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Saturday, 1 October 2016

उड़ जाही हंसा   गीत 


कतको कर ले जतन तेहं तनके,
उड़ जाही ये हंसा अपन मन के ।
चाहे बांध ले..२ चाहे बांध ले
गेरवा म जकन के
उड़ जाही ये पंछी अपन मन के।
करिया गोरिया काया पाके,मोहमाया म लटपटागे।
जनम देवईया दाई ददा के,
सेवा  करे बर भुलागे ।
चाहे धांध ले...२चाहे धांध ले
सोना के भवन मे, उड़ जाही ये पंछी अपन मन के ।
कतको करले जतन......।
नरवा नदिया तरिया पोखर,
सागर म मिल जाही ।
ये तन तो हे फूल बरोबर,
बिनहा खिले अउ संझा मुरझाही ।
नई हे नई हे...२ भरोसा ये जीवन के,
गाले गाले गुन हरि भजन तें ।
कतको करले जतन तेहं तनके,
उड़ जाही ये हंसा अपन मनके ।

दीनदयाल टंडन
शास.उ.मा.वि.पीपरछेड़ी  छुरा

पावन धरा

धरा के कण-कण में बिखरी,
  शोभा सुंदरता खूब निराली।
चहुँ ऒर आकर्षित करती,
  नयनों को इसकी हरियाली।

गगनचुम्बी मुकुट सा पर्वत,
  कल-कल बहती नदियोँ का पानी।
मोर पपीहे कोयल की राग,
  कहती इसकी अद्भुत कहानी।

ऋषि मुनि जहां करते नित्य,
    यज्ञ हवन मंत्रो का जाप।
घुल जाती हवा में जिनके,
   सुरस अभिमंत्रित वेदों का आलाप।

मैदानों में जहां बसी सभ्यता,
    विकास की राह गढ़ी है।
संघर्षो से आगे होते,
   संस्कृति जीवन तक बढ़ी है।

महापुरुषो वीर बलिदानियों का,
   अनुपम है उनकी गाथा।
दिल में जिसको दे सम्मान,
   नित झुकते सबका माथा।

हरी-भरी धरती की गोदी,
  मानव इसको क्यों उजाड़ा है।
स्वार्थवस अंधे होकर फिर,
  बनाया कारखानो का अखाड़ा है।

उजड़ी बिखरी प्रकृति को,
  फिर से हमे सजाना होगा।
कर संकल्प दृढ़ होकर,
  धरती को स्वर्ग बनाना होगा।

देवनारायण यदु
पंडरीपानी लोहझर
गरियाबंद 36गढ़

वीर शहीदों को श्रद्धांजलि

उम्र भर बहने वाले आंसू,
शहीद की बेवा के होंगे।
बस कुछ ही दिन बातें,
भारत माँ की सेवा के होंगे।
         मतलब की राजनीति में,
         सच्ची शहादत धूल जायेगी।
         जवानों की कुर्बानियों को,
         जनता जल्द ही भूल जायेगी।
समाजसेवी देंगे श्रद्धांजलि,
फोटो अपनी बड़ी खिंचवायेंगे।
कभी वोट कभी चंदे के लिए,
नाम शहीदों का भुनायेंगे।
         सब हांथ बांधे ऐसे ही बैठे रहो,
         आतंकी करतूत अपनी दोहरायेंगे।
         लाशें नोचने गिद्ध सारे के सारे,
         हमारे ही गगन में मंडरायेंगे।
उठो अब सारे बहाने छोंडो,
जवाब एक स्वर में देना होगा।
बारुद से मिले जख्मों का बदला,
हमें भी बारुद से ही लेना होगा।
        पाक खातमे का शोर मचाकर,
        पुरे हिन्दुस्तान को जगाना होगा।
        पीठ पर खंजर घोपने का हश्र,
        कायर पाकिस्तान को बताना होगा।
अब संसद की चर्चा छोंडकर,
सरहद का रुख करना होगा।
अमन की बातें बहुत हो चुकी,
अब सीने में बारुद भरना होगा।
         ।। वन्दे मातरम ।। जय हिन्द ।।
ललित साहू "जख्मी" छुरा
जिला- गरियाबंद (छ.ग.)

मैं और क्या कहूं ?

