ललित साहू जख्मी की ताजी रचनाएँ
मेरी कमाऊ बीवी
असहाय पिता
वीरांगना बहू
मातृ पितृ दिवस
डमरू वाले बाबा
(व्यंग्य)
मेरे एक मित्र ने गंभीर चिंता जताई
मुझे मेरी बीवी की ढेरों गलतियां बताई
मुझे मेरी बीवी की ढेरों गलतियां बताई
अबे तू बडी गफलत मे है
कि कामयाबी उसके कदम चूमती है
असल मे तो तेरी बीवी
दिन भर सड़कों पर ही घुमती है
कि कामयाबी उसके कदम चूमती है
असल मे तो तेरी बीवी
दिन भर सड़कों पर ही घुमती है
जाने कितनी साडियां है उनके पास
की हर दुकान मे अस्तर और फाल ढूँढती है
अबे तू रहता है हर वक्त लुंहगी बनियान मे
जाने किसके लिए वो शर्ट और रूमाल ढूँढती है
की हर दुकान मे अस्तर और फाल ढूँढती है
अबे तू रहता है हर वक्त लुंहगी बनियान मे
जाने किसके लिए वो शर्ट और रूमाल ढूँढती है
अबे चूप कर ओ सुन लेगी
तु मुझे मरवायेगा क्या
उसके पैसों से ही घर चलता है
उसके बदले तु कमायेगा क्या
तु मुझे मरवायेगा क्या
उसके पैसों से ही घर चलता है
उसके बदले तु कमायेगा क्या
अबे वो इस घर मे इकलौती कमाऊ प्राणी है
घर के बर्तन से ज्यादा उसकी पेटी मे साडी है
घर के बर्तन से ज्यादा उसकी पेटी मे साडी है
खुद के पैसों से खरीदी
उसके पास अब नई गाडी है
गार्डन नही है गांव मे पर
भ्रमण हेतु जंगल झाडी है
उसके पास अब नई गाडी है
गार्डन नही है गांव मे पर
भ्रमण हेतु जंगल झाडी है
मित्र मेरा बहुत करीबी था
कौतुहल मिटाना भी जरुरी था
उसकी चिंता और गहराई
उसने कुछ बातें मुझे समझाई
कौतुहल मिटाना भी जरुरी था
उसकी चिंता और गहराई
उसने कुछ बातें मुझे समझाई
अबे कुछ नही तो बच्चे की परवरिश की सोंच
अगर इससे नही बनती तो दुसरी बीवी खोज
अगर इससे नही बनती तो दुसरी बीवी खोज
देख तेरी बीवी ईमानदारी से दफ्तर तो जाती नही
अपने हाथो से बनाकर तुझे खिलाती भी नही
अपने हाथो से बनाकर तुझे खिलाती भी नही
तू अपनी ही जिन्दगी से क्यूं खेल रहा है
खामोश रहकर तू इतना क्यूं झेल रहा है
खामोश रहकर तू इतना क्यूं झेल रहा है
तू सुन सकेगा? किस्से दो चार और सुनाऊं
तू बोल तो तालाक के पेपर मै बनवा के लाऊं
तू बोल तो तालाक के पेपर मै बनवा के लाऊं
मैने कहा अबे तू खुद जूते खायेगा
और क्या मुझे भी खिलायेगा
घर भी उसी के नाम पर है भाई
अब क्या मुझे घर से भी निकलवायेगा
और क्या मुझे भी खिलायेगा
घर भी उसी के नाम पर है भाई
अब क्या मुझे घर से भी निकलवायेगा
देख भाई वो कमाती है मै चूप बैठ खाता हूं
बच्चे को नहला खिला के रोज स्कूल पहुंचाता हूं
बच्चे को नहला खिला के रोज स्कूल पहुंचाता हूं
और तू मुझे खाली मत समझ
मै उसके चालक की नौकरी बजाता हूं
झाडू पोंछा, बर्तन और पानी भरके
सब्जी लेने भी मै ही तो जाता हूं
मै उसके चालक की नौकरी बजाता हूं
झाडू पोंछा, बर्तन और पानी भरके
सब्जी लेने भी मै ही तो जाता हूं
मेरा मित्र अब हार गया
मेरी अड़चन वह ताड़ गया
मेरी अड़चन वह ताड़ गया
अबे तू तो कभी शेर हुआ करता था
इतना डरने कब से लगा
बिल्ली को काबू तो कर ना सका
तू दुम हिलाने कब से लगा
