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Monday, 25 July 2016

बैरी सावन तैं आये काबर

बैरी  सावन  तैं   आये  काबर
मन म  आगि  लगाये  काबर
ले  दे  के  तो  भूलावत  रेहेंव
तैं  फेर  सुरता  देवाये  काबर

वोखर तो आंखी हे बादर कस
तैं अऊ बदरिया बुलाये  काबर
अंतस  म ओला लुकाये  हाबौं
तैं ये बात सबला  बताये काबर

ओला  झुलाथंव मन  डोर खिंच
तैं  अऊ झुलना  बंधवाये काबर
तोला अईसन तरसाना रीहिस त
जीनगी म  पिरित  हमाये काबर

नई हांसन देस ओकर  संग मोला
त घाव ल खोरच के रोवाये काबर
आंसू  पी के 'जख्मी' जियत  हाबे
तैं फेर मन म आस जगाये  काबर

ललित साहू "जख्मी" ग्राम - छुरा
जिला - गरियाबंद ( छ.ग. )

मोर चाहना

अमन-सान्ति के बिरवा बोवईया बर
लोटा-चरू बन जातेंव |
मानवता के रद्दा चलईया बर
कल्प-तरू बन जातेंव ||

नारी-जाति के सेवा करईया
खोजत हंव ईनसान ल भईया
दाई-ददा के पीरा हरईया
सरवन जईसे महान ल भईया
अईसन के भवपार करेबर--२
नईया-हरू बन जातेंव
मानवता के ........

आज धरम के ठेका लेवईया के
बाढे हे गरब-गुमान जी भईया
स्वारथ म सब बूडे हाबय
गियान ले हे अनजान जी भईया
अईसन भोगी-ढोंगी मनबर--२
करेला-करू बन जातेंव
मानवता के.......

देस के रक्छा करथे बेटा
जाड-घाम घलो झेलथे बेटा
हमर सुख-चैन के खातिर
लडथे-मारथे-मरथे बेटा
अईसन सैनिक परवार बर--२
पीरा-हरू बन जातेंव
मानवता के ..........

आज देस ल लूटथे नेता
गांव-गरीब ल चूसथे नेता
कानून आंखी म डारे हे फेटा
मजा करथे जी पापी के बेटा
अईसन घूना-माहू मनबर--२
जहूर-करू बन जातेंव
मानवता के..........

कलजूग के जी छागेहे बादर
अंतस म भरे काजरे-काजर
छल-कपट के बाजथे मांदर
नाचथे-गावथे पाप के गागर
अईसन जनबर जम सही मैं--२
सजा-करू बन जातेंव
मानवता के .......

जब महामारी के परही चपेटा
त्राहि-त्राहि करही माटी के बेटा
रूख-राई अउ चिरई-चुरगूल
गाय-गरू घलो आही लपेटा
अईसन म मैं पीरा हरईया--२
दवा-दारू बन जातेंव
मानवता के ...........

अमन-सान्ति के बिरवा बोवईया बर
लोटा-चरू बन जातेंव |
मानवता के संग चलईया बर
कल्प-तरू बन जातेंव ||

         रचना:- ललित वर्मा,छुरा 

सिंगार ..


का मैं सिंगार लिखव
  का करव बखान ओ ...२

जब ले देखेव तोला बही ...
   होगेंव हलाकान ओ ...जब 

तोर रूप म गोई ,भगवान देखे हौ,
  मान झीन मान ,मोर परान देखे हौ।।

हिरदे के पंछी ,कुहुक मारे मन ला
  नैना के आगी ,जराए मोर तन ला ..
मुस्की ह तोर मोर ,दुःख ल मेटाये
  रेंगना ह तोर, मोर मन ल लुभाये ..२
अंतस म तोर ,पहिचान देखे हौ ..मान

सुरता हा आठो पहर ,मन ल मताथे
तोर बोली बैना ह हिरदे जुड़ाथे ..२
आंखी के काजर ले बदरी लजाथे
तोर होंठ देख बही कमल मुसकाथे ..२
तोर बर मोर मन मा सनमान देखे हौ..
           मान झीन ...