        जानते हो जहर है, फिर भी,
        नशे के तुम आदी हो गए।
        खोखली बातों मे उलझकर,
        जवानी में उन्मादी हो गए।
आचरण अपना गिराकर,
तुम धन तो बहुत कमाते रहे।
ज्ञान और पद का रौब हमेशा,
अपनो को ही दिखाते रहे।
          गुरु को, गुरु ना समझा,
          माँ-बाप को भी दुत्कारते रहे।
          गौ माता को तुमने तरसाया,
          और कुत्ते को पुचकारते रहे।
तुम्हारी इस हरकत पर
बताओ.! मैं और क्या कहूं ?
          जब तुम खुद ही नही चाहते,
          कि मैं जिन्दगी की बात सिखूं।
तो भला मुझे क्या पड़ी है,
जो मैं तुम पर कविता लिखूं।
तुम, सुहाग की निशानी,
सिंदूर को भी छुपाने लगी।
औरत का सबसे मंहगा गहना,
शर्म को भी भुलाने लगी।
         आँचल सर पे रखने से भी,
         अब तुम कतराने लगी।
         किसी असहाय बेवा की तरह,
         बालों को बिखराने लगी।
मम्मी, मॉम मन को भाया,
माँ शब्द से हिचकिचाने लगी।
भारतीयता तुम्हें चुभती है,
और अंग्रेजीयत पर ईतराने लगी।
          तुम्हारी इस हरकत पर,
          बताओ.! मैं और क्या कहूं ?
जब तुम खुद ही नही चाहती,
कि मैं पावन पुनीता दिखूं।
          तो भला मुझे क्या पड़ी है,
          जो मैं तुम पर कविता लिखूं।
अपराधों के बने मूकदर्शक,
शोषण के तमाशबीन हो गयेे।
संबंधों पर किया आघात,
दौलत के आधीन हो गये।
         सच बोलना हो मना जहां,
         वहां मैं अपनी व्यथा कैसे कहूं।
         आलोचनाओं से डरकर मैं,
         चूप भी भला कैसे रहूं।
घुट-घुट कर मरने से अच्छा है,
मैं बेखौफ ही जीना सिखूं।
मेरी भी जिन्दगी सामने खड़ी है,
सोंचता हूं, अब उसी पर कविता लिखूं।

रचना - ललित साहू "जख्मी" छुरा
जिला- गरियाबंद (छ.ग.)

आगे पितर पाख

आगे पितर पाख रे संगी,
पितर देंवता ल परघाबो।
मुहाटी म चऊक पुर के,
अपन पुरखा ल बलाबो।

मुंदरहा ले नदिया जाके,
पितर डुबकी हमन लगाबो।
तिल,जौं,फूल,दुब धर के,
उहें अंजरी म जल चघाबो।

नई करन ये पाख नवा बुता,
जम्मों ल जुन्नहा म पहाबो।
जे पुरखा बिते रीहिस तिकर,
पितर पाख म सोक मनाबो।

एक काड़ी मुखारी,पानी,
अऊ पिढ़ा,लोटा ल मढाबो।
फूल पान गुलाल चघा के,
सरद्धा में माथ ल नवाबो।

खीर,पुरी अऊ बरा रांधबो,
बरी बर उरीद दार बिसाबो।
दार,भात,साग,रोटी के भोग,
तोरई पान म करके लगाबो।

गाय,कौंआ,करिया कुकुर ल,
कलेवा संग जेवन कराबो।
पुरखा जईसन खाये तईसन,
खाबो अऊ सबला खवाबो।

जब जे पुरखा के तिथि आही,
सेवा करके आसिस ल पाबो।
सगा सोदर जम्मों ल नेऊत के,
पुरखा पसंद के जेवन कराबो।

आखिर के दिन, बिदा करके,
पुरखा सुरता म आंसू बोहाबो।
पितर पाख के नेघ ल करके,
पुरखा मन के जीव ल हीताबो।

ललित साहू "जख्मी" छुरा
जिला - गरियाबंद (छ.ग.)

अइसन हमर गाँव

लछमी माता के असीस,धरती दाई के कोरा
सुख शांति जिहाँ डारे हावय सऊहत डेरा
फर फुल ले सुघ्घर लदाये जिहां पेड़ के डाली
अइसन हमर गाँव जिहां चारो कोती हरियाली....

दीया बाती जलय,बैरी अंधियार ला हरय
चन्दा चंदैनी मिल रथिया अंजोर करय
बिहनिया कुकरा बासे,गावय कोयलिया कारी
अइसन हमर गाँव जिहां सुरुज पहली बगराथे लाली.....