इतना डरने कब से लगा
बिल्ली को काबू तो कर ना सका
तू दुम हिलाने कब से लगा
मैने कहा देख तू ज्यादा मत बोल
मेरे वैवाहिक जीवन मे जहर मत घोल
मेरे वैवाहिक जीवन मे जहर मत घोल
तू मेरी चिंता करता है मै जानता हूं
मेरे लिये तेरी संवेदनाएं मानता हूं
मेरे लिये तेरी संवेदनाएं मानता हूं
पर तू ही बता उसके कमाने मे बुराई क्या है
उससे लड़ के मार खाने मे बडा़ई क्या है
उससे लड़ के मार खाने मे बडा़ई क्या है
अब तो नारी उत्थान की ही बात हो रही है
कानून की धारायें भी उन्ही के साथ हो रही है
कानून की धारायें भी उन्ही के साथ हो रही है
मेरा बच्चा भी नौकरी पेशा से शादी कर लेगा
जैसे मैने किया वैसे वो भी बसर कर लेगा
जैसे मैने किया वैसे वो भी बसर कर लेगा
अबे तू बेमतलब ही इतना कुछ सोंचता है
राम और माया एक हि दुनिया मे खोजता है
राम और माया एक हि दुनिया मे खोजता है
बीवी रुपवती किस्मत से कमाऊ आई है
मै चूप हूं तू भी चूप रह इसी मे हमारी भलाई है
मै चूप हूं तू भी चूप रह इसी मे हमारी भलाई है
असहाय पिता
होती होंगी कई मौतें पेटो में ही,
बेटी.! पर मैनें तो तुम्हें मारा नही।
सबने टोका तुम्हें धरा पर लाने से,
पर मैं तो इस जग से हारा नही।
ना मैनें बुढ़ापे की ही चिन्ता की,
ना ही की वंश की खोखली बातें।
तेरी परवरिश की चिंता मे बेटी,
बिना सोये ही गुजारी कई रातें।
तेरे रोने पर मैं खीलौने ले आता था,
तुझे खुश देखने घोड़ा बन जाता था।
तुझे पढाने किताबें मै रट लेता था,
तुझे सुलाने कहानी मैं गढ़ देता था।
बोल बेटी तुझे किस मोड़ पर मैनें,
कमजोरी का अहसास कराया है।
जब-जब बदनामी की आंच आयी,
मैनें तुझे अपनी ओट मे छिपाया है।
सोलहवें बसंत की दहलीज पर,
तुमने गौण सारा संस्कार किया।
अजीब समानो, तंग कपड़ो से,
तुमने अपना साज श्रृंगार किया।
तब ना टोका तुम्हें, मैनें ये सोचकर,
कि तुम स्वछंद उड़ान भर पाओगी।
लड़को से भी बहुत आगे बढ़कर,
तुम इस दुनिया मे नाम कमाओगी।
जाने किसकी पड़ी है परछाई,
कि अब शत्रु मुझे समझती हो।
छोटी-छोटी बेतुकी बातों पर,
अपनी माँ से तुम उलझती हो।
मेरे इन कानों तक भी पहुंची,
तेरे प्रेम प्रसंग की कड़वी बातें।
भरोसा किन्तु भय पितृ हृदय मे,
चूंकि देखी है कलयुग की वारदातें।
एक ही सपना संजोया था बेटी,
पढ़ा-लिखा कर विवाह रचाने की।
वो भी तोड़ तुमने कसमे खा ली,
किसी और संग घर बसाने की।
थाम उंगली चलना सिखाने वाला,
क्या इतना भी काबिल ना रहा।
तेरे जीवन के अहम फैसलों पर,
बेटी.! मैं क्यों अब शामिल ना रहा।
बेटी.! पर मैनें तो तुम्हें मारा नही।
सबने टोका तुम्हें धरा पर लाने से,
पर मैं तो इस जग से हारा नही।
ना मैनें बुढ़ापे की ही चिन्ता की,
ना ही की वंश की खोखली बातें।
तेरी परवरिश की चिंता मे बेटी,
बिना सोये ही गुजारी कई रातें।
तेरे रोने पर मैं खीलौने ले आता था,
तुझे खुश देखने घोड़ा बन जाता था।
तुझे पढाने किताबें मै रट लेता था,
तुझे सुलाने कहानी मैं गढ़ देता था।
बोल बेटी तुझे किस मोड़ पर मैनें,
कमजोरी का अहसास कराया है।