गोई तोर बेनी के गजरा बन जातेव
माथे के टिकली बन ,महू इतरातेव.२
हार बन जातेव में तोर गर के संगी
गीत बन जातेव में तोर स्वर के संगी.
गीत म मोर तोरेच मुसकान देखे हौ..२

मान झीन मान ,मोर परान देखे हौ।।

गीतकार - धनराज साहू , बागबाहरा

क्या ये वही आजादी है

अपने जेबों मे नोटे रख कर
कहते आदर्श हमारे गांधी हैं
अब वही हांथ वहशी हो गए
जिन हांथों पर राखी बांधी है

जैसा बापू ने बूना था
क्या ये वैसा ही खादी है
जिसकी खातिर वीर शहीद हुए
क्या ये वही आजादी है

अपने बच्चों का लहू देख
हर रोज तिरंगा रोता है
कायर आतंकी करतूतों से
मेरा भारत शर्मिंदा होता है

तलवे अमीरों के चाट रहे
क्या आत्मा जिल्लत की आदी है
जिसकी खातिर टूकड़ों मे बांटे
क्या ये वही आजादी है

सरहद की लड़ाई ने
मानवता का शीश झुकाया है
जान लूटा कर जवानों ने
माँ का कर्ज चुकाया है

लालच से सनी राजनीति
बारुद घूली सारी वादी है
जिस पर अमन टिक सके
क्या ये वही आजादी है ?

दंगे लूट बालात्कार की
रोज-रोज कहानी होती है
आधुनिकता की चकाचौंध मे
गुमराह जवानी होती है

जिसने खुद को दो भाग किया
आज ओ माँ सिसक कर रोती है
जिसमें बहन बेटियों की लाज रह सके
क्या ये वही आजादी है

ललित साहू "जख्मी" ग्राम - छुरा
जिला - गरियाबंद ( छ.ग.)

सरकार

मुक्तक -
" कइसे ये सरकार हे जी
     कइसे ये सरकार ...म
जनता के जो काम न आये ,
समझो हे बेकार ......।।"
कइसे होगे रे सरकार
   जे आथे .....होथे लचार...
       देखो का होही ....२

भूख ,गरीबी ,मंहगाई म
सोन चिरईया ,फंदागे हे ।
रक्छा करईया सुरसा होगिन,
  मानवता हा,नंदागे हे ।।
संसद होगे ,तारे -तार ...
  संत्री -मंत्री ,दागदार ...सोचो का होही

नीति -नियम के,सोर नइये ..
  मन -मरजी ,चलात हे ।
जेहर पाथे ,तेहर दुहथे ...
   धारे - धार बोहात हे ...।।
जिहा जनता हे बीमार ...
  जिहा भरे परे गद्दार ...सोचो का होही ।।

फोकटाहा माल ,खवैया होगिन
  मिहनत ले जी चुरात हे ...।
मंद -मऊहा के फेर म परके,
  खेत -खार हा बेचात हे ...।।
राईट होगे हे मतवार ....
   घर के होगे ,बंटाधार ...सोचो का होही ।।

कोंन हा आही ,किसना बनके
   दुस्ट कंस ल मारे बर ...।
कोंन ह बनही राम इंहा के ..
   दुखी प्रजा ल तारे बर ...।।
जिहा सोच म बेभिचार ....
   नइये कोनो ल दरकार ...
देखो का होही ...सोचो का होही..।।

रचना -धनराज साहू 
बागबाहरा

किसानी के पीरा

अब बिजहा घलो सिरा गे हे मितान
अईसन म परही अकाल त का होही
ब्यासी के दिन म भूंजावत हे धान
अब किसान अउ कंगाल का होही

दाई के आंखी घलो अब दिखे नही
तिही बता मितान मोर हाल का होही
बईला मर गे पैरा जर गे घर उजर गे
ऐखर ले ज्यादा हाल बेहाल का होही

खेत बोंआ गे बन निंदा गे दवई छिता गे
फेर ठाढ़ सुखा खेत म फसल का होही
धान तो हो जही फेर उधारी के पुरतिन
मोर बाढ़े नोनी के बिहाव अब का होही

लईका असन धान ल सहेज के राखेंव
अऊ खरही रचेंव लान के घर दुवारी मे
बरसे के दिन म नई बरसिस बैरी बादर
बैरी अब अंधियारे हे अब मिंजई का होही

तोपेंव तभो ले पानी पा के धान करिया गे
गाड़ी लहूट गे मंड़ी ले सरकारी मगजमारी मे
अब तो बोनस के आस घलो नई हे मितान
अईसन म करजा छोंड़ तेल नून के का होही

बियाज के अऊ बियाज जुड़त हावय
हम तो मर गेन साहूकार के मक्कारी मे
अऊ सरकार चूप तमासा देखत हावय
येखर ले ज्यादा अंतस अऊ का रोही

टूरा ल पढ़ायेंव पुरखवती खेत बेच के
अब उही टूरा खेत जाय बर लजावत हे
अब तिही सोंच अऊ तिही बता मितान
अईसन मे हमर देस के हाल का होही

ललित साहू "जख्मी" ग्राम- छुरा
जिला - गरियाबंद (छ.ग.)

देस मांगे बलिदान

देस मांगे बलिदान ,सुनव जी ..
भारत के संतान ,सुनव जी ....।।

जागव भारत वासी जागव ..
उठो ,बढ़ो ..हुंकार भरव जी ..
कबले सुतत जिनगी पहाहु
आओ अपन ,उद्धार करव जी ..।।

जागव भारत वासी ..........