माथ मा लगाये बर ऐ माटी चन्दन रोली
गुरतुर गुरतुर इहाँ रहईया मन के बोली
अपन धनहा के किसनहा करय रखवाली
हमर गाँव के सोभा लहलहावत धान के बाली

अपन संसकीरती ला बचा के राखे हे
सभ्यता ला अन्तस् मा बसा के राखे हे
मया के झोली भरे नई हे काकरो खाली
सुघ्घर हमर गाँव जिहां बगरे हे खुसहाली

पहुना के सत्कार करय,सब संघरा रहिथे
बिपत के मार ला घलो मिलजुल के सहीथे
सबला अपन रंग मा रंगाथे इहाँ के होली
जगमग जगमग हमर गाँव के दीवाली...

रेंगथे सब उही रद्दा मा जेला सियान बताहे
अपन देवी देवता ला सब मन मा बसाहे
सब मनौती पूरा होथे जेन माँगथे सवाली
अइसन हमर गाँव जिहां बिराजे महाकाली ..

रचना-देवेन्द्र कुमार ध्रुव (डीआर )
        फुटहा करम बेलर
        जिला गरियाबंद (छ.ग.)

छत्तीसगढ़ बिक्कट खुस हे

गाँव-गली,खेत-खार
नंदिया-नरवा,तरिया पार
इस्कूल-कालेज अउ मैदान
बारी-बियारा,खेंरखाडांर
हाट-बजार,रद्दा-बाट
गऊरा-चौंरा,मंदिर के आंट
मसानगंज ले बरछाबारी
जगा बदलथे आरी-पारी
सब जगा इंकर पहुंच हे
एक रु.डिस्पोजल,दू रु.पानी पाऊच
पाँच रु.के चखना म
छत्तीसगढिया बिक्कट खुस हे!!

छट्ठी-बरही,पूजा-पाठ
बर-बिहाव,मांदी-भात
मरनी-हरनी,मेला-मडई
पिकनिक,पार्टी,जात्रा-पूजई
सांसद,बिधायक से लेके
पंच के चुनई तक
आखरी बेवस्था महुंवा के जूस हे
एक रु डिस्पोजल,दू रु पानी पाऊच
पाँच रु के चखना म छत्तीसगढिया बिक्कट खुस हे!!

ददा,बबा,कका,ममा
लकठा-दूरिहा के जम्मो सगा
सारा-भांटो,मीत-मितान
अरोसी-परोसी,चिन-पहिचान
घराती-बराती अऊ बजनिया
दारु खोजथे सरी मंझनिया
बस अतकीच दुख हे
एक रु डिस्पोजल,दू रु पानी पाऊच
पाँच रु के चखना में
छत्तीसगढिया बिक्कट खुस हे!!

रीझे यादव
टेंगनाबासा(छुरा)

वीर सिपाही

सीने में बारूद भरा,
आँखों में चिंगारी होता है।
मातृभूमि की रक्षा खातिर,
बेख़ौफ़ मौत पर सोता है।

तिरंगे का मान सदा,दिलो में जिनके होता है।
कोई नही ओ मेरे वतन का,वीर सिपाही होता है

प्राणों का जिसको मोह नही,
अमन-शांति का रखवाला है।
सरहद को अपनी जन्नत समझे,
बड़ा ही ओ दिलवाला है।

सबको दे चैन की निद्रा,भले न खुद ओ सोता है।
कोई नही ओ मेरे वतन का,वीर सिपाही होता है।

माँ से बड़ी है मातृभूमि,
मिट्टी का कर्ज चुकाता है।
हँसते-हँसते सिमा पर भी,
प्राणों की बाजी लगाता है।

मिलता है तिरंगे का कफ़न उसे,बड़ा ही किस्मतवाला होता है।
कोई नही ओ मेरे वतन का,वीर सिपाही होता है।

दहाड़ से जिनके आत्म-विश्वास के,
शत्रु रण में टिक न पाते है।
शौर्य और पराक्रम की गाथाएँ जिनके,
दसो दिशाएँ गाते है।

बहादुरी का ओढ़ कवच,दुश्मनो पर भारी होता है।
कोई नही ओ मेरे वतन का,वीर सिपाही होता है।

क्यों महक रही मानवता की बगिया,
सोचो इसका क्या कारण है।
जाकर देखो समरभूमि पर,
शहीदों का रक्त इसका उदाहरण है।

मरकर भी ओ अमर हो जाते,सबके लिए सबक ओ होता है।
कोई नही ओ मेरे वतन का,वीर सिपाही होता है

