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Sunday, 26 February 2017

ललित साहू जख्मी  की ताजी रचनाएँ 
मेरी कमाऊ बीवी
         (व्यंग्य)
मेरे एक मित्र ने गंभीर चिंता जताई
मुझे मेरी बीवी की ढेरों गलतियां बताई
अबे तू बडी गफलत मे है
कि कामयाबी उसके कदम चूमती है
असल मे तो तेरी बीवी
दिन भर सड़कों पर ही घुमती है
जाने कितनी साडियां है उनके पास
की हर दुकान मे अस्तर और फाल ढूँढती है
अबे तू रहता है हर वक्त लुंहगी बनियान मे
जाने किसके लिए वो शर्ट और रूमाल ढूँढती है
अबे चूप कर ओ सुन लेगी
तु मुझे मरवायेगा क्या
उसके पैसों से ही घर चलता है
उसके बदले तु कमायेगा क्या
अबे वो इस घर मे इकलौती कमाऊ प्राणी है
घर के बर्तन से ज्यादा उसकी पेटी मे साडी है
खुद के पैसों से खरीदी
उसके पास अब नई गाडी है
गार्डन नही है गांव मे पर
भ्रमण हेतु जंगल झाडी है
मित्र मेरा बहुत करीबी था
कौतुहल मिटाना भी जरुरी था
उसकी चिंता और गहराई
उसने कुछ बातें मुझे समझाई
अबे कुछ नही तो बच्चे की परवरिश की सोंच
अगर इससे नही बनती तो दुसरी बीवी खोज
देख तेरी बीवी ईमानदारी से दफ्तर तो जाती नही
अपने हाथो से बनाकर तुझे खिलाती भी नही
तू अपनी ही जिन्दगी से क्यूं खेल रहा है
खामोश रहकर तू इतना क्यूं झेल रहा है
तू सुन सकेगा? किस्से दो चार और सुनाऊं
तू बोल तो तालाक के पेपर मै बनवा के लाऊं
मैने कहा अबे तू खुद जूते खायेगा
और क्या मुझे भी खिलायेगा
घर भी उसी के नाम पर है भाई
अब क्या मुझे घर से भी निकलवायेगा
देख भाई वो कमाती है मै चूप बैठ खाता हूं
बच्चे को नहला खिला के रोज स्कूल पहुंचाता हूं
और तू मुझे खाली मत समझ
मै उसके चालक की नौकरी बजाता हूं
झाडू पोंछा, बर्तन और पानी भरके
सब्जी लेने भी मै ही तो जाता हूं
मेरा मित्र अब हार गया
मेरी अड़चन वह ताड़ गया
अबे तू तो कभी शेर हुआ करता था
इतना डरने कब से लगा
बिल्ली को काबू तो कर ना सका
तू दुम हिलाने कब से लगा
मैने कहा देख तू ज्यादा मत बोल
मेरे वैवाहिक जीवन मे जहर मत घोल
तू मेरी चिंता करता है मै जानता हूं
मेरे लिये तेरी संवेदनाएं मानता हूं
पर तू ही बता उसके कमाने मे बुराई क्या है
उससे लड़ के मार खाने मे बडा़ई क्या है
अब तो नारी उत्थान की ही बात हो रही है
कानून की धारायें भी उन्ही के साथ हो रही है
मेरा बच्चा भी नौकरी पेशा से शादी कर लेगा
जैसे मैने किया वैसे वो भी बसर कर लेगा
अबे तू बेमतलब ही इतना कुछ सोंचता है
राम और माया एक हि दुनिया मे खोजता है
बीवी रुपवती किस्मत से कमाऊ आई है
मै चूप हूं तू भी चूप रह इसी मे हमारी भलाई है


असहाय पिता
होती होंगी कई मौतें पेटो में ही,
बेटी.! पर मैनें तो तुम्हें मारा नही।
सबने टोका तुम्हें धरा पर लाने से,
पर मैं तो इस जग से हारा नही।
         ना मैनें बुढ़ापे की ही चिन्ता की,
         ना ही की वंश की खोखली बातें।
         तेरी परवरिश की चिंता मे बेटी,
         बिना सोये ही गुजारी कई रातें।
तेरे रोने पर मैं खीलौने ले आता था,
तुझे खुश देखने घोड़ा बन जाता था।
तुझे पढाने किताबें मै रट लेता था,
तुझे सुलाने कहानी मैं गढ़ देता था।
         बोल बेटी तुझे किस मोड़ पर मैनें,
         कमजोरी का अहसास कराया है।
         जब-जब बदनामी की आंच आयी,
         मैनें तुझे अपनी ओट मे छिपाया है।
सोलहवें बसंत की दहलीज पर,
तुमने गौण सारा संस्कार किया।
अजीब समानो, तंग कपड़ो से,
तुमने अपना साज श्रृंगार किया।
         तब ना टोका तुम्हें, मैनें ये सोचकर,
         कि तुम स्वछंद उड़ान भर पाओगी।
         लड़को से भी बहुत आगे बढ़कर,
         तुम इस दुनिया मे नाम कमाओगी।
जाने किसकी पड़ी है परछाई,
कि अब शत्रु मुझे समझती हो।
छोटी-छोटी बेतुकी बातों पर,
अपनी माँ से तुम उलझती हो।
         मेरे इन कानों तक भी पहुंची,
         तेरे प्रेम प्रसंग की कड़वी बातें।
         भरोसा किन्तु भय पितृ हृदय मे,
         चूंकि देखी है कलयुग की वारदातें।
एक ही सपना संजोया था बेटी,
पढ़ा-लिखा कर विवाह रचाने की।
वो भी तोड़ तुमने कसमे खा ली,
किसी और संग घर बसाने की।
          थाम उंगली चलना सिखाने वाला,
          क्या इतना भी काबिल ना रहा।
          तेरे जीवन के अहम फैसलों पर,
          बेटी.! मैं क्यों अब शामिल ना रहा।