भगत ,चंद्रशेखर ,बिस्मिल जी ..
तुह से करत सवाल हे .....
   काबर अइसे होगे हावव ...
जिनगी ह ,बदहाल हे ...

उठौ बढ़व तुम रणभूमि म ,
  बैरी मन ला कुचलव जी ..
मार भगाओ दुराचारी ला ,
  मीठ लबरा ला मसलव जी ..।।
देस मांगे ........।।

क्रांतिकारी बन दिया जलाओ ...
देस ल अपन बचाना हे .....
आजादी के दूसर लड़ई ...
लड़के हक़ ल पाना हे ...

पेरबुधिया झन होवव भाई
   अब अउ नई छलावव जी ...
आवव जुरमिल सुनता बांधो..
भारत के लाज बचावव जी ...

समर्पित ...जवान साथी मन ला

रचना - धनराज साहू
बागबाहरा

Sunday, 17 July 2016

" जीवन साकार बना लो "

है अगर लेखनी मे धार तुम्हारे
शब्दों को अपनी तलवार बना लो
करो परिवर्तन जग मुंह ताक रहा
काव्य स्वरों को ही हुंकार बना लो

दो प्रेरणा समरसता की सबको
क्रोध, घमंड का छोटा आकार बना लो
वैमनस्य त्यागो और त्यागो भेदभाव
संपूर्ण जगत को अपना परिवार बना लो

गुरु चरणों मे करो वन्दना नित प्रति
जन्म धरती पर अपना साकार बना लो
मात - पिता के तुम ऋणि युगों तक
अपना धर्म तुम उनका सत्कार बना लो

सब सीखो यशस्वी बुजुर्गों से और
जीवन का ध्येय परोपकार बना लो
रहो मझधार सदैव भक्ति सागर के
संस्कारों को ही जीवन आधार बना लो

रखो पावन सदैव अपना चंचल मन
निशक्तों की सेवा का विचार बना लो
हो जब जरुरत तुम्हारी जन्मभूमि को
तुम अविलंब ही लंबी कतार बना लो

अखंड भारत की प्रचंड ज्वाला भर मन मे
गगन भेदी शांति का मिनार बना लो
ना हो प्रहार जननी, भगिनी, निर्बल पर
खुद को तुम मजबूत ऐसी दीवार बना लो

ना हो लज्जित दग्ध मातृभूमि का
युयुत्सु पर खुद को अंगार बना लो
अगर धरो सहस्त्र जन्म इस धरा पर
तिरंगे को ही अंतिम श्रृंगार बना लो

ललित साहू "जख्मी"ग्राम - छुरा
जिला - गरियाबंद (छ.ग.)
मोर घर के चिन्हारी

मोर घर के ओइरछा म लगे हे झिपारी
लगे ओमा कोरर्ई कमचिल भरवा काड़ी
थुनिहा गड़ा के बांधे हावव मैहर ओला
छइंहा करे बर मोर अंगना अऊ दुवारी
मोर घर.....
बाता हा सुघ्घर ओकर शोभा बढाथे
पैरा अऊ खदर ओकर मितान कहाथे
मया के अटायें पटवा मा ऐहा बंधाथे
घाम पानी ले करथे चांवरा के रखवारी
मोर घर.....,
झिपारी लगे चांवरा लागे हमर डेरौठी
बईठ संग गोठियाथे पहुना अऊ परोसी
जब कोनो पूछे मोर पता ठउर ठिकाना
ता झिपारी हा बनथे मोर घर के चिन्हारी
मोर घर.....
बड़ जतन करके मैहर ऐला बनाथो
इही ला शोभा मान घर मा लगाथो
हावा धुंका पानी आके ऐला हलाके
मोर दशा के रोजदिन करथे चारी
मोर घर......
ऐ झिपारी के बड़ा सुघ्घर बनावट हे
मोर छिटकी कुरिया इही तो सजावट हे
सुख दुःख के बेरा मा एकरो हिस्सेदारी
डटे हे मोहाटी मा मोर बनके संगवारी
मोर घर.....
                                  रचना
                लाकेश दास मानिकपुरी  " बेलरिहा"
                  बेलर फिंगेश्वर  जिला गरियाबंद
                       9752578339
धनाक्षरी विषय

"माटी के मितान"