जब-जब बदनामी की आंच आयी,
मैनें तुझे अपनी ओट मे छिपाया है।
सोलहवें बसंत की दहलीज पर,
तुमने गौण सारा संस्कार किया।
अजीब समानो, तंग कपड़ो से,
तुमने अपना साज श्रृंगार किया।
तब ना टोका तुम्हें, मैनें ये सोचकर,
कि तुम स्वछंद उड़ान भर पाओगी।
लड़को से भी बहुत आगे बढ़कर,
तुम इस दुनिया मे नाम कमाओगी।
जाने किसकी पड़ी है परछाई,
कि अब शत्रु मुझे समझती हो।
छोटी-छोटी बेतुकी बातों पर,
अपनी माँ से तुम उलझती हो।
मेरे इन कानों तक भी पहुंची,
तेरे प्रेम प्रसंग की कड़वी बातें।
भरोसा किन्तु भय पितृ हृदय मे,
चूंकि देखी है कलयुग की वारदातें।
एक ही सपना संजोया था बेटी,
पढ़ा-लिखा कर विवाह रचाने की।
वो भी तोड़ तुमने कसमे खा ली,
किसी और संग घर बसाने की।
थाम उंगली चलना सिखाने वाला,
क्या इतना भी काबिल ना रहा।
तेरे जीवन के अहम फैसलों पर,
बेटी.! मैं क्यों अब शामिल ना रहा।
पहली किरण संग उठ जाती,
सबको सुला के ही वो सोती है।
घर को अकेले संभालने वाली,
वो वीरांगना बहू ही तो होती है।
बच्चे की देखभाल ओ करती,
रोजाना दूध भी वही लेती है।
ससुर को देती ऐनक अखबार,
पति को चाय-काफी भी देती है।
ननंद की होती है ओ राजदार,
देवर के नखरे मस्ती सहती है।
देवरानी की गुरु, सखी, बहिन,
घर की रानी भी बहू ही होती है।
पाक कला मे निपूर्ण ओ होती,
सास की बातें सुनकर रहती है।
रहने दो माँ जी मैं कर सब लूंगी,
ऐसा सिर्फ बहू ही तो कहती है।
कपड़े बर्तन झाड़ू पोंछे का बोझ,
बिचारी चुप-चाप ही सहती है।
स्वस्थ दिखती है पर रहती नही,
दर्द मे ठीक हूं बहू ही कहती है।
होती है नौकरानी, चौकीदार भी,
बहू घर की साहूकार भी होती है।
ईश्वर का अहसास घर की लाज,
सर का ताज भी बहू ही होती है।
ससुराल का हर फर्ज निभाती,
धैर्य की मिसाल ओ होती है।
दो कुलों के मजबूत रिश्तों की,
अधार-शिला भी वही होती है।
सबको सुला के ही वो सोती है।
घर को अकेले संभालने वाली,
वो वीरांगना बहू ही तो होती है।
बच्चे की देखभाल ओ करती,
रोजाना दूध भी वही लेती है।
ससुर को देती ऐनक अखबार,
पति को चाय-काफी भी देती है।
ननंद की होती है ओ राजदार,
देवर के नखरे मस्ती सहती है।
देवरानी की गुरु, सखी, बहिन,
घर की रानी भी बहू ही होती है।
पाक कला मे निपूर्ण ओ होती,
सास की बातें सुनकर रहती है।
रहने दो माँ जी मैं कर सब लूंगी,
ऐसा सिर्फ बहू ही तो कहती है।
कपड़े बर्तन झाड़ू पोंछे का बोझ,
बिचारी चुप-चाप ही सहती है।
स्वस्थ दिखती है पर रहती नही,
दर्द मे ठीक हूं बहू ही कहती है।
होती है नौकरानी, चौकीदार भी,
बहू घर की साहूकार भी होती है।
ईश्वर का अहसास घर की लाज,
सर का ताज भी बहू ही होती है।
ससुराल का हर फर्ज निभाती,
धैर्य की मिसाल ओ होती है।
दो कुलों के मजबूत रिश्तों की,
अधार-शिला भी वही होती है।
मातृ पितृ दिवस
कुछ लोग मना रहे वेलेंटाइन डे,
कुछ मातृ-पितृ दिवस मनाओगे।
बस आज ही होगी उनकी पूजा,
कल पानी देना तक भूल जाओगे।
तुम इतने ही सच्चे सपूत हो तो,
क्या मोबाईल में फर्ज निभाओगे?