विनोद यादव
पंडरीपानी लोहझर
गरियाबंद 36गढ़

नवरात्रि मनाबो

कुँवार के सुग्घर महीना आगे,
   सबोके मन कइसे हरियागे।
36गढ़ के माटी पावन होगे,
   माता के दरश मनभावन होगे।

जुरमिल के चलो जसगीत ल गाबो।
चल संगी नवरात्रि मनाबो।
नव दिन नव रात ले मइय्या,
    दरश ल सबला देथे।

भगत के लाज रखे बर दाई,
   दुःख पीरा ल हरथे।
आसथा बिसवास के जोत ल जगाबो
चल संगी नवरात्रि मनाबो।

झांझ मंजीरा मांदर बाजे,
   गली गांव पारा।
जुरमिल सबो लगावत हे,
   माता के जयकारा।

चलो संगी मन के मनौती ल पाबो
चल संगी नवरात्रि मनाबो।
नव दिन के हरे ए सुग्घर तिहार,
मातारानी के हाबे जेमे मया दुलार।

जग के पाप हरे बर दाई,
आथे होके बघवा म सवार |
संझा बिहनिया माँ के आरती ल गाबो।
चल संगी नवरात्रि मनाबो।

रचना- विनोद यादव
पंडरीपानी लोहझर (छुरा)

बेटी

ददा के संसो बेटी ह करथे
अपन लइका संही जतनथे।
होवत बिहनिया,बडे फजर ले
मयारु दाई अस चहा अमरथे।।

नहाये खातिर पानी तिपोथे
जरय झन कइके छुथे-टमरथे।
बेरा नइ चूके,जेवन बनाथे
महतारी कस बइठे मोला जेंवाथे।।

मोर थोरिक रिस ल
अडबड डर्राथे।
चुप हो जा बाबू!
कहिके मनाथे।।

ओकर आँसू
सरी रिस ल बुताथे
का कर डारेंव?
मन बढ पछताथे।।

नान्हे बेटी मोर
अब होगे सजोर!
सगा अगोरत हंव
निहारत हंव खोर!!

कइसे करहूँ
सब किस्मत के लेखी।
पर के हो जाही
मोर मयारू बेटी!

कोने ह अब दसना दसाही
दवई-बूटी ल बेरा म खवाही?
एसो के जाड,जब लाहो लिही
सुन्ना गोरसी ल कोन सिपचाही?

एक नजर देखे बर
आँखी तरसही!
तोर सुरता म बेटी
मोर जीव ह कलपही!
मोर जीव ह कलपही!!!!

रीझे यादव
टेंगनाबासा(छुरा)

नापाक साजिश

यूँ छुपके लड़ाई वो कायर लड़ता है,
वो हमसे खिलाफत की साजिश करता है।

वो हमसे हमेशा ही यारों हारा है,
अब हमको हराने की ख्वाहिश करता है।

वो धमकी भरे लफ्जों में कुछ कहता है,
वो सबको डराने की कोशिश करता है।

हम हरदम सुलह की ही हसरत रखते है,
वो हमसे हमेशा ही रंजिश करता है।

वो भी ना रहेगा अब बह ही जायेगा,
जो सबपर कहर की ही बारिश करता है।

हर अच्छी पहल को ये ठोकर मारेगा,
वो अच्छे इरादों पे बंदिश करता है ।

वो सबकी भलाई की सोच नही पाता,
वो खुद के गुनाहों को खारिज करता है।

           देवेन्द्र कुमार ध्रुव(डीआर)
                     बेलर
          जिला गरियाबंद (छ ग)

कुछ तो करे ल परही

पछुवाय संगी ल संघेरे बर
अगोरे ल परही।
का करबे अतका धन-दोगानी
एक दिन सबो ल छोंडे ल परही।।

कतका सहिबे अतलंग ल आखिर
अतलंगिहा ल बोले ल परही।
जिमेवारी के सुरता भुलाये हे तेन ल
पानी म थोरिक चिभोरे ल परही।।

जुच्छा-सुक्खा म दिया नइ बरय
बाती ल थोकिन भिंगोये ल परही।
पियास बुझाना हे कोनो लुलवा के त
मुँहू म पानी रितोये ल परही।।

जानत हंव बिचार नइ मिलय तोर-मोर तभो ले
समाज बदले खातिर संघरा
आए ल परही
नइ पतियावे मोर अकेल्ला के गोठ ल
समझाए बर सब ल जुरियाये ल परही।।

