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Wednesday, 31 August 2016

गुरुकुल ह इस्कूल बनगे

गुरुकुल ह इस्कूल बनगे,
रद्दा भुलागे सिक्छा।
सिस्यमन आगू बढ़त हे,
बिना देवाय परिच्छा।

राम-कृष्ण गुरुकुल जाके,
गुरु ले पाईन सिक्छा।
जग म ऊँखर पूजा होवथे,
कथा चलत हे अच्छा।

धनुरधारी बनेबर अर्जुन,
आँखी म मारिस तीर।
युधिष्ठीर भीम घलो सबल,
गुरु ह बनाइस बीर।

चाणक्य कर जाके चंन्द्रगुप्त,
देशभक्ति के सिक्छा पाईस।
अखंड भारत बनाके ओहा,
जग म नाव अपन कमाईस।

"समय" बदल गे, नीत बदल गे,
बदल गे सिक्छा के अधिकार।
सकल बिकास के नारा बदलगे,
गुरु अऊ सिक्छा होगे बेकार।

गुरु के पाँव परे बर आज,
चेला ल लाज आवथे।
गुरु-चेला के नत्ता गोत्ता,
एकरे सेती दुरिहावथे।

गुरुपुन्नी अब टीचरडे बनगे,
सर ह आज पूजाथे।
सरकार से बिनती हे सोचय,
सिक्छा कोन कोती जाथे।

रचना- हीरालाल गुरुजी"समय"
छुरा जिला - गरियाबंद

अवईया हावे तीजा-पोरा

उत्ता - धुर्रा चलावत हावे, कुम्हार अपन चाक,
बड़ जल्दी अवईया हावे, तीजा-पोरा के पाख।

कन्हार के माटी ल, बड़ सुग्घर सिरजावत हे,
रंग - बिरंगी नाद - बईला मनमाने बनावत हे।

पको डरे हे तिकर मन के, उघारत हे आंखी,
गुलाबी, लाल, सोनहा रंग ल पोतत हे काकी।

नानुक चुल्हा, नानुक बटलोही झारा बनाय हे,
बाल्टी, कढ़ई, तावा मे डंठल घलो धराय हे।

लईका रिझाये बर, गैस सिलेंडर घलो बनाय हे,
नाद-बईला के चक्का ल, रोंठ - रोंठ बनाय हे।

बईला गाड़ी म भर के, बेचे बर हाट जावत हे,
लेवईया आवत नई हे, बपूरा बईठे उंघावत हे।

तिहार ल दिन हे कहिके, कुम्हार आस लगाये हे,
फेर हमर संस्कृति बर परदेसिया घात लगाये हे।

अपन ल भुला के, पश्चिमी संस्कृति अपनावत हे,
सबो तिहार ल घर बईठे, मोबाइल म मनावत हे।

खेत-खार, तरिया-ड़बरा मसीन म खनावत हे,
गांव-गांव ले सिरतोन म, बईला हा नंदावत हे।

पलासटिक खिलौना हाट मे, आगे आनी-बानी,
कुम्हार के परवार बर कहां ले आये दाना-पानी।

ललित साहू "जख्मी"  छुरा
जिला - गरियाबंद (छ.ग.)

बरखा की पहली बूंद

तीव्र वेग समीर बह चली,
रजकण गर्दिश चुमने चली।

तरु की शाखा हिलने लगी,
कुछ तो साथ छोड़ने लगी।

मेघ काले मंडराने लगे,
रवि किरण धुंधलाने लगे।

विहंग कोठरों में दुबक गये,
मनुज कोठरी मे छुपक गये।

तड़ित की वैभव चमक उठी,
आकाशवाणी की शंखनाद उठी।

धीरे से छन-छन की आवाज कर,
बरखा की पहली बुंद,
         आई मेरे द्वार पर ।
         आई मेरे द्वार पर।

