हे नई हे...२ भरोसा ये जीवन के,
गाले गाले गुन हरि भजन तें ।
कतको करले जतन तेहं तनके,
उड़ जाही ये हंसा अपन मनके ।

दीनदयाल टंडन
शास.उ.मा.वि.पीपरछेड़ी  छुरा

पावन धरा

धरा के कण-कण में बिखरी,
  शोभा सुंदरता खूब निराली।
चहुँ ऒर आकर्षित करती,
  नयनों को इसकी हरियाली।

गगनचुम्बी मुकुट सा पर्वत,
  कल-कल बहती नदियोँ का पानी।
मोर पपीहे कोयल की राग,
  कहती इसकी अद्भुत कहानी।

ऋषि मुनि जहां करते नित्य,
    यज्ञ हवन मंत्रो का जाप।
घुल जाती हवा में जिनके,
   सुरस अभिमंत्रित वेदों का आलाप।

मैदानों में जहां बसी सभ्यता,
    विकास की राह गढ़ी है।
संघर्षो से आगे होते,
   संस्कृति जीवन तक बढ़ी है।

महापुरुषो वीर बलिदानियों का,
   अनुपम है उनकी गाथा।
दिल में जिसको दे सम्मान,
   नित झुकते सबका माथा।

हरी-भरी धरती की गोदी,
  मानव इसको क्यों उजाड़ा है।
स्वार्थवस अंधे होकर फिर,
  बनाया कारखानो का अखाड़ा है।

उजड़ी बिखरी प्रकृति को,
  फिर से हमे सजाना होगा।
कर संकल्प दृढ़ होकर,
  धरती को स्वर्ग बनाना होगा।

देवनारायण यदु
पंडरीपानी लोहझर
गरियाबंद 36गढ़

वीर शहीदों को श्रद्धांजलि

उम्र भर बहने वाले आंसू,
शहीद की बेवा के होंगे।
बस कुछ ही दिन बातें,
भारत माँ की सेवा के होंगे।
         मतलब की राजनीति में,
         सच्ची शहादत धूल जायेगी।
         जवानों की कुर्बानियों को,
         जनता जल्द ही भूल जायेगी।
समाजसेवी देंगे श्रद्धांजलि,
फोटो अपनी बड़ी खिंचवायेंगे।
कभी वोट कभी चंदे के लिए,
नाम शहीदों का भुनायेंगे।
         सब हांथ बांधे ऐसे ही बैठे रहो,
         आतंकी करतूत अपनी दोहरायेंगे।
         लाशें नोचने गिद्ध सारे के सारे,
         हमारे ही गगन में मंडरायेंगे।
उठो अब सारे बहाने छोंडो,
जवाब एक स्वर में देना होगा।
बारुद से मिले जख्मों का बदला,
हमें भी बारुद से ही लेना होगा।
        पाक खातमे का शोर मचाकर,
        पुरे हिन्दुस्तान को जगाना होगा।
        पीठ पर खंजर घोपने का हश्र,
        कायर पाकिस्तान को बताना होगा।
अब संसद की चर्चा छोंडकर,
सरहद का रुख करना होगा।
अमन की बातें बहुत हो चुकी,
अब सीने में बारुद भरना होगा।
         ।। वन्दे मातरम ।। जय हिन्द ।।
ललित साहू "जख्मी" छुरा
जिला- गरियाबंद (छ.ग.)

मैं और क्या कहूं ?