नइ सकय एके झन रद्दा चतवारे बर
ओसरी-पारी हांथ बटाए ल परही
बेरा के कीमत ल बेरा राहत पहिचान ले
नइते खाली हांथ जाये ल परही।।

इरखा,छल,कपट के बेपार चलही तोर दुनिया म
कोन ल ठगबे कि ठगाबे
ऊपरवाला ल आखिर मुँहू देखाये ल परही।।

रीझे यादव
टेंगनाबासा(छुरा)

पीरा

नवा राज के सपना
चिरहा ओनहा कस चेंदरा होगे
छत्तीसगढ़ महतारी के दुलरवा बेटा
अपने माटी म बसुंदरा होगे।।

लोटा धरके अवइया मन ह
इंहा बनाथे बंगलात
छत्तीसगढिया जिंहा के तिंहा रहिगे
जस कंगला के कंगला

भाग जागे के अगोरा म
बितत बच्छर पंदरा होगे
छत्तीसगढ़ महतारी के दुलरवा बेटा
अपने माटी में बसुंदरा होगे।।

नवा राज ल बिरथा काहय
जेमन परे बाधा
वईसने मन के सियानी हे
उँकरे मुड म हे पागा।।

ओमन मंदारी बनगे
छत्तीसगढिया नचइय्या बेंदरा होगे
छत्तीसगढ़ महतारी के दुलरवा बेटा
अपने माटी में बसुंदरा होगे।।

जागो रे!छत्तीसगढिया भाई
अपन हक ल माँगो जी
जे तुंहर बाना मारत हे
ओला तुम ललकारो जी।

रद्दा नवा कोन बताही?
अघवा मन सब अंधरा होगे
छत्तीसगढ़ महतारी के दुलरवा बेटा
अपने माटी में बसुंदरा होगे।।

रीझे यादव
टेंगनाबासा(छुरा)

हुंकार

भारत माँ के वीर सपूत,
सीने पर गोली झेल रहे।
भारत माँ की लाज खातिर,
खून की होली खेल रहे।

हो वीर अदम्य तुम सच्चे पूत,
जो सीने पर वार सहते है।
पीठ पर जो खंजर मारे,
उसे बुज़दिल कायर कहते है।

अपने आप को इंसान कहे,
और इंसानियत को शर्मसार करे।
गर बची हो उसमे थोड़ी सी गैरत,
तो चुल्लु भर पानी में डूब मरे।

ख़ामोशी को ना हमारी कमजोरी समझे,
गर ज़िद पर हम आ जाएंगे।
आँख दिखाने वाले बुज़दिल,
मिट्टी में मिल जाएंगे।

रचना- विनोद यादव
पंडरीपानी लोहझर
जिला-गरियाबंद(छ.ग.)

भारत माँ पुकार रही है

देश के हर एक वीर को.....
त्वरित निर्णय का समय है
दबा दो अब मन के धीर को.....
सर काट लाना है दुश्मनो का
मांज लो अब अपने शमशीर को.....
भरो अपनी बन्दूको में गोलियां
दुश्मन के सीने में घुसा दो तीर को....
ये समय कतई नहीं चुप बैठने का
अपनी ताकत बना लो हर पीर को....
दहशत बाँट जो पैदा करता है आतंक
हमेशा के लिये मिटा दो उस लकीर को....
माना अभी माहौल है कुछ अलग
जंग जीत कर बदल दो हर तस्वीर को....
कुछ कर गये जो तुम देश के लिये
फिर सराहोगे खुद अपनी तकदीर को....
ये घाटियां धमाको से नरक सी हो गई
फिर से वही स्वर्ग बना दो कश्मीर को.....
                   रचना
         देवेन्द्र कुमार ध्रुव (डी आर)
              फुटहा करम बेलर
            जिला गरियाबंद (छ ग)

सरग असन घर

मोला कोन्हों हा काही बर तरसन नई दिस,
मोर आँखी ले आंसू कभु बरसन नई दिस।
जइसन मांगेव सिरतोन वइसन पायेव मैहा,
दाई-ददा,गुरु,संगवारी सबके मया मिलिस।
      
ददा के दुलरवा गौरी के लाल कहायेंव मैहा,
सरग असन घर म जनम धर के आयेंव मैहा।

मोर पीरा,दाई ला पहिली ले पता चल जाये,
दउड़ के ददा मोला अपन छाती ले लगाये।
जम्मो संगवारी मन घलो मोर काम आये हे,
सुरता हे गुरु मन मोला जेन बात सिखाये हे।