वीरांगना बहू
पहली किरण संग उठ जाती,
सबको सुला के ही वो सोती है।
घर को अकेले संभालने वाली,
वो वीरांगना बहू ही तो होती है।
       बच्चे की देखभाल ओ करती,
       रोजाना दूध भी वही लेती है।
       ससुर को देती ऐनक अखबार,
       पति को चाय-काफी भी देती है।
ननंद की होती है ओ राजदार,
देवर के नखरे मस्ती सहती है।
देवरानी की गुरु, सखी, बहिन,
घर की रानी भी बहू ही होती है।
        पाक कला मे निपूर्ण ओ होती,
        सास की बातें सुनकर रहती है।
        रहने दो माँ जी मैं कर सब लूंगी,
        ऐसा सिर्फ बहू ही तो कहती है।
कपड़े बर्तन झाड़ू पोंछे का बोझ,
बिचारी चुप-चाप ही सहती है।
स्वस्थ दिखती है पर रहती नही,
दर्द मे ठीक हूं बहू ही कहती है।
        होती है नौकरानी, चौकीदार भी,
        बहू घर की साहूकार भी होती है।
        ईश्वर का अहसास घर की लाज,
        सर का ताज भी बहू ही होती है।
ससुराल का हर फर्ज निभाती,
धैर्य की मिसाल ओ होती है।
दो कुलों के मजबूत रिश्तों की,
अधार-शिला भी वही होती है।

मातृ पितृ दिवस 
कुछ लोग मना रहे वेलेंटाइन डे,
कुछ मातृ-पितृ दिवस मनाओगे।
बस आज ही होगी उनकी पूजा,
कल पानी देना तक भूल जाओगे।
         तुम इतने ही सच्चे सपूत हो तो,
         क्या मोबाईल में फर्ज निभाओगे?
         अगर मात-पिता ने समाधि ले ली,
         फिर किस जन्म कर्ज चुकाओगे?
सामर्थ्य है तो सच्चा सम्मान करो,
बुजुर्गों के श्राप सेमबच जाओगे।
ढकोसलों का तमाचा गर उल्टा पड़ा,
आईने में शक्ल भी न देख पाओगे।
         सिसकती रुंधित नारी समाज का,
         क्या तुम दर्द समझ भी पाओगे?
         गर पिता ने तुम्हें सम्पत्ति ही न दी,
         क्या तब भी तुम शीश झुकाओगे?
लेन-देन को संबंध समझने वाले,
क्या वेदना रिश्तों की जान पाओगे।
समाज के जख्मी अंत:करण पर,
तुम किस मरहम का लेप लगाओगे?
         गहरा जख्म भी तब भर जायेगा,
         जब मिठे बोलो की झड़ी लगाओगे।
         उनके बुढापे में हंसकर साथ रहो,
         तभी तुम संतान का धर्म निभाओगे।
मातृत्व का अहसास
जब बड़ी हुई, घर में शहनाईयाँ बजी,
छोड़ आई मैं, बाबूल के दामन को।
अरमानों की फूलों से सुंदर सेज सजी,
ईश्वर मान लिया मैनें अपने साजन को।
           सास, ननद, जेठानी ने भी खुब छेड़ा,
           कहा कब चहकाओगी घर आंगन को।
           शर्म से लाल हुई, पर मैनें कह ही दिया,
           बित जाने तो दो जरा इस सावन को।
जाने कितने ही सावन हैं अब बित गये,
फिर भी कुछ नही है खबर बताने को।
सब चिंतित हुए, मेरा मन व्यथित हुआ,
अब कोई होगा या नही मुझे सताने को।
           बैध हकीम सबने बड़ी पेशियाँ बांधी,
           मैं दर-दर भटकी नाड़ी दिखाने को।
           जाप किया, व्रत रखे, धागे भी बांधे,
           फिर भी तड़पी मातृत्व सुख पाने को।
मैं अब मुंह फेरने लगी महफिलों से,
सह ना पाती थी अपनों के तानो को।
कुरेदते हैं घाव लोग बड़ी नजाकत से,
कुछ चले आये यूं ही हमदर्दी जताने को।
           तभी एक रोज कोख से आवाज आई,
           माँ.! मैं बेताब हूं कोख से बाहर आने को,
           तूने मेरे लिए बहुत आंसू बहाये हैं, माँ.!
           अब मैं तैयार हूं तेरा गम बिसराने को।
सुबक मैं रोने लगी..सपनों में खोने लगी,
कोई लफ्ज़ ही नही, अहसास कह पाने को।
खुश चेहरा, आँखों में आंसू, हांथ कोख पर,
इतना ही काफी है सारी बातें समझाने को।