अगर मात-पिता ने समाधि ले ली,
फिर किस जन्म कर्ज चुकाओगे?
सामर्थ्य है तो सच्चा सम्मान करो,
बुजुर्गों के श्राप सेमबच जाओगे।
ढकोसलों का तमाचा गर उल्टा पड़ा,
आईने में शक्ल भी न देख पाओगे।
सिसकती रुंधित नारी समाज का,
क्या तुम दर्द समझ भी पाओगे?
गर पिता ने तुम्हें सम्पत्ति ही न दी,
क्या तब भी तुम शीश झुकाओगे?
लेन-देन को संबंध समझने वाले,
क्या वेदना रिश्तों की जान पाओगे।
समाज के जख्मी अंत:करण पर,
तुम किस मरहम का लेप लगाओगे?
गहरा जख्म भी तब भर जायेगा,
जब मिठे बोलो की झड़ी लगाओगे।
उनके बुढापे में हंसकर साथ रहो,
तभी तुम संतान का धर्म निभाओगे।
मातृत्व का अहसासकुछ मातृ-पितृ दिवस मनाओगे।
बस आज ही होगी उनकी पूजा,
कल पानी देना तक भूल जाओगे।
तुम इतने ही सच्चे सपूत हो तो,
क्या मोबाईल में फर्ज निभाओगे?
अगर मात-पिता ने समाधि ले ली,
फिर किस जन्म कर्ज चुकाओगे?
सामर्थ्य है तो सच्चा सम्मान करो,
बुजुर्गों के श्राप सेमबच जाओगे।
ढकोसलों का तमाचा गर उल्टा पड़ा,
आईने में शक्ल भी न देख पाओगे।
सिसकती रुंधित नारी समाज का,
क्या तुम दर्द समझ भी पाओगे?
गर पिता ने तुम्हें सम्पत्ति ही न दी,
क्या तब भी तुम शीश झुकाओगे?
लेन-देन को संबंध समझने वाले,
क्या वेदना रिश्तों की जान पाओगे।
समाज के जख्मी अंत:करण पर,
तुम किस मरहम का लेप लगाओगे?
गहरा जख्म भी तब भर जायेगा,
जब मिठे बोलो की झड़ी लगाओगे।
उनके बुढापे में हंसकर साथ रहो,
तभी तुम संतान का धर्म निभाओगे।
जब बड़ी हुई, घर में शहनाईयाँ बजी,
छोड़ आई मैं, बाबूल के दामन को।
अरमानों की फूलों से सुंदर सेज सजी,
ईश्वर मान लिया मैनें अपने साजन को।
सास, ननद, जेठानी ने भी खुब छेड़ा,
कहा कब चहकाओगी घर आंगन को।
शर्म से लाल हुई, पर मैनें कह ही दिया,
बित जाने तो दो जरा इस सावन को।
जाने कितने ही सावन हैं अब बित गये,
फिर भी कुछ नही है खबर बताने को।
सब चिंतित हुए, मेरा मन व्यथित हुआ,
अब कोई होगा या नही मुझे सताने को।
बैध हकीम सबने बड़ी पेशियाँ बांधी,
मैं दर-दर भटकी नाड़ी दिखाने को।
जाप किया, व्रत रखे, धागे भी बांधे,
फिर भी तड़पी मातृत्व सुख पाने को।
मैं अब मुंह फेरने लगी महफिलों से,
सह ना पाती थी अपनों के तानो को।
कुरेदते हैं घाव लोग बड़ी नजाकत से,
कुछ चले आये यूं ही हमदर्दी जताने को।
तभी एक रोज कोख से आवाज आई,
माँ.! मैं बेताब हूं कोख से बाहर आने को,
तूने मेरे लिए बहुत आंसू बहाये हैं, माँ.!