भागमानी हौ सबला अपन तीर पायेव मैहा,
सरग असन घर म जनम धर के आयेंव मैहा।

बदल गे बेरा अब तो मैहर बड़े होगे हंव,
कमाथव खाथव अपन गोड म खड़े होगे हंव।
भले मैहर तो दुनियादारी के फेर म परे हंव,
फेर दाई-ददा के सपना बर कुछु नई करे हंव।

ओकर दूध के करजा ल नई चुकायेंव मैहा,
सरग असन घर म जनम धर के आयेंव मैहा।

मोर अंगरी ला धरके मोला रेंगाये हवय,
अपन आँखी ले मोला दुनिया देखाये हवय।
आज नवा रद्दा बनाके उही मन ला छोड़े हंव,
दुःख पीरा संग उकर मन के नत्ता जोड़े हंव।

सुवारथ बर सबके मन ला दुखायेंव  मैहा,
सरग असन घर म जनम धर के आयेंव मैहा।

मोर जीत बर उकर मन मा आसा राहय,
मैहर पछवाव ता वहू मन ला निरासा राहय।
करेव गलती तभो उकर मीठ भाखा राहय,
एक दिन उकर बर काही करहू केहे रेहेंव।

फेर आजो अपन किरिया नई निभायेंव मैहा,
सरग असन घर म जनम धर के आयेंव मैहा।
                      रचना
         देवेन्द्र कुमार ध्रुव (डी आर )
             फुटहा करम बेलर
          जिला गरियाबंद (छ ग)

मातृभाषा

हम ही जिम्मेदार होंगे अपनी सभ्यता के पतन का....
सम्हलना होगा,समय है ये अपनी संस्कृति के जतन का ....
मातृभाषा ही है,जो हम सबको एक सूत्र में पिरोती है.....
मगर अब ऐसा बदला हाल देखकर चुभता सीने में शूल है ....
अपनी ही मातृभाषा को महत्व ना देना हमारी सबसे बड़ी भूल है....

आज पश्चिमी सभ्यता,हमारे देश में हावी होकर बढ़ रही है .....
हित अहित से अनजान,इसके फेर में हमारी भावी पीढ़ी पड़ रही है ....
समझना और समझाना होगा,सबको मातृभाषा का महत्व.....
हट जानी चाहिए सबकी मानसिकता में जमी धुल है .....
अपनी ही मातृभाषा को महत्व ना देना हमारी सबसे बड़ी भूल है....

हमारी मातृभाषा हिन्दी तो,हिन्दुस्तान की जान है .....
हम भारत वालो की तो जग में,इसी से ही पहचान है....
कानो में जैसे मधुरस घोले,ऐसी इसकी मिठास है.....
सबके मन की बगिया महकाने वाला ये सुन्दर फूल है .....
अपनी ही मातृभाषा को महत्व ना देना हमारी सबसे बड़ी भूल है....

हर कोई आज आधुनिकता का राग अलाप रहा है ....
ऐसे ही हम गर्त समाये जा रहे है कोई नही भांप रहा है ....
सब बदलाव का ढोंग कर,नई रीत अपनाने में लगे है....
पुराने रिवाज बिसरा दिए गये,समय भी बड़ा प्रतिकूल है....
अपनी ही मातृभाषा को महत्व ना देना हमारी सबसे बड़ी भूल है....
                      रचना
           देवेन्द्र कुमार ध्रुव (डी आर)
                 फुटहा करम बेलर
             जिला गरियाबंद (छ. ग.)

कागज कलम

कलम उठाथन,सबला सोरियाथन
कागज मा अपन भाखा ला सजाथन
सब बर गोठ रहिथे हमर मन करा
लईका होवय चाहे,होवय ओ सियान
हमन तो कहाथन जी कोरा कागज के मितान

कभु परिया परे भुईयाँ,कभु हरियाली
नदिया नरवा के पूरा,अऊ बदरिया कारी
बनके फसल बनके हमन लहलहाथन
किसानी के गोठ गोठियाथन बनके किसान
हमन तो कहाथन जी ........

कभु सबके दुःख दरद के बोली
कभु करथन हमन हांसी ठिठोली
सबके अन्तस् मा समाये के उदीम रथे
जोहारन सबला हाथ जोड़े,माथ नवान
हमन तो कहाथन जी...........