हीरालाल गुरुजी ''समय"
       छुरा-गरियाबंद

और भी हैं दाना मांझी

आज उसकी व्यथा देखकर,
अचानक ही सब गांधी हो गये।
बन के मांझी के शुभचिन्तक,
संवेदनाओं की आंधी हो गये।
     मानवता का यह उफनता जोश,
     मोबाईल तक ही थम जायेगा।
     दौंड़ता रक्त, आंखों का आंखों में,
     दो दिन में वापस जम जायेगा।
क्यों समझते हो, मांझी एक है,
मांझीयों की तो लंबी कतार है।
इंसानियत पर ऐसे किस्सों की,
अनगिनत सिसकियां उधार है।
     जो बने रहे, तमाशबीन परिदर्शक,
     बेशक उन सबको ही धिक्कार है।
     पर झुठा आंसू बहाने वाला भी,
     निहायत ही दोगला है, मक्कार है।
हर रोज कोई असहाय मांझी,
अपनी संगिनी का लाश ढोता है।
बताओ सोशल मिडिया वालों,
उसके साथ खड़ा, कौन होता है?
     तुम ही तो इंतजार करते रहते हो,
     किसी की आबरु के लूट जाने का।
     अब क्यों सहानुभूति दिखाते हो,
     किसी के सांसों के रुक जाने का।
बिना अॉक्सीजन के अस्पताल,
क्या तुम्हें, कभी नजर नही आते?
कुछ लाशें, यूं ही सड़ जाती है,
कोई उन्हें ले जाने भी नही आते।
     महज मोबाईल की सोहबत से,
     किसी मांझी का भला नही होगा।
     यकीन नही, तो इतिहास देख लो,
     बातों से ही, मुसीबत टला नही होगा।

ललित साहू "जख्मी" छुरा
जिला- गरियाबंद (छ.ग.)

अईसन छत्तीसगढ़ हे मोर

अईसन छत्तीसगढ़ हे मोर ...२
आदि -अनादि काल ले जेकर
   उड़त हावय सोर ...२ अईसन छत्तीसगढ़
१.
एकर महिमा में का बखानव
मोरतधज के नगरी हे ,
अत्रि ,श्रृंगी अउ बाल्मीकि के
छछले ज्ञान के गगरी हे ...२
संत भूमि ये छत्तीसगढ़ हा $$  २
सत के करे अंजोर ....अईसन
२.
कोसल के परताप ला देखव
महकोसल ये कहाये हे ,
राजिम लोचन ,कमल क्षेत्र ल
  कोख अपन सिरजाये हे ...२
पुन्य भूमि जिन्हा लव कुश जन्मे $$..२
कौशिल्या के ललोर ....अईसन
३.
सिरपुर ,भोरमदेव ,आरंग हर
  स्वाभिमान छत्तीसगढ़ के
अरपा ,पैरी ,महानदी हा
  जिनगी हे छत्तीसगढ़ के ....२
भेलई ,कोरबा ,बैलाडीला $$ हे ...२
एखर बहाँ सजोर ....अईसन छत्तीसगढ़...

रचना - धनराज साहू, बागबाहरा (छ.ग.)

Saturday, 27 August 2016

मैं छत्तीसगढ़िया किसान

मैं छत्तीसगढ़िया किसान
मिहनत मोर संगी मितान.....2
           ये माटी मोर माता......2
           आकाश पिता समान..
मैं छत्तीसगढ़िया किसान...........

1.  फोर के पथरा..ताप के भोंभरा
     भुंईया ल कोन सरग बनाही.....2
      ये धरती के मैं हौं सिपाही
      मोर सिवा अन्न कोन उपजाही...२
      घाम पियास अऊ बारो मास
      खेत म जी परान......
      मैं छत्तीसगढ़िया किसान.....

2.  बिजरी चमके बादर बरसे
      चारो डाहर होगे हरियाली....२
      जतके पानी ओतके पसीना
      तब आथे जी धान म बाली ....२
      बासी चटनी मैं ह खवईया
      ये ही हे मोर पहिचान......
      मैं छत्तीसगढ़िया किसान......

3.  घर कुरिया हे खपरा छानी
     चारो कोयि टपकय पानी.....२
      दुख दरद बर मैं संगवारी
      भाखा निरमल मंदरस बानी....२
     नवा रद्दा नवां अंजोर
     आगे नवा बिहान.....