डमरू वाले बाबा
डम-डम-डम डमरू वाले,
रुप तेरा है बड़ा मनोहारी।
नमन तुझे हे कैलाश पति,
दुखियन के तुम हितकारी।
        पापियों का तु महाकाल है।
        तु ही जगत का पालनहारी।
        जटा में गंगा गल सर्प हार है,
        कंठ गरल धरे, हे विषधारी।
त्रिनेत्र से त्रिलोक है भयभीत,
प्रहार त्रिशूल का है भयंकारी।
भस्म से श्रृंगार किये है काया,
शिव-शंकर की नंदी है सवारी।
         छल कपट से परे जग स्वामी,
         नाम रटते भगत भोले भंडारी।
         ओम नम: शिवाय जाप पावन,
         जपते सारे देव दानव नर नारी।
तेरा बखान मेरे बस का नही,
जख्मी ने सर्वस्व तुझमे हारी।
जड़ चेतन सब तुझमे समाये,
तेरी महिमा प्रभु सबसे न्यारी।


माँ के मन की
हाँ आज मैं खुश हूं,
हां-हां मैं बहुत खुश हूं।
मैं अब माँ बनने वाली हूं,
प्यारा सा बच्चा जनने वाली हूं।
पर सोंचती हूं, वो कैसा होगा ?
ऐसा होगा....या वैसा होगा.!
बेटी होगी तो पापा जैसी होगी,
बेटा होगा तो मेरे जैसा होगा।
सब कहते हैं बेटा घर का वंश होगा,
मै कहती हूं, वो मेरा ही अंश होगा।
बेटा हो या बेटी मुझे संतान चाहिए,
नारी तो हूं, पर माँ की पहचान चाहिए।
बेटा हुआ तो घर मे बड़ा स्वागत होगा,
बेटी हुई तो मुझसे सबको नफरत होगी।
बेटी को न्याय मै कैसे दिलाऊंगी,
क्या कहकर मै समाज को समझाऊंगी।
बेटा हो या बेटी एक ही एहसास होता है,
मातृत्व का अनुभव बड़ा ही खास होता है।
जो करते हैं मना बेटी पैदा करने से,
वो खुद ही बेटा पैदा कर क्यूं नही लेते?
शक है अगर उनको ईश्वर की रचना पर,
तो स्वयं काया कोई गढ़ क्यूं नही लेते?
अंतर्मन से जब देखे कोई मातृहृदय को,
तो पूर्ण कुदरत का आभास होता है।
अब मान भी लो बच्चा जनने का अधिकार,
सिर्फ और सिर्फ माँ के ही पास होता है।
मैं थोड़ी बड़ी होती
तन जाती मजबूत दीवार बन कर,
तकलीफों मे पापा संग खड़ी होती।
मैं बेटी अपने पापा की लाडली,
कोई जादूगर या जादुई छड़ी होती।
काश.. मैं थोड़ी और बड़ी होती...

अपने पापा के आंखो की ज्योति
मै हृदय की अविराम घडी होती
धडकन बन मैं उनके दिल में रहती,
तकलिफें मेरे हिस्से भी पडी होती।
काश...मैं थोड़ी और बड़ी होती...

जन्म दिया, ना कभी भेद किया,
मैं भी उनके जीवन की लड़ी होती।
पढ़ा-लिखा कर बना दिया लायक,
दर्द देख पाऊं, मैं इतनी तो कड़ी होती।
काश...मैं थोड़ी और बड़ी होती...

छोड़ बचपन की मैं अल्लढता,
सिढियां समझदारी की चढ़ी होती।
हांथो की लकीरें बनाती मैं खुद,
भविष्य परिवार का गढ़ी होती।
काश...मैं थोड़ी और बड़ी होती...

युगों रखती नजरों के सामने,
मैं ऐसी मजबूत हथकड़ी होती।
जन्म-मरण का भेद ना होता,
मैं यमदूतों से गर लड़ी होती।
काश...मैं थोड़ी और बड़ी होती...

ललित साहू जख्मी 
 कइसे मितान

कइसे मितान
लागत हे नवा साल म
आही नवा बिहान
काहत हे हमर मुखिया सियान-
सुनव जी अफसर!धरव धियान!!
नवा उदीम बर ईनाम मनमाने
नइते तुम जानो अउ तुंहर काम जाने
एसो बिकास के रद्दा नवा गढना हे
सब ल संग लेके बस आगू बढना हे!
सियान के बात ल अफसर
धरही कनो समझके गियान
बनिहार हाँसही अउ गाही किसान!!
सिरतो काहत  हंव न!!!
कइसे मितान?