        जानते हो जहर है, फिर भी,
        नशे के तुम आदी हो गए।
        खोखली बातों मे उलझकर,
        जवानी में उन्मादी हो गए।
आचरण अपना गिराकर,
तुम धन तो बहुत कमाते रहे।
ज्ञान और पद का रौब हमेशा,
अपनो को ही दिखाते रहे।
          गुरु को, गुरु ना समझा,
          माँ-बाप को भी दुत्कारते रहे।
          गौ माता को तुमने तरसाया,
          और कुत्ते को पुचकारते रहे।
तुम्हारी इस हरकत पर
बताओ.! मैं और क्या कहूं ?
          जब तुम खुद ही नही चाहते,
          कि मैं जिन्दगी की बात सिखूं।
तो भला मुझे क्या पड़ी है,
जो मैं तुम पर कविता लिखूं।
तुम, सुहाग की निशानी,
सिंदूर को भी छुपाने लगी।
औरत का सबसे मंहगा गहना,
शर्म को भी भुलाने लगी।
         आँचल सर पे रखने से भी,
         अब तुम कतराने लगी।
         किसी असहाय बेवा की तरह,
         बालों को बिखराने लगी।
मम्मी, मॉम मन को भाया,
माँ शब्द से हिचकिचाने लगी।
भारतीयता तुम्हें चुभती है,
और अंग्रेजीयत पर ईतराने लगी।
          तुम्हारी इस हरकत पर,
          बताओ.! मैं और क्या कहूं ?
जब तुम खुद ही नही चाहती,
कि मैं पावन पुनीता दिखूं।
          तो भला मुझे क्या पड़ी है,
          जो मैं तुम पर कविता लिखूं।
अपराधों के बने मूकदर्शक,
शोषण के तमाशबीन हो गयेे।
संबंधों पर किया आघात,
दौलत के आधीन हो गये।
         सच बोलना हो मना जहां,
         वहां मैं अपनी व्यथा कैसे कहूं।
         आलोचनाओं से डरकर मैं,
         चूप भी भला कैसे रहूं।
घुट-घुट कर मरने से अच्छा है,
मैं बेखौफ ही जीना सिखूं।
मेरी भी जिन्दगी सामने खड़ी है,
सोंचता हूं, अब उसी पर कविता लिखूं।

रचना - ललित साहू "जख्मी" छुरा
जिला- गरियाबंद (छ.ग.)

आगे पितर पाख

आगे पितर पाख रे संगी,
पितर देंवता ल परघाबो।
मुहाटी म चऊक पुर के,
अपन पुरखा ल बलाबो।

मुंदरहा ले नदिया जाके,
पितर डुबकी हमन लगाबो।
तिल,जौं,फूल,दुब धर के,
उहें अंजरी म जल चघाबो।

नई करन ये पाख नवा बुता,
जम्मों ल जुन्नहा म पहाबो।
जे पुरखा बिते रीहिस तिकर,
पितर पाख म सोक मनाबो।

एक काड़ी मुखारी,पानी,
अऊ पिढ़ा,लोटा ल मढाबो।
फूल पान गुलाल चघा के,
सरद्धा में माथ ल नवाबो।

खीर,पुरी अऊ बरा रांधबो,
बरी बर उरीद दार बिसाबो।
दार,भात,साग,रोटी के भोग,
तोरई पान म करके लगाबो।

गाय,कौंआ,करिया कुकुर ल,
कलेवा संग जेवन कराबो।
पुरखा जईसन खाये तईसन,
खाबो अऊ सबला खवाबो।

जब जे पुरखा के तिथि आही,
सेवा करके आसिस ल पाबो।
सगा सोदर जम्मों ल नेऊत के,
पुरखा पसंद के जेवन कराबो।

आखिर के दिन, बिदा करके,
पुरखा सुरता म आंसू बोहाबो।
पितर पाख के नेघ ल करके,
पुरखा मन के जीव ल हीताबो।

ललित साहू "जख्मी" छुरा
जिला - गरियाबंद (छ.ग.)

अइसन हमर गाँव

लछमी माता के असीस,धरती दाई के कोरा
सुख शांति जिहाँ डारे हावय सऊहत डेरा
फर फुल ले सुघ्घर लदाये जिहां पेड़ के डाली
अइसन हमर गाँव जिहां चारो कोती हरियाली....

दीया बाती जलय,बैरी अंधियार ला हरय
चन्दा चंदैनी मिल रथिया अंजोर करय
बिहनिया कुकरा बासे,गावय कोयलिया कारी
अइसन हमर गाँव जिहां सुरुज पहली बगराथे लाली.....