     मैं छत्तीसगढ़िया किसान
     मिहनत मोर संगी मितान

रचना:-- दीनदयाल टंडन
शास .उ. मा. वि. पीपरछेड़ी

इंहे सरग हे

इंहे सरग हे$$$ इंहे नरक हे$$
इंहे करम धरम हे.....
झांकव अपन मन म
मिले काबर जीवन हे
इंहे जीयन अऊ मरन$$$..

बड़ दुख म $$$...२ ये काया पायेन
माया म भरमायेन
हीरा जइसन काया हमन के.....२
प्रभु चरनन म अरपन........
भाव भक्ति म होके मगन.....
इंहे जीयन अऊ मरन$$$....

लोभ मोह म $$$...२ रहिके सब झन
बिरथा जनम गवांयेन
आही बुढ़ापा कर पछतावा $$$...२
करके सेवा भजन ....
प्रभु के आयेन शरन$$....
इंहे जीयन अऊ मरन......२

प्रभु के बिना $$..२इक हिलय न पत्ता
और चलय न सत्ता
भवसागर से तर जा मनवा....२
बनके राम किसन ...
अंधरी अंधरा के बन जा सरवन....
इंहे जीयन अऊ मरन.....

इंहे सरग हे$$$ इंहे नरक हे$$
इंहे करम धरम हे.....
झांकव अपन मन म
मिले काबर जीवन हे
इंहे जीयन अऊ मरन$$$..
इंहे जीयन अऊ मरन ।

रचना:-- दीनदयाल टंडन
शास .उ. मा. वि. पीपरछेड़ी

क्या लिखूँ

सोचता हूँ क्या लिखूँ ?
किस पर लिखूँ ?
गर्त में जाते पथभ्रष्ट पर,
दिशाहीन समाज से,
क्या प्रेरणा लूँ ?क्या सीखूँ ?

स्वार्थ का अजगर,
निगल रहा सब कुछ।
शोषण का जोंक खून चूस रहा,
दृष्टिहीन भ्रमित विनाश को आतुर।
बस भेड़ चाल अपना रहा
हिस्सा हूं मैं भी इसी भीड़ का,
फिर सबसे जुदा कैसे दिखूँ !
सोंचता हूँ..............

नफरत का लावा धधक रहा,
सहमी सी घबराई सी मानवता।
सिसक-सिसक कर रो रही,
प्रेम के नाम पर मैं क्यों मिटूँ।
सोंचता हूं.................

करुंगा उपभोग हर एक पल का,
जीवन का रस लूंगा क्षणिक,
नस्वर जीवन का,
वर्तमान है बस मेरा।
खुद के लिए जिऊँ,
अनिश्चित भविष्य के लिए,
जहर का प्याला भला मैं क्यों पीऊँ ?

सोचता हूँ ठहर जाऊँ,
बस अब ना लिखूँ, ना लिखूँ ।

रचना - रीझे यादव  ग्राम - टेंगनाबासा

अच्छा दिन आवत हे

खेत परिया परे हे,
दाई मुड़ ल धरे हे,
सुत उठ के बड़े बिहनिया,
टूरा भट्ठी जावत हे।
अच्छा दिन आवत हे...।

खेत खार ल बेच के ददा ,
टूरा ल पढ़ावत हे,
पढ़ई लिखई ल छोड़ के टूरा,
दिन भर गाड़ी दउड़ावत हे।
अच्छा दिन आवत हे...।

टूरा के जइसन तइसन होही,
टूरी संसो म डारत हे,
कोन जनी कोन पइसा भरात हे,
रातदिन मोबा म गोठियावत हे।
अच्छा दिन आवत हे...।

डीजे डांस के चर्चा हे,
नाचा गम्मत म बड़ खर्चा हे,
अइसन सोंच अऊ गोठ के सेती,
नाचा लील्ला नंदावत हे।
अच्छा दिन आवत हे...।

छत्तीसगढ़िया जिहां के तिहां रहिगे,
परदेशिया मन अघुवावत हे।
हमरे बाना ल मारके,
हमीं ल टुहूं देखावत हे।
अच्छा दिन आवत हे...।

दार के भाव टिलींग म चढ़गे,
गोंदली ह रोवावत हे।
एक रुपया किलो के चांउर ल मंगलू,
नून मिरचा संग खावत हे।
अच्छा दिन आवत हे...।