सऊंहत अवतारे
ईहां के भगवान तैं
भुईयां सिरजईया
माटी के मितान तैं

मेहनत करईया
जऊंहर किसान तैं
अन्न के उपजईया
माटी के मितान तैं

दाई के तैं दुलरवा
तप के पहिचान तैं
बासी पेंच खवईया
माटी के मितान तैं

दुनिया के पोसईया
परानी मे महान तैं
दुख पीरा सहईया
माटी के मितान तैं

ललित साहू "जख्मी" ग्राम- छुरा
जिला- गरियाबंद (छ.ग.)
9993841525

गजल ए हबीब समर


इस तरहा आप मुझको ,
रुसवा न कीजिये ...
औरो से अपने इश्क का ,
  चर्चा न कीजिये ।।...
करना ही है ,गर यूँ ही तो ...
ऐसा ही कीजिये ..
कर दीजिये फ़ना ,
मगर शोहरा न कीजिये ...
इससे हमारे प्यार को ...
रूसवाइयां मिलेगी ,
दिल -दिल से लगे रहने दो ..
तन्हा न कीजिये।।...
फिर दर्द ,दिल में उट्ठेगा ...
गर होगा ये जुदा ...
फिर खुद भी ,तड़प जाओगे..
ऐसा न कीजिये।।...
तड़पा रहा है ,दर्द
मेरे दिल को ऐ समर ,
अब आप और ,दर्दे दिल पैदा न कीजिये।

हबीब "समर "
                     बागबाहरा

वीर शहीद मन ला नमन


शांति के साँस बर ....
निकले हे जवान ,
   पैडगरी रसता ...
     उबड़-खाबड़ ,बंजर माटी ।।

दिन देखे ,न रात
बस हमन ल
  चैन से सुते , घुमे खातिर ...
अपन जिनगी ला
  दांव म लगाये हे  ।।

मरे बर घलो ..
खुसी -खुसी ,बिदा लेथे ..
अउ हमन ...
माते हन ....गुला -झांझरी म ...
   खींचतान म ....

ओमन सांस के मोल
  जानत हे ....
अउ हमन बेचत हन ...
   सांस ला ......

हमर सांस ल
  बचात हे .....
खुद के सांस ल 
   रोक के .......

हमन टी बी ,देखथन..
  पेपर पढ़थन ..
    रोज बिहनिया...
लाल -लाल देखथन
  लाल -लाल ,पढ़थन ....

संझा ....चहा पीयत
  बहस करथन ....
अउ रात के .......
   लॉफ्टर चैंनल देखके ...
बिहनिया ..सरधाञ्जलि देथन
  राजकीय सोक मनाथन ...
अउ फेर तियारी करथन ...
  एक ठीन ...साँस के ...
                     जोरा के

रचना -धनराज साहू बागबाहरा

Saturday, 16 July 2016

"मन भा गे रे असाढ़"

झमा-झम गिरत हे पानी
नरवा-नदिया मे आ गे बाढ़
पऊर सबला तै बड़ ठगे रेहे
एसो के मन भा गे रे असाढ़

हरियर-हरियर सब खेत खार
लहकत हे डोली अऊ कछार
सुरुर-सुरुर जुड़ हवा चलत हे
बेंगवा कहात हे आ गे रे असाढ़

छानी, अंगना अऊ रद्दा धोआगे
चुक-चुक ले होगे डोंगर-पहाड़
रुख-राई सब झुमरत डोलत हे
एसो तै गरज के आये रे असाढ़

चिरई चिरगुन के पियास बुतागे
अऊ भुईंया के घलो मन गे माढ़
सब मनखे के अब जीव थिरागे
तै बड़ गजब के आये रे असाढ़

मोर मया के सुरता आवत हे
जबले देखेंव रिमझिम फुहार
तोरे कस लचकत मिले आवय
थोरकिन पतिया ना रे असाढ़

तोर आय ले सब फुदकत हावे
झन करबे तै एको पईत आड़
तै दुनिया परकिरती के सिंगार
किसान के मितान तिही रे असाढ़

ललित साहू "जख्मी"  ग्राम-छुरा
जिला- गरियाबंद ( छ.ग.)

Thursday, 7 July 2016

"चिन्ता"

परिंदा दाने की चिंता नहीं करता
अजगर खाने की चिंता नहीं करता

कौआ ताने की चिंता नहीं करता
कोयल गाने की चिंता नहीं करता

कुत्ता मालिक की चिंता नहीं करता
खर कालिख की चिंता नहीं करता

भेड़ बाल की चिंता नहीं करता
घोड़ा चाल की चिंता नहीं करता

बकरा खाल की चिंता नहीं करता
बंदर  डाल की चिंता नहीं करता

चींटी फल की चिंता नहीं करती
मुर्गी कल की चिंता नहीं करती

हाथी बल की चिंता नहीं करता
मीन जल की चिंता नहीं करता

शेर दल की चिंता नहीं करता
सियार छल की चिंता नहीं करता

मानव तू ऐसा क्यों है
जो दाने-खाने,कल -बल, दल-छल,
जल -कल, बाल- खाल ,तन- धन,
सब की चिंता करता है
जबकि तू जानता है
चिंता चिता तक पहुचाती है