कइसे मितान
#समाजवादी झगरा#
बड दिन ले माते हे
बाप अउ बेटा म झगरा
चुनाव बताही
कोन हावय तगडा!!
फेर ओकर ले पहिली
हावै एकठन जंजाल
कोन मिलही आखिर
सइकिल निसान!!!
एकझन पइडिल मारथे त
सइकिल बने चलथे
दुझन के पइडिल मरइ म
चलइय्या मन मुडभरसा गिरथे!
अतेक छोटे बात के
जेमन ल नइहे गियान
तें मन कइसे जितही?
कइसे बनाही सरकार??
जनता ह भोकवाय हे
देखके उंकर घमासान
सिरतो काहत हंव न !!
कइसे मितान??


कइसे मितान

#फौजी के पीरा#
एक झन फौजी ह
अपन दुख ल गोहराये हे
कतिक तकलीफ म रिथे ओमन
सगरो देश ल बताये हे
कतिक बिपत म हावे
हमर देश के जवान!
पीरा ल गोहराथे त
कोनो नइ देवय धियान
बडे अफसर मन करथे मनमानी
छोटे कतको सच्चा राहय
नी चलय सियानी
अब तो सरकार ल लेय बर परही संज्ञान
बने जेवन करके डिप्टी करे हमर देश के जवान!!
फेर फौजी ल अनुशासन के
रखना चाही धियान
काबर कि उंकरे से जुडे हे
हमर देश के सम्मान
सिरतो काहत हंव न !!
कइसे मितान??
*रीझे-टेंगनाबासा(छुरा)*
बसंती होली.....
ऋतुराज बसन्त धरती पर छाया,
मानो होली का स्वागत करने आया।
लगी सजने धरा रंग-बिरंगे फूलों से,
मानो दुल्हन ने नव सृंगार किया।
सज रही प्रकृति दुल्हन की तरह,
पलास आम्र के बौरों से।
निकल रहे नगमें मधुर तान में,
कलियों संग मिल भौरों से।
चल रही बसंती पुरवइय्या होकर मतवाली,
महूए के रस में डूबी निकली प्रेम की बोली।
बूढ़े जवान सब डूबे रास रंग में,
बन राधा कृष्ण मना रहे अद्भुत होली..
...................................
देवनारायण यदु
पंडरीपानी लोहझर
गरियाबंद 36गढ़.....
रीझे यादव की रचनाएँ
रमायण म छत्तीसगढ़ महिमा
ये माटी रिसी मुनि के ठउर
गियानी बिधुन होके जप-तप करथे।
सिहावा डोंगरी के सिंगी रिसी ह
जम्मो के आस पूरा करथे।
चउंथा पन म राजा दसरथ
लोग-लइका बर तरसथे।
रेंगत आथे जब मुनी तीर
मन के इच्छा पूरा करथे।
ये भुइंया के परताप गजब!
जिंहा कौसिला अस बेटी जनम धरथे।
जेकर पुन्न परभाव ल देख बिधाता!
कोरा म संउहत अवतरथे।
ये माटी के संस्कार अतिक!
लइका ल मरयादा सिखाथे
दाई-ददा के मान रखे बर बेटा!
हाँसत-हाँसत बन जाथे।
इही धरती म दाई के मया!
सबरी रुप म पलपलाथे
छप्पन भोग खाने वाला ल
जूठा बोईर घातेच भाथे।
मया के मोल तोल न कोई
सबरी भक्तिन ह सिखाथे।
कांदा-कूसा बोईर के बदला
नवधा भक्ति के बर पाथे।
बनवास मिलिस सीता ल जब
इही भुइंया ह पोटारे हे।
जगतजननी मिथिलाकुमारी ल
बालमीक आसरम म लाने हे।

इंहे जनमिन लव अउ कुस
अवधपुरी के चिन्हारी।
मरयादा पुरुस राम के लइका
जेकर महिमा बडभारी!
फगुनहा बेरा
जब ले रितु बसंत आये हे
परसा बड मुस्कावत हे।
लाल-बरन अंगरा कस लागे
बिरही जीव ल जरावत हे।
मटकत सेम्हर अउ धंवई फूल
परसा के संग मेछरावत हे।
बिन ओनहा लाज के मारे
मउहा बिकट लजावत हे।
दुलहा बरोबर आमा लागे
सुग्घर मउर सजावत हे।
बिधुन होके कोइली नाचत हे।
भोंगर्रा मोहरी बजावत हे।
सुवा पांखी लुगरा बरोबर
सरई के पाना लागत हे।
कोसुम के हरियर लाली डारा
घातेच मन ल भावत हे।
परकिरती के आनी- बानी रंग
हमला अगुवा के चेतावत हे।
मया के रंग सकेले राहव
थोरिक दिन म फागुन आवत हे।
नवा साल म
नवा साल म
झन होवय कोनो अलहन
मनखे मनखे राहय
झन बिगडे गडहन ।
नवा साल म
संसो सबके सिराय
बिगडे काज बनय
सुख-संपत्ति सकलाय।
नवा साल म
कोनो बैरी झन होवे
मया के पीकी फूटे
सुमत के बिजहा बोंवे।
नवा साल म
करिया धन सपडाय
उंकर बइमानी म
गरीबहा झन पेराय।
नवा साल म
परोसी ल बुध आय
पर के भरोसा म
जादा झन इतराय।
नवा साल म
मंहगई मर जाय
खात-खवई कर देबो
चाहे कतको खरचा आय।