रचना - रीझे यादव, ग्राम - टेंगनाबासा (छुरा)

आठे के तिहार

बिहिनिया ले सुत उठ के,
जम्मो संगवारी सकलावत हे।
चारो मुड़ा गली - खोर म,
दही के हाड़ी हा छंदावत हे।
          केरा अऊ सेव लटका के,
          डोर ल टिलिंग म बंधवावत हे।
          कतको जगा तो ऊंच खंभा म,
          ओंगन तेल ल पोतवावत हे।
नान्हे-नान्हे नोनी बाबू मन ल,
राधा अऊ किसन बनावत हे।
नान्हे लईका मन बर खाल्हे म,
आनी-बानी के खेल करावत हे।
           निकरे जम्मो गोविंदा बन के,
           गली-खोर वृंदावन बन जावत हे।
           जगा-जगा गोविंदा टोली मन,
           हाड़ी फोर के, दहीे लूट मचावत हे।
धनिया सक्कर के परसाद ल,
घरो - घर भूंज के बनावत हे।
लांघन रही के दिनभर जम्मो झन,
प्रभु के सुग्घर भजन ल गावत हे।
           प्रभु के जनम धरे के बेरा म,
           जम्मो आरती बिधुन गावत हे।
           प्रभु के झुन्ना ल डोला के जम्मों,
           आठे के तिहार ल मनावत हे।

ललित साहू "जख्मी" छुरा
जिला - गरियाबंद (छत्तीसगढ़)

हे सिक्छा मईया

हे सिक्छा मईया,तैं बड दुबरागेहस
गियान के देवईया दाई,कईसन छंदागेहस
पहिली बुनियादी सिक्छा,अउ चलिस परीच्छा
फेर आईस एमजीएमएल,अब आरटीई के खेल
सिक्छाविद् के घानी म, गू़ुरूजी-लईका फंदायहे 
अउ तोर दूनो आंखी म, परयोग के फेटा बंधाय हे
गुरूजी-अउ लईका संग,अब तहूं घिलरागेहस
हे सिक्छा मईया.......

मिसन के जमाना हे, संकुलप्रथा आगे हे
सरकारी खजाना म, अधिकारी मन छागे हे
छकत ले खानथे,अउ तरी-ऊपर बांटत हे
अउ खूसूर-फूसूर कहत हे जी, पईसा ह बांचत हे
लईका ह दुच्छा होगे,संग तहूं ह सोंटागेहस
हे सिक्छा मईया ......... 

अंगरेजी ईस्कूल बाढत हे, सरकारी नंदावत हे
नेता एखर पाछू हे,मनचाहा कान्हून बनावत हे
जे ऊप्पर ले बने दिखथे,अउ भीतर ले घूनावत हे
अब गुरूजी घलो संग देवत हे, कागजी घोडा दऊडावत हे
पालक घलो सुते हे,तैं करजूग ल काबर लादेहस
हे सिक्छा मईया ........

आरटीई के जमाना हे,फेल नई करना हे
मारपीट गारी बंद हे, खेल-खेल म पढना हे
कोन्हों लईका मूंहजोरी करथे, कोन्हों मुडी म चढत हे
लईका मन ह का पढही जी, अब गुरूजी ह पढत हे
मंझनिया जेवन जम्मो खात हे, अउ तहूं हर भूखागेहस
हे धरती मईया, तैं बड दुबरागेहस
गियान के देवईया दाई, कईसन छंदागेहस
-------------------------
रचना:- ललित वर्मा,"अंतर्जश्न" 

हमर ईस्ट देवी

अवतार लिस तिथि सात के,
हमर ईस्ट देवी राजिम माता।
ओकर किरपा ले सब फले फूले,
संगे हे ममता दुलार के नाता।

धन हे राजिम लोचन के मया छाँव,
जेकर ले चलत हे हमर घानी जांता।
ओ खुस हे धन, धान, संतान पाके,
जे एक घंव चढ़ गे माँ के अहाता।

हिजगा मे, हम भाईचारा भूला गेन,
करके झगरा फोरत हन अपन माथा।
मंद महुआ काकरो छुटत नई हावय,
अपने गाल म मारत हन, अपने चांटा।