माथ मा लगाये बर ऐ माटी चन्दन रोली
गुरतुर गुरतुर इहाँ रहईया मन के बोली
अपन धनहा के किसनहा करय रखवाली
हमर गाँव के सोभा लहलहावत धान के बाली

अपन संसकीरती ला बचा के राखे हे
सभ्यता ला अन्तस् मा बसा के राखे हे
मया के झोली भरे नई हे काकरो खाली
सुघ्घर हमर गाँव जिहां बगरे हे खुसहाली

पहुना के सत्कार करय,सब संघरा रहिथे
बिपत के मार ला घलो मिलजुल के सहीथे
सबला अपन रंग मा रंगाथे इहाँ के होली
जगमग जगमग हमर गाँव के दीवाली...

रेंगथे सब उही रद्दा मा जेला सियान बताहे
अपन देवी देवता ला सब मन मा बसाहे
सब मनौती पूरा होथे जेन माँगथे सवाली
अइसन हमर गाँव जिहां बिराजे महाकाली ..

रचना-देवेन्द्र कुमार ध्रुव (डीआर )
        फुटहा करम बेलर
        जिला गरियाबंद (छ.ग.)

छत्तीसगढ़ बिक्कट खुस हे

गाँव-गली,खेत-खार
नंदिया-नरवा,तरिया पार
इस्कूल-कालेज अउ मैदान
बारी-बियारा,खेंरखाडांर
हाट-बजार,रद्दा-बाट
गऊरा-चौंरा,मंदिर के आंट
मसानगंज ले बरछाबारी
जगा बदलथे आरी-पारी
सब जगा इंकर पहुंच हे
एक रु.डिस्पोजल,दू रु.पानी पाऊच
पाँच रु.के चखना म
छत्तीसगढिया बिक्कट खुस हे!!

छट्ठी-बरही,पूजा-पाठ
बर-बिहाव,मांदी-भात
मरनी-हरनी,मेला-मडई
पिकनिक,पार्टी,जात्रा-पूजई
सांसद,बिधायक से लेके
पंच के चुनई तक
आखरी बेवस्था महुंवा के जूस हे
एक रु डिस्पोजल,दू रु पानी पाऊच
पाँच रु के चखना म छत्तीसगढिया बिक्कट खुस हे!!

ददा,बबा,कका,ममा
लकठा-दूरिहा के जम्मो सगा
सारा-भांटो,मीत-मितान
अरोसी-परोसी,चिन-पहिचान
घराती-बराती अऊ बजनिया
दारु खोजथे सरी मंझनिया
बस अतकीच दुख हे
एक रु डिस्पोजल,दू रु पानी पाऊच
पाँच रु के चखना में
छत्तीसगढिया बिक्कट खुस हे!!

रीझे यादव
टेंगनाबासा(छुरा)

वीर सिपाही

सीने में बारूद भरा,
आँखों में चिंगारी होता है।
मातृभूमि की रक्षा खातिर,
बेख़ौफ़ मौत पर सोता है।

तिरंगे का मान सदा,दिलो में जिनके होता है।
कोई नही ओ मेरे वतन का,वीर सिपाही होता है

प्राणों का जिसको मोह नही,
अमन-शांति का रखवाला है।
सरहद को अपनी जन्नत समझे,
बड़ा ही ओ दिलवाला है।

सबको दे चैन की निद्रा,भले न खुद ओ सोता है।
कोई नही ओ मेरे वतन का,वीर सिपाही होता है।

माँ से बड़ी है मातृभूमि,
मिट्टी का कर्ज चुकाता है।
हँसते-हँसते सिमा पर भी,
प्राणों की बाजी लगाता है।

मिलता है तिरंगे का कफ़न उसे,बड़ा ही किस्मतवाला होता है।
कोई नही ओ मेरे वतन का,वीर सिपाही होता है।

दहाड़ से जिनके आत्म-विश्वास के,
शत्रु रण में टिक न पाते है।
शौर्य और पराक्रम की गाथाएँ जिनके,
दसो दिशाएँ गाते है।

बहादुरी का ओढ़ कवच,दुश्मनो पर भारी होता है।
कोई नही ओ मेरे वतन का,वीर सिपाही होता है।