लिखथन सुरुज अऊ चन्दा ला
कमईय्या के सब काम धंधा ला
नवा संदेस देथन जब कलम उठाथन
सब करा हमर आरो पहुँचे देथन धियान
                 रचना
       देवेन्द्र कुमार ध्रुव (डी आर)
            फुटहा करम बेलर
         जिला गरियाबंद (छ ग)

जगर-बगर लट्टू

जगर-बगर लट्टू जब झम्म ले बुथाये
अबक-तबक डोकरी दाई चिमनी ल बारे
मोर थोरिक रोवई म मिरचा गुंगवाये
आँखी फूटगे कोन दुखाही के कहिके सब ला बखाने
बदलत जमाना संग मनखे बदल जाही
त डोकरी दाई के सुरता का सिरतो नइ आही?

आनी-बानी के जेवन दाई बनाये
ओकर मुँहू ऊलय कंवरा मोला खवाये
ककरो नजर झन लागे कहिके काजर अंजाये
कई खेप बईगा तीर मोला देखाये
बदलत जमाना संग मनखे बदल जाही
त दाई के सुरता का सिरतो  नइ आही?

किसिम-किसिम के जिनिस मोर बर बिसाये
कभू खंधइहा त कभू पिंठइहा चढाये
दुनिया के संसो ल ददा
बीडी के धुंगिया म उडाये
बदलत जमाना संग मनखे बदल जाही
त ददा के सुरता का सिरतो नइ आही?

रीझे यादव
टेंगनाबासा (छुरा)

वाह रे मंहगाई

सबो जिनिस के बाढ़गे रेट,
का करबे का नी करबे होगे मटियामेट|
पउर के करजा छुटाए नई हे,
तगादा भेजथे भारी सेट।

करजा म मनखे ल अउ कतका सोवाबे
वा रे मंहगाई अउ कतका रोवाबे।
धान ले जादा बीमारी मनखे म लगे हे,
सेट साहूकार मन जनता ल ठगे हे।

बइठके गद्दी म ओ करत हे जनता के खेदा,
मारत हे गरीब के पेट म ओ लबेदा।
अउ मनखे ल ते कतका भोगवाबे
वा रे मंहगाई अउ कतका रोवाबे।

मंहगाई के मार म मनखे ह अइलाए हे,
सरकार के रन्निति म कइसे घइलाए हे।
सुखावत बबा ल पूछ पारेव काहे तोर चक्कर,
कथे बबा महीना ले नई पीएहों चाहा भाव बढ़गेहे सक्कर।
मंहगाई के डोंगा ल अउ कतका खोवाबे
वारे मंहगाई अउ कतका रोवाबे।

फोकट म बाटथस किलो-किलो नून,
थोरकून मोर बात ल तो सून।
देनच हे त फोकट म दे दार सक्कर तेल,
बदल दे तेंहा अब मंहगाई के खेल।
कब तैं जनता के आंसू ल पोछाबे,
वारे मंहगाई अउ कतका रोवाबे।

विनोद यादव
पंडरीपानी लोहझर
गरियाबंद 36गढ़

स्मरण

सबला एक सूत मा गुंथव
सब अब एकजुट दिखव
हमन बोली भाखा के साथी
हमर सपना हा सलोना हे
चलव आवव ऐ डाहर पाँव धरन
सबो ला ऐके रद्दा मा रेंगवईया
"स्मरण"
अब लिखव अपन मन के बात ला
एक करदव दिन अऊ रात ला
चालू करव अब, ऐ नवा रीति ला
के उजागर करना हे ,सबकुरीति ला
बईठे करके तैयारी,कलम के पुजारी हमन
माँ सरस्वती के आशीष लेवईया
"स्मरण"
सबो झन बर बात ऐ ख़ास रही
नवा करे के ,सबके परयास रही
सबके अन्तस् मा अतका आस रही
सफलता बर सबला बिसवास रही
अपन कद ला जग मा ,अऊ ऊँचास करन
सबला तरक्की के रद्दा देखवईया
"स्मरण"
नई जीना हे, गुमनामी के अंधियार मा
अपन नाव कर जाना हे, ऐ संसार मा
कामयाबी के सितारा,हमरो बर चमकही
सुख के फूलबारी हमरो बर महकही
दिन आही, जब होही हमरो चलन
हमनला हमर खुद के बारे में बतईया
"स्मरण"
नवा किरण अंधियारी ले झांकय
सबो मिलके बैर के ख़ईहाँ ला पाटय
हमर लिखे कागज मा अइसे साजय
पढ़हईया सुनईया ला बने बने लागय
मीठ बोली प्रेम के झरना बरोबर झरन
मीत मितानी सब संग करवईया
"स्मरण"
हमर बोली ,कान मा रस कस हो जाये
घोरे मिसरी,मन्दरस कस हो जाये
सबो चीज बदले बदले कस हो जाये
काम अइसे करन, के हमरो जस हो जाये
अइसे लागे जइसे, होहे नवा अवतरण
सबला संग मा लेके चलवईया
"स्मरण"
                        रचना
              देवेन्द्र कुमार ध्रुव(डीआर)
                 फुटहा करम (बेलर)
             जिला गरियाबंद (छ ग)