सबके करनी माता देखत हावय,
राखे हावय जम्मो के करम खाता।
मया बरसात हे, माँ झडी़ बादर कस,
अऊ हमन बईठे हन ओढ़ के छाता।

जेन मनखे ल समझिस दुनिया अछूत,
अऊ लगा दिस मंदिर के सकरी फाटा।
ओकरे हाथ ले भगवान खिचरी खाये,
अईसन परतापी हे हमर गुरु माता।

पाप मोचनी एकादशी के जनम धरे,
जेला कहिथे जम्मो झन कर्मा माता।
तेली समाज बर ओ जिनगी पहा दिस,
ओकर गोड़ म मेहा नवात हो माथा।

ललित साहू "जख्मी" छुरा
जिला - गरियाबंद (छत्तीसगढ़)

धरती दाई के कोरा

धरती दाई के कोरा जी संगी मोर,बड नीक लागे मोला |
मया के बंधना अउ दया के झूलना म,झूलत हे मोर चोला||
चईत महिना रूख-राई ल,नवसिंगार पहिरावय
बईसाख महिना दुलहा-दुलहिन, नवा घरबार सजावय
जेठ महिना बरसे सुरूज,जरे बनकचरा होरा
धरती दाई ............

असाढ महिना गरजे बादर,नवा फसल ह बोवावय
सावन-भादो रोपा-बियासी,खेतखार लहलहावय
ऊसर-पूसर के बरसे बरखा,नदिया-नरवा पूरा
धरती दाई के...........

कुंआर महिना पीतर-पाखी, नवरात जोत जलावय
कातिक महिना दसेरा-देवारी, जगमग दियना जलावय
अघ्घन महिना धान-मिंजई जी, भरगे कोठी-टोला
धरती दाई के .........

पूस महिना जाड जनावय,मांघ म सकरायत जावय
फागून महिना फाग-नगारा, रंग-अबीर उडावय
माते बसंत फूले फूलवारी,झूमें ये मन-भौंरा
धरती दाई के कोरा जी संगी मोर,बड नीक लागे मोला
मया के बंधना अउ दया के झूलना म,झूलत हे मोर चोला |
-------------------------
रचना:- ललित वर्मा,"अंतर्जश्न"

Sunday, 21 August 2016

स्मरण साहित्य समिति के  सम्मलेन की झलकियां। .......







दिल के एहसास

जब कोई परंपरा,
दिल से निभाई जाती है।
रित बन जाती है।

जब कोई प्रेम,
दिल मे बसाई जाती है।
प्रीत बन जाती है।

जब कोई धुन,
दिल से गुनगुनाई जाती है।
गीत बन जाती है।

जब कोई वाद्य,
दिल से बजाई जाती है।
संगीत बन जाती है।

जब दिल के एहसास,
कलम की नोंक पर आती है।
वही कविता बन जाती है।।

ललित साहू "जख्मी" छुरा
जिला- गरियाबंद (छत्तीसगढ़)

जिन्दगी की कश्ती

कभी पेट में तो कभी झोपड़ियो में
आग ही लगती है गरीबो की बस्ती में

लगता है डोर सचमुच गैरो के हाथ है
तभी हारकर कोई लटकता रस्सी में

हमेशा बीच भंवर में डूब ही जाती है
सुराख इतने है जिंदगी की कश्ती में

कोई अपनी जरुरते भी नही जुटा पाता है
कोई मगरूर है अपने पैसो की शक्ति में 

मतलबी दुनिया के राज बड़े गहरे है
दिखावा है जो डूबे कोई भाव भक्ति में

अक्सर कीचड़ उछाले जाते है औरो पर
ताकि दाग ना लगे बड़े लोगो की हस्ती में 

कही लोग भूखे मर जाते है आये दिन
कही खाना बर्बाद होता है मौज मस्ती में

आँखों से नींद भी रूठ गई है इनकी
घूमते है आवारा जैसे निकले हो गश्ती में]

कई वादे करते है गरीबो से ताज के लिये
भूल जाते है सब जब चढ़ जाये तख्ती में

सब दिखता है पर नजरअंदाज करना है
तो ढँक लो ये आँखे बेईमानी की पट्टी में

 रचना  देवेन्द्र कुमार ध्रुव (डीआर)
           फुटहा करम बेलर
        जिला गरियाबंद (छ ग)