क्यों महक रही मानवता की बगिया,
सोचो इसका क्या कारण है।
जाकर देखो समरभूमि पर,
शहीदों का रक्त इसका उदाहरण है।

मरकर भी ओ अमर हो जाते,सबके लिए सबक ओ होता है।
कोई नही ओ मेरे वतन का,वीर सिपाही होता है

विनोद यादव
पंडरीपानी लोहझर
गरियाबंद 36गढ़

नवरात्रि मनाबो

कुँवार के सुग्घर महीना आगे,
   सबोके मन कइसे हरियागे।
36गढ़ के माटी पावन होगे,
   माता के दरश मनभावन होगे।

जुरमिल के चलो जसगीत ल गाबो।
चल संगी नवरात्रि मनाबो।
नव दिन नव रात ले मइय्या,
    दरश ल सबला देथे।

भगत के लाज रखे बर दाई,
   दुःख पीरा ल हरथे।
आसथा बिसवास के जोत ल जगाबो
चल संगी नवरात्रि मनाबो।

झांझ मंजीरा मांदर बाजे,
   गली गांव पारा।
जुरमिल सबो लगावत हे,
   माता के जयकारा।

चलो संगी मन के मनौती ल पाबो
चल संगी नवरात्रि मनाबो।
नव दिन के हरे ए सुग्घर तिहार,
मातारानी के हाबे जेमे मया दुलार।

जग के पाप हरे बर दाई,
आथे होके बघवा म सवार |
संझा बिहनिया माँ के आरती ल गाबो।
चल संगी नवरात्रि मनाबो।

रचना- विनोद यादव
पंडरीपानी लोहझर (छुरा)

बेटी

ददा के संसो बेटी ह करथे
अपन लइका संही जतनथे।
होवत बिहनिया,बडे फजर ले
मयारु दाई अस चहा अमरथे।।

नहाये खातिर पानी तिपोथे
जरय झन कइके छुथे-टमरथे।
बेरा नइ चूके,जेवन बनाथे
महतारी कस बइठे मोला जेंवाथे।।

मोर थोरिक रिस ल
अडबड डर्राथे।
चुप हो जा बाबू!
कहिके मनाथे।।

ओकर आँसू
सरी रिस ल बुताथे
का कर डारेंव?
मन बढ पछताथे।।

नान्हे बेटी मोर
अब होगे सजोर!
सगा अगोरत हंव
निहारत हंव खोर!!

कइसे करहूँ
सब किस्मत के लेखी।
पर के हो जाही
मोर मयारू बेटी!

कोने ह अब दसना दसाही
दवई-बूटी ल बेरा म खवाही?
एसो के जाड,जब लाहो लिही
सुन्ना गोरसी ल कोन सिपचाही?

एक नजर देखे बर
आँखी तरसही!
तोर सुरता म बेटी
मोर जीव ह कलपही!
मोर जीव ह कलपही!!!!

रीझे यादव
टेंगनाबासा(छुरा)

नापाक साजिश

यूँ छुपके लड़ाई वो कायर लड़ता है,
वो हमसे खिलाफत की साजिश करता है।

वो हमसे हमेशा ही यारों हारा है,
अब हमको हराने की ख्वाहिश करता है।

वो धमकी भरे लफ्जों में कुछ कहता है,
वो सबको डराने की कोशिश करता है।

हम हरदम सुलह की ही हसरत रखते है,
वो हमसे हमेशा ही रंजिश करता है।

वो भी ना रहेगा अब बह ही जायेगा,
जो सबपर कहर की ही बारिश करता है।

हर अच्छी पहल को ये ठोकर मारेगा,
वो अच्छे इरादों पे बंदिश करता है ।

वो सबकी भलाई की सोच नही पाता,
वो खुद के गुनाहों को खारिज करता है।

           देवेन्द्र कुमार ध्रुव(डीआर)
                     बेलर
          जिला गरियाबंद (छ ग)

कुछ तो करे ल परही

पछुवाय संगी ल संघेरे बर
अगोरे ल परही।
का करबे अतका धन-दोगानी
एक दिन सबो ल छोंडे ल परही।।