गौ-दुर्दशा
धर्म-धरा भारतभूमि पर
कैसा दुर्दिन आया भइया!
द्वार पर याचक सी खडी
हमारी जननी गऊ मइया!!
भूल गये हम अपनी संस्कृति
श्री कृष्ण गौ चारण करते थे
गीता-ज्ञान दाता गोपाल कभी
हस्त लकुटी,अधरों पे बंशी धरते थे।
स्मरण रहे जब रावण ने
धरा पर अत्याचार मचाई थी
गौ-रूप में धरती माता ने
प्रभु तक पीडा पहुंचाई थी!
गऊ साक्षात कामधेनु है
हर इच्छा पूरी कर देती है।
क्षीर सुधा सम देती है
तन-मन की पीर हर लेती है।
वर्तमान में श्वान युवराज बना है
निज पुत्र सा पालन पाता है।
करुणा और ममता की प्रतिमा
गौ माता घर-घर दुत्कारा जाता है।
रीझे-टेंगनाबासा
विनोद यादव की रचनाएँ 
सत् के महिमा.
.गिरउधपुरी के संत,
मांहगु अमरउतीन के लाला ए।
जग म जेहा नाम कमइस,
पहिरे सत् के माला ए।
सत् के रद्दा बताए बर,
ए भुइंया म लिस अवतार।
सादा रंग पहिरे बाबा,
तोर महिमा अपरमपार।
नाम हे जेकर अजर-अमर,
जइसे धरती अकास।
कंठ म सब सुमरन करलो,
सत् हे घासीदास।
सत् के दीया अन्तस् म बरही,
उजियार होही गली-खोर।
जब तक रहि चन्दा-सुरुज,
तोर नाम के रही अंजोर।


अज़ीब दस्तूर..
दुनिया की रीत अजीब,अजीब यहां इंसान।
कोई जाना-पहचाना चेहरा,कोई है अंजान।
भिन्न-भिन्न रहन-सहन,अलग-अलग है वेश।
भांति-भांति के लोग है,होते नित्य छल द्वेष।
मानव होकर मानव पर,करते है अत्याचार।
स्वार्थ लिप्त होकर,क्यों भूलते है संस्कार।
धन दौलत सब कुछ रहकर भी,कोई है परेशान।
कुछ नहीँ है पास जिनके,सुखी है वो इंसान।
कोई दर्द में रोता है,कोई गम छुपाने हँसता है।
है पास जिनके सुख ऐश्वर्य,चेहरे में मायूसी बसता है।
जीवन का ना कोई ठिकाना,कब आना कब जाना।
मौत आती है जब,तो नही ढूढ़ती कोई बहाना।
सबसे मिलो हँसकर यहाँ,खुशनुमा खयालात हो।
ना जाने कब किस से,आखिरी मुलाकात हो।
समझ नही पाओगे ज़माने के रंग,ना करो खुद पे गुरुर।
जियो परिस्थितियों से जूझकर,अज़ीब है यहाँ के दस्तूर..

धरा के भगवान
माँ की ममता जग में,
   जीने का सहारा होता है।
इन पर जीवन का,
   हर ख़ुशी न्यौछावर होता है।
पिता का हृदय सागर सा गहरा,
जिनका ना थाह होता है।
संतानो के लिए उनका जीवन,
खुशहाली की राह होता है।
माँ-बाप के बिना जग में,
   हर सुख गवारा होता है।
वही तो कच्ची डोर का,
  हरदम सहारा होता है।
ना दुखाना दिल कभी,
वही दुनिया के भगवान है।
सेवा करना निःस्वार्थ होकर,
जीवन में सच्चा सम्मान है।
करो कोई भी काम सदा उनका ध्यान रहे।
होठों में सदा उनका ही गुणगान रहे।
ऋण से उनके ऊऋण न होगा,
इस बात से तू ना अंजान रहे।


तेरी अहमियत..
मैं नीरस जिंदगी वीरान की तरह..
तू आई पतझड़ में सावन की तरह..
था मैं एक थका मोर की तरह..
तेरी अहमियत-
   खुशियों की बादल की तरह..
बेमतलब जा रहा था ए जीवन,
बेनूर बेसहारे की तरह।
थाम ली हाथ तूने मेरा,
तेरी अहमियत-
   ...सहारे की तरह।
तपती धुप में तप रहा था रेत की तरह,
तेरी चाहत शीतल नीर की तरह।
टूटते बिखरते रिश्तों में,
तेरी अहमियत-
   ..मेरी पहचान की तरह।
यादों की समुन्दर में तू मोती की तरह,
मैं तलासता तुम्हें शीप की तरह।
हर तरफ मुखौटे बदलते कपड़ो की तरह
तेरी अहमियत-
..मेरे तक़दीर की तरह।
नहीँ हो सकती तू दूर मुझसे,
मैं आंसू तू नयन की तरह।
नही धड़केगा दिल मेरा
तेरी अहमियत-
..धड़कन की तरह।
त्याग समर्पण की तू मूरत,
मैं पत्थर का बना मंदिर की तरह।
मैं प्रेम का हूँ राही,
तेरी अहमियत-
..प्रेम की देवी की तरह।
तेरी अहमियत
  जिंदगी में बता नही सकते।
ख्याल पल भर तेरा मन से हटा नही सकते।
तेरे बिना मैं चलता फिरता लाश,
तेरी अहमियत-
..मुझमे साँस की तरह।