नवा इतिहास

  
आओ जुरियाके भाई,सब आघू बढ़न जी
चलो जुरमिल के नवा इतिहास गढ़न जी ।।

1.
ये भुँइय्या ला तीरथ बना लन
ये माटी के चन्दन लगा लन ।।2
आंच आये नही ...हो 2
जान जाये भला ...आंच ....2
साँस सुनता म करके संग चलन जी ।

2.
उंच -नीच के गड्ढा ला पाटव
भेद - भाव के डिपरा ला खाचव।
इरखा छोड़ो जलन ..हो 2
  प्रेम राखो जतन ...इरखा 2
एक दूसर संग सुग्घर बेवहार करन जी।।

3.
ग्यान, ध्यान ,सनमान बढ़ा लन
जिनगी के हम मोल ला जानन ।।
जिनगी अनमोल हे ...हो 2
  ना एकर तोल हे ...जिनगी 2

अपन जिनगी के संगी सिंगार करन जी।।
चलो जुरमिल के नवा इतिहास गढ़न जी।।

रचना -धनराज साहू बागबाहरा

कोरा म समा ले

हमन तोर नानकुन लईका,
तैं हरस  हमर  महतारी।
         तैं करेस तियाग अब्बड़,
         हावय अब  हमर पारी।
तोर सरन म खेलेन बाढ़ेन,
अऊ करेन खेती - बारी।
         नई जानेन अपन काम-काज,
         दिन पोहायेन, करके हम चारी।
तैं हा दै वरदान खनिज के,
मर गेन करके हम अलाली।
         दुसरा के हम गोड़ धोयेन,
         भाई बर गेन कोतवाली।
नौकरी करके नौकर बन गेन,
भुला गेन नागर अऊ तुतारी।
         नकल करके अकल गवायेन,
         बेचा गे, घर के लोटा थारी।
तसमा लग गे, चूंदी झर गे,
लग गे फैसन के बिमारी।
         कोई मनखे बाचे नई हे ,
         करे बर ब्यसन अत्याचारी।
कतका ल गिनाव मेहा,
करनी हे मोर बड़ भारी।
         कोरा म समा ले मोला,
         हे छत्तीसगढ़ महतारी।।

ललित साहू "जख्मी" छुरा
जिला -गरियाबंद (छ.ग.)

मैं मुर्दा हूं

मैं मुर्दा हूं
तुम्हें जीना सीखा रहा हूं
तिमिर रंध्र गलियों में कब से
अनहद गीत गा रहा हूं
मैं मुर्दा हूं तुम्हें जीना सीखा रहा हूं।

अरे! भौतिकता में मस्त मानवों
अत्याधुनिक दानवों
तुम सरपट भागे जा रहे हो
तुम्हें पता है? तुम कहां जा रहे हो?
तनिक रूको, मुझे देखो
मैं तुझे तेरा भविष्य दिखा रहा हूं
मैं मुर्दा हूं, तुम्हें जीना सीखा रहा हूं।

अरे! धर्म की गठरी धोने वालों
धार्मिकता की आबरू लूटनें वालों
तुम व्यर्थ गाल बजा रहे हो
तुम्हें पता है,तुम क्या कह रहे हो
तनिक रूको, मुझे सुनों
मैं प्रणव का धुन सुना रहा हूं
मैं मुर्दा हूं, तुम्हें जीना सीखा रहा हूं।

अरे! खुदा की चाह में घर छोडनें वालों
सृष्टि का पथ मोडनें वालों
तुम जीवन के विरूद्ध जा रहे हो
तु्म्हें पता है,तुम क्या कर रहे हो
तनिक रूको,सेवा करो
गृहस्थी कूंभ है,तुम्हें यह बतला रहा हूं
मैं मुर्दा हूं,तम्हें जीना सीखा रहा हूं ।

      रचना:- ललित वर्मा "अंतर्जश्न" छुरा

 ऐसे ही सावन में 

सरसराती पवन के झोंके
देखो तेज बारिश की बौछार,
रिमझिम की मदमस्त छीटें
करती हरियाली का मनुहार।