कतका सहिबे अतलंग ल आखिर
अतलंगिहा ल बोले ल परही।
जिमेवारी के सुरता भुलाये हे तेन ल
पानी म थोरिक चिभोरे ल परही।।

जुच्छा-सुक्खा म दिया नइ बरय
बाती ल थोकिन भिंगोये ल परही।
पियास बुझाना हे कोनो लुलवा के त
मुँहू म पानी रितोये ल परही।।

जानत हंव बिचार नइ मिलय तोर-मोर तभो ले
समाज बदले खातिर संघरा
आए ल परही
नइ पतियावे मोर अकेल्ला के गोठ ल
समझाए बर सब ल जुरियाये ल परही।।

नइ सकय एके झन रद्दा चतवारे बर
ओसरी-पारी हांथ बटाए ल परही
बेरा के कीमत ल बेरा राहत पहिचान ले
नइते खाली हांथ जाये ल परही।।

इरखा,छल,कपट के बेपार चलही तोर दुनिया म
कोन ल ठगबे कि ठगाबे
ऊपरवाला ल आखिर मुँहू देखाये ल परही।।

रीझे यादव
टेंगनाबासा(छुरा)

पीरा

नवा राज के सपना
चिरहा ओनहा कस चेंदरा होगे
छत्तीसगढ़ महतारी के दुलरवा बेटा
अपने माटी म बसुंदरा होगे।।

लोटा धरके अवइया मन ह
इंहा बनाथे बंगलात
छत्तीसगढिया जिंहा के तिंहा रहिगे
जस कंगला के कंगला

भाग जागे के अगोरा म
बितत बच्छर पंदरा होगे
छत्तीसगढ़ महतारी के दुलरवा बेटा
अपने माटी में बसुंदरा होगे।।

नवा राज ल बिरथा काहय
जेमन परे बाधा
वईसने मन के सियानी हे
उँकरे मुड म हे पागा।।

ओमन मंदारी बनगे
छत्तीसगढिया नचइय्या बेंदरा होगे
छत्तीसगढ़ महतारी के दुलरवा बेटा
अपने माटी में बसुंदरा होगे।।

जागो रे!छत्तीसगढिया भाई
अपन हक ल माँगो जी
जे तुंहर बाना मारत हे
ओला तुम ललकारो जी।

रद्दा नवा कोन बताही?
अघवा मन सब अंधरा होगे
छत्तीसगढ़ महतारी के दुलरवा बेटा
अपने माटी में बसुंदरा होगे।।

रीझे यादव
टेंगनाबासा(छुरा)

हुंकार

भारत माँ के वीर सपूत,
सीने पर गोली झेल रहे।
भारत माँ की लाज खातिर,
खून की होली खेल रहे।

हो वीर अदम्य तुम सच्चे पूत,
जो सीने पर वार सहते है।
पीठ पर जो खंजर मारे,
उसे बुज़दिल कायर कहते है।

अपने आप को इंसान कहे,
और इंसानियत को शर्मसार करे।
गर बची हो उसमे थोड़ी सी गैरत,
तो चुल्लु भर पानी में डूब मरे।

ख़ामोशी को ना हमारी कमजोरी समझे,
गर ज़िद पर हम आ जाएंगे।
आँख दिखाने वाले बुज़दिल,
मिट्टी में मिल जाएंगे।

रचना- विनोद यादव
पंडरीपानी लोहझर
जिला-गरियाबंद(छ.ग.)

भारत माँ पुकार रही है

देश के हर एक वीर को.....
त्वरित निर्णय का समय है
दबा दो अब मन के धीर को.....
सर काट लाना है दुश्मनो का
मांज लो अब अपने शमशीर को.....
भरो अपनी बन्दूको में गोलियां
दुश्मन के सीने में घुसा दो तीर को....
ये समय कतई नहीं चुप बैठने का
अपनी ताकत बना लो हर पीर को....
दहशत बाँट जो पैदा करता है आतंक
हमेशा के लिये मिटा दो उस लकीर को....
माना अभी माहौल है कुछ अलग
जंग जीत कर बदल दो हर तस्वीर को....
कुछ कर गये जो तुम देश के लिये
फिर सराहोगे खुद अपनी तकदीर को....
ये घाटियां धमाको से नरक सी हो गई
फिर से वही स्वर्ग बना दो कश्मीर को.....
                   रचना
         देवेन्द्र कुमार ध्रुव (डी आर)
              फुटहा करम बेलर
            जिला गरियाबंद (छ ग)