उजड़ते ख्वाब..
ना जाने क्यों महफ़िल में,
एक डर सा लगता है।
अपनों के बीच भी,
सूना अहसास सा लगता है।
लूट गई हो दुनिया जिसकी,
खुशियां भी वीरान सा लगता है।
लाखों के भीड़ में भी,
हर मंजर भी सुनसान सा लगता है।
अजब सी चुभन है दिल में,
सिसक भी सुकून सा लगता है।
दर्द सुनाए भी तो किसे भला,
हर दिल पत्थर सा लगता है।
है बाजार में कई बदलते चेहरे,
हर चेहरा फ़िका सा लगता है।
ओढ़ बेरुखी की चादर,
बेनूर भी नूर सा लगता है।
सजे है लोग घिनौने रूपो में,
इंसानियत मरा सा लगता है।
मिटा सपना अब जीवन का,
ए जग उजड़ा आशियाँ सा लगता है।

भटकत बचपन...
नी जानो आज समाज,
कोन डाहन जावत हे।
सन्सकिरिति ह मनखे ले,
भारी दुरियावत हे।
सभियता अउ संस्कार ह,चिखला कस सनावत हे।
आज के बचपन ह,भटक भटक जावत हे।
ददा होगे दरुहा त,
टुरा ल दारू मंगावत हे।
संगे म बइठार के वहुला,
थोक-थोक पियावत हे।
दिंयार कस नसा ह,सबला चिक्कट खावत हे।
आज के बचपन ह,भटक भटक जावत हे।
इस्कूल जाथन कहिके लईका,
रोज दिन घर ले जावत हे।
अलकरहा टुरा मन सन रहिके,
आनि-बानि के धुंवा उड़ावत हे।
आगि बरोबर उँकर जवानी,चनचन ले भुंजावत हे।
आज के बचपन ह,भटक भटक जावत हे।
बेरा रेहे के पहिली,
अइसन इस्थिति ले बचाना हे।
बने सिक्षा अउ परवरिस ले,
लईका के जिनगी ल,
सुग्घर बनाना हे।
अतकिच बात ल तो,ए विनोद ह गोहरावत हे।
आज के बचपन ह,भटक भटक जावत हे।
  विनोद यादव
  पंडरीपानी छुरा गरियाबंद 36गढ़
 
समाज...
बनकर दीप जग में,
जल रहे हो आज।
शिक्षा संस्कार बिखेरने का,
कर रहे हो काज।
आप है तो मानव का,
है धरा में साज।
मानव को मानव बनाने का,
हो रहा आगाज।
नमन है मेरा आपको,
     हे श्रेष्ठ समाज..
आप है तो धरा में,
मानव का पहचान है।
आप है तो मानव का,
पद और सम्मान है।
आप से ही सुसज्जित है,
मानवता का ताज।
नमन है मेरा आपको,
   हे श्रेष्ठ समाज।
नव संकल्पों का पाठ पढ़ाया ।
उंच-नीच का भेद मिटाया।
जिसने जानी तेरी महत्ता,
अमूल्य रत्न उसने पाया।
आप से ही है,इंसानियत को नाज।
नमन है मेरा आपको,
  हे श्रेष्ठ समाज..
   विनोद यादव
पंडरीपानी छुरा गरियाबंद 36गढ़
सच्चा पालक..
बुराइयों से लड़ना सिखाये,
अच्छाइयों के भाव भरे।
संस्कारवान गुणगान बनाकर,
राष्ट्र का निर्माण करे।
संग जिसके रहकर,
नेक बने बालक।
वही तो है इस जग में,
    सच्चा पालक..
माँ है तो ममता दुलार,
संग सादर सत्कार है।
पिता है तो डाँट सबक,
संग उसके पुचकार है।
औलाद का मार्गदर्शन करे,
बनकर वो चालक
वही तो है इस जग में,
     सच्चा पालक..
चुभे कांटे पैरो में उनके,
माँ बाप को दर्द होता है।
खुशियो की खातिर उनके,
माँ बाप को एहसास होता है।
चेहरे में दिखे जिनके,
शिष्टता की झलक।
वही तो है इस जग में,
     सच्चा पालक..
विनोद यादव
पंडरीपानी छुरा गरियाबंद 36गढ़

देवेन्द्र कुमार फुठहा करम की रचनाएँ

खुद को बेकरार करके...
उनको अपना यूँ राजदार करके,
गलती की उनपर ऐतबार करके
आने का वादा वक्त बीत जाता,
तन्हा ही है हम इन्तजार करके ।
अब तो मेरे ये आँसु रोज बरसे,
हम तो रोयें हैं,आज प्यार करके ।
अपने हिस्से में गम बेशुमार करके,
तड़पे खुद को यूँ बेकरार करके ।
पछताये हम तो लेनदार बनके,
सौदा घाटे का बार बार करके ।
हमने जाना जब ठोकरें मिली है,
भुल की रास्ता ये इख्तियार करके ।
       
कविता...
उसकी बिंदिया...
गजब नूर चेहरे में,उस पर वो काला तिल ,
सब हार बैठा मैं,ये मुझसे छीने मेरा दिल,
मैं सिमट जाना चाहता हूँ इन्ही के दरमियाँ,
उनके माथे की बिंदिया ही,मेरी दुनिया ....
निकल पड़ा हूँ मैं,अब उन्हें पाने की आश में,
चैन शुकुन,अपनी उस जिंदगी की तलाश में,
यारों आजकल मैं बड़ा बेसब्र सा हो गया हूँ,
उनकी बिंदिया चुरा ले गई,मेरी निंदिया ...