मन मयूरा नाचे मेरा ऐसे ही सावन मे,
बरस रे बदरा बरस मेरे घर के आंगन मे ।।

बेलपत्र, धतुरा, दुध और दही
लिये खड़े सब मंदिर के द्वार,
बोल - बम का जाप निरंतर
करते भोले के भगत हजार ।

जपुं मैं भी भोले को ऐसे ही सावन मे,
बरस रे बदरा बरस मेरे घर के आंगन मे ।।

झूले पर झूलती सखी-सहेली
हर्षित मन हो उठता अपार,
निश्छल स्वच्छंद उनकी हंसी
संग खिलखिला उठता गुलबहार ।

खुशियां मैं भी पा लूं ऐसे ही सावन मे,
बरस रे बदरा बरस मेरे घर के आंगन में ।।

खल-खल कर बौराती नदिया
तृप्त धरती, बावले तरण ताल,
नवसृजन का ये पावन महीना
देखो बेल लताओं के बुने जाल ।

मैं फिर से जी उठा, ऐसे ही सावन में,
बरस रे बदरा बरस मेरे घर के आंगन में ।।

ललित साहू "जख्मी"  छुरा
जिला-गरियाबंद (छ.ग.)

बात लागे न बानी

अरे बात लागे ना बानी
  काकर कंहाव कहानी ।।
दुःख पाय ,छेवारी सही ,
सरी-सरी रात हे
सुक्खा हावय हड़िया-तउलिया
  बासी हे न भात हे ....
मोरत धज के राज म,नइये कोनो दानी ।।...अरे बात लागे..

बड़का -बड़का ,बिल्डिंग मन में
  भारी मन्थन होवत हे ...
कागद -पतरा,सियाही मन में
  किसानी ला बोवत हे ...
बैठांगुर मन राज करत हे ,खंतिहा करे किसानी ...।। अरे बात लागे...

काहर -माहर ,धान ममहावे
  पछीना म नहाये हन ...
मिहनत के हम अतर छीत के
   अन ला उपजाये हन ...
सोसन ,अईताचार दुनो के होवत हे मितानी ...।।अरे बात लागे ....

थूंक म लाडू ,बांधत हावय
  पाग घलो छरीयावत हे
वहू लाडू ल ,खुदे खांत हे
   हम ल टूहूँ देखावत हे ....
दूध -दही ह नोहर होगे ,उंकर घर दुहानि ....।। अरे बात लागे न

हमरो गलती कमती नइये
  जुलुम सहिना ,पाप हे
कोंन जनी कब बुध हा आही
   अपनेच्च्च मन सब साँप हे ...
अपने मन हा चाबत हावय,मांग सकस नई पानी ...।।अरे बात लागे ...

रचना -धनराज साहू बागबाहरा

बेटी के सिक्छा अऊ संस्कार


मानुस जनम धरे के करजा उतार लव
बेटी ल सुघ्घर सिक्छा अउ संस्कार दव।

बेटी ह बने पढही,भविस्य ल सुघ्घर गढही,
पुरखा रीत-नेत पाही,धरम अउ नेंग निभाही।
सिरजनकर्ता ल सिरजन के हथियार दव,
बेटी ल सुघ्घर सिक्छा अउ संस्कार दव।

बेटी घर के मान,मर्यादा-सम्मान
दाई के हरे करेजा,ददा के नाक-कान
समता-ममता के गोदी म मया दुलार दव,
बेटी ल सुघ्घर सिक्छा अउ संस्कार दव।

बेटी मईके के डोंहडी,पिया के घर के फूल
दुनो बगिया म महके,अईसन सींच मत भूल
सीख अउ सदगुन के सोला सिंगार दव,
बेटी ल सुघ्घर सिक्छा अउ संस्कार दव।

बेटी सुख के सागर,सेवा करे उमर भर
गृहस्थी के एकठन मुडका,घर थामे रहिथे 
सुघ्घर  सिक्छा के छानही संस्कृति के मिंयार दव,
बेटी ल सुघ्घर सिक्छा अउ संस्कार दव।

मानुस जनम धरे के करजा उतार लव
बैटी ल सुघ्घर सिक्छा अउ संस्कार दव।

रचना:-ललित वर्मा "अंतर्जश्न" छुरा