सरग असन घर

मोला कोन्हों हा काही बर तरसन नई दिस,
मोर आँखी ले आंसू कभु बरसन नई दिस।
जइसन मांगेव सिरतोन वइसन पायेव मैहा,
दाई-ददा,गुरु,संगवारी सबके मया मिलिस।
      
ददा के दुलरवा गौरी के लाल कहायेंव मैहा,
सरग असन घर म जनम धर के आयेंव मैहा।

मोर पीरा,दाई ला पहिली ले पता चल जाये,
दउड़ के ददा मोला अपन छाती ले लगाये।
जम्मो संगवारी मन घलो मोर काम आये हे,
सुरता हे गुरु मन मोला जेन बात सिखाये हे।

भागमानी हौ सबला अपन तीर पायेव मैहा,
सरग असन घर म जनम धर के आयेंव मैहा।

बदल गे बेरा अब तो मैहर बड़े होगे हंव,
कमाथव खाथव अपन गोड म खड़े होगे हंव।
भले मैहर तो दुनियादारी के फेर म परे हंव,
फेर दाई-ददा के सपना बर कुछु नई करे हंव।

ओकर दूध के करजा ल नई चुकायेंव मैहा,
सरग असन घर म जनम धर के आयेंव मैहा।

मोर अंगरी ला धरके मोला रेंगाये हवय,
अपन आँखी ले मोला दुनिया देखाये हवय।
आज नवा रद्दा बनाके उही मन ला छोड़े हंव,
दुःख पीरा संग उकर मन के नत्ता जोड़े हंव।

सुवारथ बर सबके मन ला दुखायेंव  मैहा,
सरग असन घर म जनम धर के आयेंव मैहा।

मोर जीत बर उकर मन मा आसा राहय,
मैहर पछवाव ता वहू मन ला निरासा राहय।
करेव गलती तभो उकर मीठ भाखा राहय,
एक दिन उकर बर काही करहू केहे रेहेंव।

फेर आजो अपन किरिया नई निभायेंव मैहा,
सरग असन घर म जनम धर के आयेंव मैहा।
                      रचना
         देवेन्द्र कुमार ध्रुव (डी आर )
             फुटहा करम बेलर
          जिला गरियाबंद (छ ग)

मातृभाषा

हम ही जिम्मेदार होंगे अपनी सभ्यता के पतन का....
सम्हलना होगा,समय है ये अपनी संस्कृति के जतन का ....
मातृभाषा ही है,जो हम सबको एक सूत्र में पिरोती है.....
मगर अब ऐसा बदला हाल देखकर चुभता सीने में शूल है ....
अपनी ही मातृभाषा को महत्व ना देना हमारी सबसे बड़ी भूल है....

आज पश्चिमी सभ्यता,हमारे देश में हावी होकर बढ़ रही है .....
हित अहित से अनजान,इसके फेर में हमारी भावी पीढ़ी पड़ रही है ....
समझना और समझाना होगा,सबको मातृभाषा का महत्व.....
हट जानी चाहिए सबकी मानसिकता में जमी धुल है .....
अपनी ही मातृभाषा को महत्व ना देना हमारी सबसे बड़ी भूल है....

हमारी मातृभाषा हिन्दी तो,हिन्दुस्तान की जान है .....
हम भारत वालो की तो जग में,इसी से ही पहचान है....
कानो में जैसे मधुरस घोले,ऐसी इसकी मिठास है.....
सबके मन की बगिया महकाने वाला ये सुन्दर फूल है .....
अपनी ही मातृभाषा को महत्व ना देना हमारी सबसे बड़ी भूल है....