कविता...

रूठो ना....
अरे किसी से इतना ना रूठो
कि तुमको मनाने वाला ही तुम्ही से रूठ जाये..... 
जिसके साथ की हमेशा खुदा से मांगी थी दुआ ,
कही ऐसे में उसी का साथ छुट न जाये....
बड़ा बेहतरीन रिश्ता कायम है जो दोनों के दरमियाँ ,
कही वो रिश्ता पल भर में टूट ना जाये.....
       
कविता...
दीवानो के शहर में....
लगता है जैसे मैं सबको पहचानता हूँ,
मानो मैं यहाँ हर किसी को जानता हूँ,
आलम हैं,दीवानो सी,दीवानगी कर रहा हूँ,
जब से आया हूँ दीवानो के शहर में....
सारे दीवानो का ये अल्फाज पढ़ते हैं,
सबके दिलो का ये गहरा राज पढ़ते हैं,
बन जाते है,दिल की आवाज हमेशा,
सबसे बड़े दीवाने है ये मेरी नजर में...
सबके दिलो में प्यार का एहसास,
वादियों में घुली इश्क़ की मिठास,
चले दीवाने,करते मंजिल की तलाश,
फूलो की खुशबु बिखरी है इस डगर में...
चैन शुकुन खोकर करते इन्तजार,
मिलेगा यार,बातों पे करके ऐतबार,
दिल की कश्ती,धड़कनों की पतवार,
उतरे हैं, इश्क़ के समंदर की लहर में...
    
कविता ...
तलबगार....
तुझे पाकर फिर खो देने का डर है,
इससे अच्छा,
मैं तेरा तलबगार ही बेहतर हूँ.....
तुझे खुशियां दिलाना मेरा बस एक मकसद है,
और अपनी ख़ुशी के लिये,
मैं तेरे गमो का हिस्सेदार बेहतर हूँ....
तू लगा भले बेवजह इल्जाम मुझपर बेवफाई का,
पर तुझसे वफ़ा निभाने,
मैं तेरा गुनहगार बेहतर हूँ.....
कभी मरहम ना लगाना मेरे जख्मो पे,
जानकर मेरा हाल,
मैं तेरे इश्क़ में बीमार बेहतर हूँ....
मुझे ना दवा चाहिए ना ही दुआ,
हर हकीम जानता है,
कि करके तेरा दीदार बेहतर हूँ...
             

कविता ...

चिट्ठी...
जवान की चिट्ठी देशवाशियो के नाम ...
साथी सबके लिए खत लेकर आया है,
खुशियो की वो मोहलत लेकर आया है,
जवाब देने हैं हमें अब हर सवाल के,
आँखे नम मगर रखते हैं,सिसकियाँ सम्हाल के...
अपनों का ये हमें हाल चाल बताती है,
खत में अपनों की सूरत नजर आती है,
हमेशा से ही हमारा हौसला बढ़ाती हैं,
रखी है हमने, सारी चिट्ठियां सम्हाल के....
हर जगह दुश्मन पाँव पसारे मिलते हैं,
गली गली में जंग के नजारे मिलते हैं,
हम तो तैनात हैं सरहदों की सलामती को
आप रखना अपनी बस्तियां सम्हाल के
ये दुनिया मानो गहरा समुन्दर है,
कई राज छुपे हुये इसके अंदर है,
यहाँ जानलेवा भी लहरें उठती है,
रखना जिंदगी की कश्तियां सम्हाल के....
देशहित में हर कोई अपना योगदान दे,
जरूरी नही है कि प्राणों का बलिदान दे,
वक़्त पड़े तो सबकुछ न्यौछावर कर देना,
रखना सीने में वतन परस्तियां सम्हाल के...
कितनी भी मुश्किलें आये,राहों में,
रखना अपनी मंजिल, निगाहों में ,
भले तकलीफे सहनी पड़े सह लेना,
रखना हमेशा इंसानी हस्तियां सम्हाल के ...
होली हमारी बेरंग,दिवाली में भले उदास,
पर आपकी खुशियां हमारे लिए है खास,
इधर हम तो जीतें है बारूदों के साये में
आप जलाना घर में फुलझड़ियां सम्हाल के....
                  
           

कविता...