हीरालाल गुरूजी"समय"
ग्राम-छुरा , गरियाबंद

" मेरा बेटा जवान हो रहा है "

 ( व्यंग्य )

सब चलाते हैं
वो भी चलाता है
वाहन की रफ्तार से
बड़े करतब दिखाता है
कभी वो भी पिलाते होंगें
कभी ये भी पिलाता है
मौत के धुएँ को भी
खुबसुरत छल्ला बनाता है
संस्कार लगते उसे ढकोसले
पैसा ही भगवान हो रहा है
देख भाई
मेरा बेटा जवान हो रहा है

प्रेम लीला ना करे
तो क्या करे इस उम्र मे
सजा भला क्या दूं
बिना सबूत के जुर्म मे
अब वो दिन गये पुराने
जब उम्र बिता देते थे सब्र मे
कहो तो उल्टा सुनना पड़ेगा
कि अब तुम्हारे पांव है कब्र मे
कड़वी जुबां लिये छू रहा बुलंदी
ये देख जमाना हैरान हो रहा है
देख भाई
मेरा बेटा जवान हो रहा है

दांव पर जिन्दगी
जिन्दगी पर घाव लगाता है
सुख छाँव प्रेमिका पत्नी को
और माँ को आघात लगाता है
बहन की लाज बचाता नहीं
पर कृष्ण कन्हैया कहलाता है
रिश्ते, परंपरा, शिष्टाचार गौण
आधुनिकता में मन लगाता है
फिजूल ही कहते हैं लोग
कि मेरा सपूत शैतान हो रहा है
देख भाई
मेरा बेटा जवान हो रहा है

ललित साहू "जख्मी" ग्राम - छुरा
जिला - गरियाबंद (छ.ग.)
9144992879

"कइसे ममहाही नेकी के फूल"

कइसे ममहाही नेकी के फूल अइलाये हे
धरम करम के मीठ फर ल कीरा खाये हे
सबला छईहाँ आसरा देवैय्या पाना झरगे
तभे तो सुन्ता के अतेक मजबूत खांधा सरगे 
मया पिरीत छोड़ सब अपन मा भुलाये हे
तभे तो आज मानवता के रूख हा मरगे

अब कोनो काज नई करय परहित बर
दूसरा के लहू बोहाथे अपन हित बर
खईहा खनथे मनखे अपने मीत बर
बेईमानी अब्बड़े करथे अपन जीत बर
का का उदीम करिन सुख ल पाये बर
तभो ले मनखे के हिस्सा म दुःख हा परगे

कभु कोन्हों गुरतुर मीठ बोली नई जानिन
मीत मितानी कभु हांसी ठिठोली नई जानिन
सियान मनके कभु कोन्हों बात नई मानिन
काकरो करा अपन मुड़ी नवाये नई जानिन
जब निकलथे गोठ दूसर बर सरापा निकलथे
दूसरा ला बखाने मा अपने मुँह हा जरगे

बेरा बुलक जाथे ताहन सब  पछ्ताथे
पहली ले जानबूझ के अपने मन पछवाथे
दूसरा के तरक्की देख आगी अंगरा हो जथे
भाई हा भाई संग आजकल झगरा हो जथे
पर के झोली म दुःख पीरा डारे के फेर मा
सिरतोन अपने चैन अऊ सुख हा बिदरगे

कोन्हों काकरो अब हियाव नई करय
अब्बड़ भटके ल लागथे अपनेच हक़ बर
आजकल कोन्हो सही नियाव नई करय
अपन सुवारथ के सब रोटी सेंक लेथे
पंच परमेश्वर मन घलो ईमान बेच देथे
सब इहाँ पइसा वाला के रसूख ल डरगे

सुमत के ककरो घर आगी नई सिपचय
काकरो मन मा सतकरम नई उपजय
मनखे के हिरदे म सदभाव के अकाल
सब एक दूसर ल अपन बैरी मानथे 
सब कोई ल एक दूसरा ले जलन हे
सबके बुद्धि मा मानो राख़ हा परगे

बहिनी करा राखी बंधवईय्या कतको
बेटा बर सुन्दर बहू मंगईय्या कतको
इहाँ तो मिलथे भेदभाव करईय्या कतको
फोकटे फोकट काँव काँव करईय्या कतको
नवकन्या भोज बर नोनी खोंजईया भुलागे
के ओकर बेटी ओकरे सेती कोख मा मरगे

गरीब ल तो सबो मिल के चपकत हे
पइसा के गुमान म अमीर हा मटकत हे
पेट के खातिर कोनो ऐती ओती भटकत हे
अइसन दुःख कतको फाँसी मा लटकत हे
बड़े आदमी रोज अन्न के बरबादी करथे
नई देखय कभु के कोन आज भूख मा मरगे

रचना- देवेन्द्र ध्रुव
(फुटहा करम)  बेलर 
जिला- गरियाबंद (छ.ग.)