अब मैं तैयार हूं तेरा गम बिसराने को।
सुबक मैं रोने लगी..सपनों में खोने लगी,
कोई लफ्ज़ ही नही, अहसास कह पाने को।
खुश चेहरा, आँखों में आंसू, हांथ कोख पर,
इतना ही काफी है सारी बातें समझाने को।
छोड़ आई मैं, बाबूल के दामन को।
अरमानों की फूलों से सुंदर सेज सजी,
ईश्वर मान लिया मैनें अपने साजन को।
सास, ननद, जेठानी ने भी खुब छेड़ा,
कहा कब चहकाओगी घर आंगन को।
शर्म से लाल हुई, पर मैनें कह ही दिया,
बित जाने तो दो जरा इस सावन को।
जाने कितने ही सावन हैं अब बित गये,
फिर भी कुछ नही है खबर बताने को।
सब चिंतित हुए, मेरा मन व्यथित हुआ,
अब कोई होगा या नही मुझे सताने को।
बैध हकीम सबने बड़ी पेशियाँ बांधी,
मैं दर-दर भटकी नाड़ी दिखाने को।
जाप किया, व्रत रखे, धागे भी बांधे,
फिर भी तड़पी मातृत्व सुख पाने को।
मैं अब मुंह फेरने लगी महफिलों से,
सह ना पाती थी अपनों के तानो को।
कुरेदते हैं घाव लोग बड़ी नजाकत से,
कुछ चले आये यूं ही हमदर्दी जताने को।
तभी एक रोज कोख से आवाज आई,
माँ.! मैं बेताब हूं कोख से बाहर आने को,
तूने मेरे लिए बहुत आंसू बहाये हैं, माँ.!
अब मैं तैयार हूं तेरा गम बिसराने को।
सुबक मैं रोने लगी..सपनों में खोने लगी,
कोई लफ्ज़ ही नही, अहसास कह पाने को।
खुश चेहरा, आँखों में आंसू, हांथ कोख पर,
इतना ही काफी है सारी बातें समझाने को।
डमरू वाले बाबा
डम-डम-डम डमरू वाले,
रुप तेरा है बड़ा मनोहारी।
नमन तुझे हे कैलाश पति,
दुखियन के तुम हितकारी।
पापियों का तु महाकाल है।
तु ही जगत का पालनहारी।
जटा में गंगा गल सर्प हार है,
कंठ गरल धरे, हे विषधारी।
त्रिनेत्र से त्रिलोक है भयभीत,
प्रहार त्रिशूल का है भयंकारी।
भस्म से श्रृंगार किये है काया,
शिव-शंकर की नंदी है सवारी।
छल कपट से परे जग स्वामी,
नाम रटते भगत भोले भंडारी।
ओम नम: शिवाय जाप पावन,
जपते सारे देव दानव नर नारी।
तेरा बखान मेरे बस का नही,
जख्मी ने सर्वस्व तुझमे हारी।
जड़ चेतन सब तुझमे समाये,
तेरी महिमा प्रभु सबसे न्यारी।
नमन तुझे हे कैलाश पति,
दुखियन के तुम हितकारी।
पापियों का तु महाकाल है।
तु ही जगत का पालनहारी।
जटा में गंगा गल सर्प हार है,
कंठ गरल धरे, हे विषधारी।
त्रिनेत्र से त्रिलोक है भयभीत,
प्रहार त्रिशूल का है भयंकारी।
भस्म से श्रृंगार किये है काया,
शिव-शंकर की नंदी है सवारी।
छल कपट से परे जग स्वामी,
नाम रटते भगत भोले भंडारी।
ओम नम: शिवाय जाप पावन,
जपते सारे देव दानव नर नारी।
तेरा बखान मेरे बस का नही,
जख्मी ने सर्वस्व तुझमे हारी।
जड़ चेतन सब तुझमे समाये,
तेरी महिमा प्रभु सबसे न्यारी।
माँ के मन की
हाँ आज मैं खुश हूं,
हां-हां मैं बहुत खुश हूं।
मैं अब माँ बनने वाली हूं,
प्यारा सा बच्चा जनने वाली हूं।
पर सोंचती हूं, वो कैसा होगा ?
ऐसा होगा....या वैसा होगा.!
बेटी होगी तो पापा जैसी होगी,
बेटा होगा तो मेरे जैसा होगा।
सब कहते हैं बेटा घर का वंश होगा,
मै कहती हूं, वो मेरा ही अंश होगा।
बेटा हो या बेटी मुझे संतान चाहिए,
नारी तो हूं, पर माँ की पहचान चाहिए।
बेटा हुआ तो घर मे बड़ा स्वागत होगा,
बेटी हुई तो मुझसे सबको नफरत होगी।
बेटी को न्याय मै कैसे दिलाऊंगी,
क्या कहकर मै समाज को समझाऊंगी।
बेटा हो या बेटी एक ही एहसास होता है,
मातृत्व का अनुभव बड़ा ही खास होता है।
जो करते हैं मना बेटी पैदा करने से,
वो खुद ही बेटा पैदा कर क्यूं नही लेते?