उनके बगैर...
उनके बगैर भी हम खुश रह लेंगे अकेले ही,
कह तो दिया...
मगर ऐसा है कि हमने,
    कभी अदाकारी नही की...
दिखाना चाहता था कि मैं भी गम सह सकता हूँ...
अरे कुछ देर और तड़प के ना धड़कता तो क्या था,,
मगर मेरी धड़कनो ने भी मुझसे वफादारी नही की...
जब वो जाने लगे दूर मुझसे,क्यों मेरा हाल ना समझ पाये....
लगातार यूँ ही आँखो से बहते रहे भले ,
मगर मेरे आंसुओं ने भी मेरी तरफदारी नही की....
        

हिंगलाज माई ...

मुक्तक - 01
सरन मा हव मै हिंगलाज माई वो
साज दे बिगड़े मोर काज दाई वो
भगत ला अब तो अपन दरस देखा जा
राख ले अब ते मोर लाज दाई वो ......
मुक्तक -02
भगतन के दुःख हरे तै बुढ़ीमाई वो
झोली मा सुख भरे तै महामाई वो
डोंगर मा तै बईठे घटारानी माँ
कतको ठन रुप धरे तै दुर्गा दाई वो.....


जिंदगी....
जिंदगी इक जंग का मैदान है
सोचना भी मत बहुत आसान है..
       जिंदगी का ये सफर थम जो गया
       आखिरी ठौर सबका शमशान है..
वक्त का ही खेल हैं जो हो रहा
फेर में इसके पड़ा इंसान है..
       शोर शराबा कभी होता दिखे
       दूसरे पल हर तरफ सुनसान है..
ना रही अब मांग कलियों की यहाँ
इधर कांटो से सजा गुलदान है..
       मंहगी होती सभी चीजे यहाँ
       जान लो अब आज,सस्ती जान है..
जिक्र ना हो जी रहे उस शख्स का
मौत पर होता यहाँ गुणगान है..
       जिंदगी तो अब पहेली बन रही
       जो इसे अब ना बुझे नादान है..

उड़ सी गई ख्वाब..
(गजल)
देखने की कभी भी लगी जो तलब,
आपकी ही गली में टहलता रहा।
       आप पलकों तले यूँ समाते रहे,
       नींद उड़ सी गई ख्वाब पलता रहा।
रोज ही राह तकते हुई है सुबह,
रोज ही इसतरह शाम ढलता रहा।
       वक्त ने की कई बार ये साजिशें,
       दे दगा वो मुझे रोज छलता रहा।
जंग अब है छिड़ी रोज ही नींद से,
रात भर करवटें मैं बदलता रहा।
       आपको देखकर हो गया मोम सा,
       मन्द सी आंच में मैं पिघलता रहा।
आपको यार अपना बना के खुदा,
पूजने का वही दौर चलता रहा।
       आप जानें लगे जब मुझे छोड़कर,
       तब खड़ा मैं वही हाथ मलता रहा।

गजल.....
आज उनका हो गया हूँ मैं बताकर चल दिए,
हक़ अभी से यार अपना वो जताकर चल दिए।
चोट सीने में लगी तो दर्द मीठा सा हुआ,
तीर आँखों से अभी जब वो चलाकर चल दिए।
जब निहारा आइने को यूँ बड़ी ही देर तक,
लाज से वो चेहरा अपना छुपाकर चल दिए।
इश्क़ उन्हें हो गया है ये पता है अब हमें,
हाँ कहा अपनी पलक वो जब झुकाकर चल दिए।
वो हमारी धड़कनों में यूँ समाते ही गये,
यार दिल में आशियाना वो बनाकर चल दिए
अब तलक तो मैं किसी से भी कभी हारा नही,
इश्क की बाजी मुझे अब वो हराकर चल दिए।
ये घना सा अंधियारा तो मिटेगा आज से,
प्यार की ये रौशनी जो वो जलाकर चल दिए।
इश्क के गहरे समुंदर में उतारी नाव जब ,
बन लहर आये मुझे तो वो डुबाकर चल दिए।
               
     देवेन्द्र कुमार ध्रुव....
    
ग़ज़ल
 
हसरतें थी कभी साथ ही हम रहे
क्यों तभी खामखां ये गिले हो गए..
दूरियां हो गई हमकदम ना रहे
आज ही ये सभी फैसले हो गए..
वक़्त के मार से बदलना ही पड़ा
आज ही खत्म सब सिलसिले हो गए..
छोड़ने का मुझे ले लिया फैसला
बेकदर बेवफा मनचले हो गए..
आसमाँ कर रहा दर्द को बारिशें
यूँ लगे आँसु भी जलजले हो गए..
जिंदगी खत्म हो अब यही बेहतर
यार अब पस्त सब हौसले हो गए....
           देवेन्द्र कुमार ....
गीतिका गुंजन

सफर मेरा उसी सुबह पूरा,
जब दिखेगा हसीं शहर उनका..
हम हमेशा मिले उसी दर पर,
यार होता जहाँ जिकर उनका..
अब ठिकाना बना रहे हम भी,
आशियाना खड़ा जिधर उनका..
हो गई है सलामती जाहिर,
पा गये जो अभी खबर उनका..
आज इतनी ख़ुशी मिली हमको,
अब दिखा है सही असर उनका...
        
     देवेन्द्र कुमार ध्रुव....