"का इही हमर गांव हे "

उघरा परे संस्कीरति 
उजरे परे ठाँव हे ।
  देख तो भाई मंगलू 
   का इही हमर गाँव हे ।।..२
कँहा गे रे भाई ..
वो बर रुख के छाँव हा ,
   भांय -भांय लागत हे
     मोर मयारू गाँव हा ..२
सोनहा बिहान जिन्हा २लछमी के पाँव हे ....देख तो भाई ....
सुरता हा आवत हे
ननपन के संगी
   हांसी -खुसी जिनगी चले
    रहय कतको तंगी ।।...२
सबो जिनिस होगे हे २ तभो हाँव -हांव हे ....देख तो भाई मंगलू....
एक महीना आगू
  नंगारा ह बाजे
    लइका -सियान जम्मों
      गुड़ी भीतरी नांचे ।।...२
परे हे नंगारा बाजे ..२ डीजे काँव काँव हे ...देख तो भाई ....
डंडा -रहस खोर गली में
जेती-देखो तेती
   संउहत बिरीज लागे
     गाँव चारो कोती ।।...२
गाय -गरु ,दूध -दही नइये २ भाठी म पाँव हे ...देख तो भाई....
का ठेठरी, का खुरमी
अईरसा हे राजा ,
   मीठ नूनछुर ,आनी - बानी
     रंग -रंग के खाजा ।।...२
मुहु मन म पानी आवय...२ लागे खांव -खांव हे।।...देख तो भाई...
संगी जहुंरिया के,
हांसी -ठिठोली
  रस घोरे भौजी के
    बानी मीठ बोली ।।...२
सरग सही लागे गाँव २ उल्टा परे दांव हे ।।....देख तो भाई ....
चार -तेंदु ,आमा मौरे
लट-झूमर लागे
    परसा के फ़ुलवा के
      रँग सूंदर लागे ।।२....
रुखराई ,ठुठवा परे..२ जंगल बस नाँव हे ।।..देख तो भाई....
गाँव भर म ,नता होवे
बबा ,कका, काकी
   सुख -दुख म खड़ा होवें
      उही हमर साथी ..।।
भाई चारा बख्ठी परे...२इरखा भारी पाँव हे।।
देख तो भाई ....

रचना -धनराज साहू
बागबाहरा

"महिमा मोर गाँव के"


मेहा मन म हर्षाओ गाओ महिमा मोर गाँव के
 गुण गावत नई थकव बर पीपर के छांव के
बड़ भागी हन ऐ पावन माटी म जन्म पायेन
 इही म सब खेलेन खायेंन जिनगी बितायेन
सुख शांति के अधार उगावय सोनहा धान
हरे धरती के सिंगार माटी मोर गाँव के ....

ख़ुशी के ऐ सागर हे मीठ पानी के गागर हे
सब लाजवाब मया भरे हावे इहाँ बेहिसाब
सूंदर सूंदर नजारा फुले चम्पा चमेली गुलाब
सब संग ताल मिलाये  नंदिया अउ तलाब
चाहे कोयली बात होय या कौवा के काँव के
अइसन सुघ्घर छवि हावय ग मोर गांव के..

गाँव अइसन दिखथे मानो सरग इहे बसथे
सियान के सपना लईका के आँखी म सजथे
सियान के भाखा तरक्की के रद्दा सिरतोन
सत के सीख अउ गोठ सावधानी हियाव के
सुख दुःख म  एकदुसरा के साथी बनत हे
हर घर ला जोड़े सुंदर  गली मोर गाँव के..

बइठे तरिया पार मा शीतला दाई
बीच बस्ती म मौली माता अउ महामाई
उत्ती म महादेव बुडती म सतबहिनी बिराजे
सबके रक्षा करे बर बरदेव बाबा कहत लागे
चिन्हा दिखे सउहत बजरंगबली के पाँव के
सरसती के पुजारी हर लईका मोर गाँव के...

किसनहा हरदम  धरती दाई के सेवा बर
मेहनत करय घर परिवार के कलेवा बर
अतका दानी दूसर बर अपन पेट ला काटथे
अपन दुःख पाये अउ दूसरा ला सुख बाँटथे
सरी संसार माला जपथे जेकर नाव के
अन्नदाता कहावय किसनहा मोर गाँव के ...

इहा घना हे जंगल सूंदर खेत खलिहान
बढ़ावत हावय शान हरा भरा मैदान
हर रंग मा रंग जाये हांसी  ख़ुशी बरसाये
संगे संग सब माने तिहार हरेली अउ देवारी
चलथे ग रोज  बयार समानता के भाव के
एकता के सन्देश देवय होली मोर गाँव के ...