शक है अगर उनको ईश्वर की रचना पर,
तो स्वयं काया कोई गढ़ क्यूं नही लेते?
अंतर्मन से जब देखे कोई मातृहृदय को,
तो पूर्ण कुदरत का आभास होता है।
अब मान भी लो बच्चा जनने का अधिकार,
सिर्फ और सिर्फ माँ के ही पास होता है।
मैं थोड़ी बड़ी होतीहां-हां मैं बहुत खुश हूं।
मैं अब माँ बनने वाली हूं,
प्यारा सा बच्चा जनने वाली हूं।
पर सोंचती हूं, वो कैसा होगा ?
ऐसा होगा....या वैसा होगा.!
बेटी होगी तो पापा जैसी होगी,
बेटा होगा तो मेरे जैसा होगा।
सब कहते हैं बेटा घर का वंश होगा,
मै कहती हूं, वो मेरा ही अंश होगा।
बेटा हो या बेटी मुझे संतान चाहिए,
नारी तो हूं, पर माँ की पहचान चाहिए।
बेटा हुआ तो घर मे बड़ा स्वागत होगा,
बेटी हुई तो मुझसे सबको नफरत होगी।
बेटी को न्याय मै कैसे दिलाऊंगी,
क्या कहकर मै समाज को समझाऊंगी।
बेटा हो या बेटी एक ही एहसास होता है,
मातृत्व का अनुभव बड़ा ही खास होता है।
जो करते हैं मना बेटी पैदा करने से,
वो खुद ही बेटा पैदा कर क्यूं नही लेते?
शक है अगर उनको ईश्वर की रचना पर,
तो स्वयं काया कोई गढ़ क्यूं नही लेते?
अंतर्मन से जब देखे कोई मातृहृदय को,
तो पूर्ण कुदरत का आभास होता है।
अब मान भी लो बच्चा जनने का अधिकार,
सिर्फ और सिर्फ माँ के ही पास होता है।
तन जाती मजबूत दीवार बन कर,
तकलीफों मे पापा संग खड़ी होती।
मैं बेटी अपने पापा की लाडली,
कोई जादूगर या जादुई छड़ी होती।
काश.. मैं थोड़ी और बड़ी होती...
तकलीफों मे पापा संग खड़ी होती।
मैं बेटी अपने पापा की लाडली,
कोई जादूगर या जादुई छड़ी होती।
काश.. मैं थोड़ी और बड़ी होती...
अपने पापा के आंखो की ज्योति
मै हृदय की अविराम घडी होती
धडकन बन मैं उनके दिल में रहती,
तकलिफें मेरे हिस्से भी पडी होती।
काश...मैं थोड़ी और बड़ी होती...
मै हृदय की अविराम घडी होती
धडकन बन मैं उनके दिल में रहती,
तकलिफें मेरे हिस्से भी पडी होती।
काश...मैं थोड़ी और बड़ी होती...
जन्म दिया, ना कभी भेद किया,
मैं भी उनके जीवन की लड़ी होती।
पढ़ा-लिखा कर बना दिया लायक,
दर्द देख पाऊं, मैं इतनी तो कड़ी होती।
काश...मैं थोड़ी और बड़ी होती...
मैं भी उनके जीवन की लड़ी होती।
पढ़ा-लिखा कर बना दिया लायक,
दर्द देख पाऊं, मैं इतनी तो कड़ी होती।
काश...मैं थोड़ी और बड़ी होती...
छोड़ बचपन की मैं अल्लढता,
सिढियां समझदारी की चढ़ी होती।
हांथो की लकीरें बनाती मैं खुद,
भविष्य परिवार का गढ़ी होती।
काश...मैं थोड़ी और बड़ी होती...
सिढियां समझदारी की चढ़ी होती।
हांथो की लकीरें बनाती मैं खुद,
भविष्य परिवार का गढ़ी होती।
काश...मैं थोड़ी और बड़ी होती...
युगों रखती नजरों के सामने,
मैं ऐसी मजबूत हथकड़ी होती।
जन्म-मरण का भेद ना होता,
मैं यमदूतों से गर लड़ी होती।
काश...मैं थोड़ी और बड़ी होती...
मैं ऐसी मजबूत हथकड़ी होती।
जन्म-मरण का भेद ना होता,
मैं यमदूतों से गर लड़ी होती।
काश...मैं थोड़ी और बड़ी होती...
ललित साहू जख्मी