हर कोई आज आधुनिकता का राग अलाप रहा है ....
ऐसे ही हम गर्त समाये जा रहे है कोई नही भांप रहा है ....
सब बदलाव का ढोंग कर,नई रीत अपनाने में लगे है....
पुराने रिवाज बिसरा दिए गये,समय भी बड़ा प्रतिकूल है....
अपनी ही मातृभाषा को महत्व ना देना हमारी सबसे बड़ी भूल है....
                      रचना
           देवेन्द्र कुमार ध्रुव (डी आर)
                 फुटहा करम बेलर
             जिला गरियाबंद (छ. ग.)

कागज कलम

कलम उठाथन,सबला सोरियाथन
कागज मा अपन भाखा ला सजाथन
सब बर गोठ रहिथे हमर मन करा
लईका होवय चाहे,होवय ओ सियान
हमन तो कहाथन जी कोरा कागज के मितान

कभु परिया परे भुईयाँ,कभु हरियाली
नदिया नरवा के पूरा,अऊ बदरिया कारी
बनके फसल बनके हमन लहलहाथन
किसानी के गोठ गोठियाथन बनके किसान
हमन तो कहाथन जी ........

कभु सबके दुःख दरद के बोली
कभु करथन हमन हांसी ठिठोली
सबके अन्तस् मा समाये के उदीम रथे
जोहारन सबला हाथ जोड़े,माथ नवान
हमन तो कहाथन जी...........

लिखथन सुरुज अऊ चन्दा ला
कमईय्या के सब काम धंधा ला
नवा संदेस देथन जब कलम उठाथन
सब करा हमर आरो पहुँचे देथन धियान
                 रचना
       देवेन्द्र कुमार ध्रुव (डी आर)
            फुटहा करम बेलर
         जिला गरियाबंद (छ ग)

जगर-बगर लट्टू

जगर-बगर लट्टू जब झम्म ले बुथाये
अबक-तबक डोकरी दाई चिमनी ल बारे
मोर थोरिक रोवई म मिरचा गुंगवाये
आँखी फूटगे कोन दुखाही के कहिके सब ला बखाने
बदलत जमाना संग मनखे बदल जाही
त डोकरी दाई के सुरता का सिरतो नइ आही?

आनी-बानी के जेवन दाई बनाये
ओकर मुँहू ऊलय कंवरा मोला खवाये
ककरो नजर झन लागे कहिके काजर अंजाये
कई खेप बईगा तीर मोला देखाये
बदलत जमाना संग मनखे बदल जाही
त दाई के सुरता का सिरतो  नइ आही?

किसिम-किसिम के जिनिस मोर बर बिसाये
कभू खंधइहा त कभू पिंठइहा चढाये
दुनिया के संसो ल ददा
बीडी के धुंगिया म उडाये
बदलत जमाना संग मनखे बदल जाही
त ददा के सुरता का सिरतो नइ आही?

रीझे यादव
टेंगनाबासा (छुरा)

वाह रे मंहगाई

सबो जिनिस के बाढ़गे रेट,
का करबे का नी करबे होगे मटियामेट|
पउर के करजा छुटाए नई हे,
तगादा भेजथे भारी सेट।

करजा म मनखे ल अउ कतका सोवाबे
वा रे मंहगाई अउ कतका रोवाबे।
धान ले जादा बीमारी मनखे म लगे हे,
सेट साहूकार मन जनता ल ठगे हे।

बइठके गद्दी म ओ करत हे जनता के खेदा,
मारत हे गरीब के पेट म ओ लबेदा।
अउ मनखे ल ते कतका भोगवाबे
वा रे मंहगाई अउ कतका रोवाबे।

मंहगाई के मार म मनखे ह अइलाए हे,
सरकार के रन्निति म कइसे घइलाए हे।
सुखावत बबा ल पूछ पारेव काहे तोर चक्कर,
कथे बबा महीना ले नई पीएहों चाहा भाव बढ़गेहे सक्कर।
मंहगाई के डोंगा ल अउ कतका खोवाबे
वारे मंहगाई अउ कतका रोवाबे।