करो तिलक माथा मा माटी ला चन्दन मानके
सोना हरे ऐ माटी महत्तम एखर जानके
बरसा मा महके चिरई मन संग चहके
गीत मधुर सुनावय पनघट मोर गाँव के
चाहे मै ह जिहा राहव कइसनो भी हाल में
मोला सुरता आते रहिथे  मोर गाँव के...
                                 रचना
                         देवेन्द्र कुमार ध्रुव
                        फुटहा करम बेलर
                        जिला गरियाबंद

"जुन्ना छाता नवा काड़ी"

असाढ़ आगे सावन आवत हे
रुख राई सब झुमरत गावत हे
रऊत पहिरे हे मुड़ मा खुमरी
अऊ किसान मोरा बिसावत हे

डोकरा बबा हेर के जुन्ना छाता
नवा काडी - कपडा़ छवावत हे
नान्हे लईका बर हाट बजार म
रंग-बिरंगी नान्हे छाता बेचावत हे

नवा किसम के मोरा झिल्ली हा
खिले-खिलाय अंगिया आवत हे
रेन-कोट कहि के सब मनखे मन
खुद पहिरत सब ला पहिरावत हे

नवा किसम के मोरा पहिर के
मई लोगन फरफटी कुदावत हे
फिज झन जाय लुगरा कहि के
सीट म कागद झिल्ली दसावत हे

मंहगी जुता ला सब संदुक धर के
बरसाती पनही, जुता बिसावत हे
काच्चा माढे हे कपडा़ लत्ता तेमन
अउसईन-अउसईन ममहावत हे

नई गिरत रीहिस त अगोरा रीहिस
गिरत हे त सबे झन खखवावत हे
भुईंया के अंतस पियास म मरत हे
अऊ सब झन पानी ल डर्रावत हे

ललित साहू "जख्मी" ग्राम- छुरा
जिला - गरियाबंद (छ.ग.)
9144992879

"नारी की पहचान"

नहीं है दुष्ट दुर्याेधन,
नहीं है पापी रावण,
अब तो शोषण बंद कराे,
नारी का सम्मान कराे|

बेटी भी तो बेटों से
किसी क्षेत्र में नहीं पीछे हैं
अब तो बंद भेदभाव कराे,
नारी का सम्मान कराे

नारी ही घर की लक्ष्मी हैं,
यही बात तो समझनी हैं
अब तो बंद अपमान कराे,
नारी का सम्मान कराे

कन्यादान सबसे बड़ा दान हैं,
अन्यदान कन्या का अपमान हैं
अब तो दहेज प्रथा बंद कराे,
नारी का सम्मान कराे

बेटी हैं तो कल हैं,
बेटी भावी पीढ़ी का बल हैं
अब तो बंद गर्भपात कराे,
नारी का सम्मान कराे

रचनाकार - नेमीचंद साहू
ग्राम - देवगाँव (छुरा)
जिला - गरियाबंद (छ.ग.)

"मैं भूला हूं"

मैं भूला हूं
हां, कुछ तो भूला हूं

क्या भूला यह लापता
पर भूला हूं
हां, कुछ तो भूला हूं

इस धरा पर आकर
नाम व रूप पाकर
रिश्तों का बाग सजाकर
मस्त गृहस्थ बन झूला हूं
मैं भूला हूं

मैं कौन हूं, और हूं कहां
आया कहां से, जाना कहां
सच ये जहां, या वो जहां
या दोनों जहां में घूला हूं
मै भूला हूं

जग सम्पूर्ण खंगाला हूं
आनंद-शांति से दिवाला हूं
अब काल का निवाला हूं
फिर भी मोह में फूला हूं
मैं भूला हूं

अब ढूंढ रहा हूं मधुशाला
जहां बहे प्रेम सागर-हाला
पीकर बन जाऊं मतवाला
किंतु साकी बिन लूला हूं
मैं भूला हूं 
                
अब खुद को मैं जानूंगा
साक्षात्कार को ठानूंगा
जप-तप-योग मैं तानूंगा
अब समाधि मे जाने को तूला हूं

तन-मन अर्पण गुरू चरणों में
सर्वस्व समर्पण गुरू चरणों में
अहं का तर्पण गुरू चरणों में
दया कर दया निधान
कृपा कर कृपा निधान
अब भव-बंध से खूला हूं
मैं भूला हूं

मैं भूला हूं
हां, कुछ तो भूला हूं....

रचना:- ललित वर्मा
ग्राम-छुरा
जिला- गरियाबंद (छ.ग.)

"मै भी लिखूं"

बहर -रजज 2212×4

मैं सोचता हूँ यूँ सभी बातें असल मैं भी लिखूँ ।
मैं सोचता हूँ आज ही अपनी गजल मैं भी लिखूँ ।।

थामा कलम जब हाथ में मैंने नई ताकत मिली ।
मैं सोचता हूँ अब इसी को ही सबल मैं भी लिखूँ ।।

वो जो कदम मेरा उठा था इस सफर आगाज में ।
मैं सोचता हूँ अब उसे मेरी पहल मैं भी लिखूँ ।।

मैं जो कहूं आसान हो वो बात सब समझे जिसे ।
मैं सोचता हूँ गीत अब ऐसे सरल मैं भी लिखूँ ।।

मैं चाहता हूँ जीतना अब जीत ही आगे मिले ।
जो आपने माना अभी तो हूँ सफल मैं भी लिखूँ ।।

              देवेन्द्र कुमार ध्रुव (डीआर)
                  फुटहा करम बेलर
                   जिला गरियाबंद

गजल

कोई बता भी दे हमें
क्यों ओ नज़र खामोश हैं
शिकवा करें भी किस तरह
कबसे बह़र खामोश हैं

कोई दिखा दे राह भी
सारे ड़गर खामोश हैं
हम आ गये मंजिल-ए-इश्क
तब ये शह़र खामोश हैं

कोई लगा दे पार अब
देखो लह़र खामोश हैं
है मौत की जरुरत जख्मी
तब ये जह़र खामोश हैं

रचनाकार - ललित साहू
ग्राम -छुरा
जिला- गरियाबंद 

"असाड़ तोर आय ले"

बादर ह करियावत हे
गरेर ह सनसनावत हे
बिजरी ह चमचमावत हे
भुईयां ह हरियावत हे
असाड़ तोर आय ले....

रूखराई उलहोवत हे
नांगरिहा खेत बोवत हे
बेंदरा मन पदोवत हे
हीरू-बिछरु रोवत हे
असाड़ तोर आय ले.....

नदिया नरवा खलबलावत हे
जुच्छा तरिया डबडबावत हे
भिंदोल मेचका टरटरावत हे
बतरकिरी मन उड़ीयावत हे
 असाड़ तोर आय ले.....

लईका छत्ता सोरियावत हे
चरोटाभाजी बोड़ा बेचावत हे
"समय" खपरा लहुटावत हे
चिरई खोंधरा म लुकावत हे
   असाड़ तोर आय ले......

रचना:-हीरालाल गुरूजी"समय"
ग्राम-छुरा, जिला गरियाबंद (छ.ग.)
पढाई
(संदेश कविता)

परीक्षा में पढ़ाई सब करै,
पहले करै न काेय
पहले पढ़ाई सब करै, 
तो फेल काहे को हाेय

विद्या बड़ी न कि दौलत
न कोई और बड़ा हाेय
बाटे तो बढ़ता ही चलै
जो न बाटे सो खाेय

न कोई बुध्दिहीन हैं
न कोई बुध्दिमान
जो जैसे परिश्रम करै,
बनै वैसे ही महान

बेटी है तो कल है
बेटी नाहि तो कल नाहि
बेटी-बेटा को जानो एक
अब कोई गर्भपात नाहि

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दाई-ददा के जतन करव

जियत म दाई-ददा ल 
दाना-दाना बर तरसाये
मरे म तै फोटो ऊपर
अगरबत्ती-दिया जलाये
गये तै मंदिर-मस्जिद
गये तीरथ धाम रे
दाई-ददा के जतन बिना,
व्यर्थ सबो तोर काम रे
झन जा तै मंदिर-मस्जिद,
झन कर तीरथ धाम रे
दाई-ददा म संसार बसे,
बसे ब्रह्मा, विष्णु, महेश, 
अऊ सिता-राम रे
हाँस के पानी-पसिया देदे,
करले मीठा गोठ रे
दाई-ददा ले बड़के दुनिया म,
नइये कोनो रोठ रे
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"मानव जीवन अतिथि समान"

चार दिन का जीवन हैं 
हँसकर सबसे बात कराे
न किसी से द्वेष रखो,
न किसी से बैर करो
किसी के दु:ख पर हँसो नहीं,
न सुख पर विषैला साप बनो
इंसान हो इंसानियत मत भूलो,
सुख-दु:ख का तुम साथ बनो
पैसे को ही लक्ष्य मत समझो,
अब गलत काम का त्याग करो
खाली आये, खाली ही जाना हैं,
न अब तुम भ्रष्टाचार करो
नहीं रहे बल,संपत्तिवाले
तुम भी न अभिमान करो
मानव हो मानव रहो और
सदा मानवता का काम करो

रचनाकार - नेमीचंद साहू
ग्राम - देवगाँव (छुरा)
जिला - गरियाबंद (छ.ग.)