फोकट म बाटथस किलो-किलो नून,
थोरकून मोर बात ल तो सून।
देनच हे त फोकट म दे दार सक्कर तेल,
बदल दे तेंहा अब मंहगाई के खेल।
कब तैं जनता के आंसू ल पोछाबे,
वारे मंहगाई अउ कतका रोवाबे।

विनोद यादव
पंडरीपानी लोहझर
गरियाबंद 36गढ़

स्मरण

सबला एक सूत मा गुंथव
सब अब एकजुट दिखव
हमन बोली भाखा के साथी
हमर सपना हा सलोना हे
चलव आवव ऐ डाहर पाँव धरन
सबो ला ऐके रद्दा मा रेंगवईया
"स्मरण"
अब लिखव अपन मन के बात ला
एक करदव दिन अऊ रात ला
चालू करव अब, ऐ नवा रीति ला
के उजागर करना हे ,सबकुरीति ला
बईठे करके तैयारी,कलम के पुजारी हमन
माँ सरस्वती के आशीष लेवईया
"स्मरण"
सबो झन बर बात ऐ ख़ास रही
नवा करे के ,सबके परयास रही
सबके अन्तस् मा अतका आस रही
सफलता बर सबला बिसवास रही
अपन कद ला जग मा ,अऊ ऊँचास करन
सबला तरक्की के रद्दा देखवईया
"स्मरण"
नई जीना हे, गुमनामी के अंधियार मा
अपन नाव कर जाना हे, ऐ संसार मा
कामयाबी के सितारा,हमरो बर चमकही
सुख के फूलबारी हमरो बर महकही
दिन आही, जब होही हमरो चलन
हमनला हमर खुद के बारे में बतईया
"स्मरण"
नवा किरण अंधियारी ले झांकय
सबो मिलके बैर के ख़ईहाँ ला पाटय
हमर लिखे कागज मा अइसे साजय
पढ़हईया सुनईया ला बने बने लागय
मीठ बोली प्रेम के झरना बरोबर झरन
मीत मितानी सब संग करवईया
"स्मरण"
हमर बोली ,कान मा रस कस हो जाये
घोरे मिसरी,मन्दरस कस हो जाये
सबो चीज बदले बदले कस हो जाये
काम अइसे करन, के हमरो जस हो जाये
अइसे लागे जइसे, होहे नवा अवतरण
सबला संग मा लेके चलवईया
"स्मरण"
                        रचना
              देवेन्द्र कुमार ध्रुव(डीआर)
                 फुटहा करम (बेलर)
             जिला गरियाबंद (छ ग)

दुरलभ हे मनखे तन

जिनगी के मोल गजब हे
   झन समझो एला गरू
मनखे तन आमा कस मीठ
   झन करव एला करू
महत ल एकर जान पावन करले मन
  दुरलभ हे मनखे तन....

सुग्घर तन ला पाके,,मोह माया म भुलागे
का करनी तैंहा करे,,दई ददा ह रूलागे
छोटे बड़े के चिनहारी नई जाने
    आदर सतकार दूरियागे
साथी संगत म चाल बिगड़गे
    आनी बानी के पीरा हरियागे
दुनियादारी छोड़ बने करले जतन
  दुरलभ हे मनखे तन....

नशा पानी म निच्चट भिनगे
  तन ला तहूँ खिया डारे
किसम किसम के रोग रई म
  आधा जिनगी सिरा डारे
का समझे ए तन के महत ल
   बिरथा दिन ला पोहा दे
नई मिलय अइसन दुबारा
   हांसी ठिठौली म बोहा दे
जिनगी सुधारे बर अब तो कर लगन
   दुरलभ हे मनखे तन....

मनखे तन हे सुग्घर फुलवारी
किसम किसम के फूल लगाले
दया धरम के गोंदा अउ संसकार के गुलाब महकाले
बेवहार म रख मिठास,छोटे बड़े के चिनहारि
जस के काम करे बर,मिले हे जनम उधारी
बैर भाव ल भुलाके पावन करले अन्तरमन
  दुरलभ हे मनखे तन....

विनोद यादव
पंडरीपानी लोहझर
गरियाबंद 36गढ़