दुरलभ हे मनखे तन

जिनगी के मोल गजब हे
   झन समझो एला गरू
मनखे तन आमा कस मीठ
   झन करव एला करू
महत ल एकर जान पावन करले मन
  दुरलभ हे मनखे तन....

सुग्घर तन ला पाके,,मोह माया म भुलागे
का करनी तैंहा करे,,दई ददा ह रूलागे
छोटे बड़े के चिनहारी नई जाने
    आदर सतकार दूरियागे
साथी संगत म चाल बिगड़गे
    आनी बानी के पीरा हरियागे
दुनियादारी छोड़ बने करले जतन
  दुरलभ हे मनखे तन....

नशा पानी म निच्चट भिनगे
  तन ला तहूँ खिया डारे
किसम किसम के रोग रई म
  आधा जिनगी सिरा डारे
का समझे ए तन के महत ल
   बिरथा दिन ला पोहा दे
नई मिलय अइसन दुबारा
   हांसी ठिठौली म बोहा दे
जिनगी सुधारे बर अब तो कर लगन
   दुरलभ हे मनखे तन....

मनखे तन हे सुग्घर फुलवारी
किसम किसम के फूल लगाले
दया धरम के गोंदा अउ संसकार के गुलाब महकाले
बेवहार म रख मिठास,छोटे बड़े के चिनहारि
जस के काम करे बर,मिले हे जनम उधारी
बैर भाव ल भुलाके पावन करले अन्तरमन
  दुरलभ हे मनखे तन....

विनोद यादव
पंडरीपानी लोहझर
गरियाबंद 36गढ़

Tuesday, 6 September 2016

गरिबहा के रात

अंधना कस पानी, डबकत हे जिनगी,
   न जुड़ न छांव हे
दुःख के गेरवा घेंच म बँधाए
   लचारी के ठेला म पाँव हे।

महँगाई ह घलो ऊपर ले मारत हे लात,
कइसे कटही गरिबहा के रात..।

संसो के दिंयार ह सपना ल चर डारिस
     हांसी घलो धुरियागे
पीरा के घुना तन ल खा डारिस
      गरीबी घलो हरियागे।

मिलत नइ हे खाए बर दार अउ भात,
कइसे कटही गरिबहा के रात..।

जिनगी बनगे खेलौना बरोबर
  जे पाय ते खेलत हे
कलेचुप फेर ओ बिचारा
   कइसनो करके झेलत हे।

बेरा घलो ओला दू आंसू हे रोवात,
कइसे कटही गरिबहा के रात।

घर हे काकरो महल अटारी
मुड़ म हे पांच मंजिला चादर
ओकर बर तो सरग हे,
टूटे छानही खुले बादर।

ले देके दिन ल ओ हे पोहात,
कइसे कटही गरिबहा के रात..।

रचना - विनोद यादव
पंडरीपानी लोहझर
गरियाबंद 36गढ़

गाँव म बिकास होवत हे

आजो घलो ए बात मोला खलत हे
गांव के संसकिरिति आँय बाँय चलत हे
लाज शरम मरयादा सबो सुतत हे
मनखे काहत हे- "मोर गांव म बिकास होवत हे"

लोग लइका के संसकार बदलगे,
छोटे बड़े ल नइ जाने ।
दाई ददा के मरयादा ल,
चिखला कस साने।
आज के बचपन कोन डाहन जावत हे
मनखे काहत हे- "मोर गांव म बिकास होवत हे"

बेटा बहू  के चाल चलन म,
परवार के नेंव खलप गे।
देख करनी दूनो परानी के,
महतारी के आतमा कलप गे।
माथा ल धरके दाई ददा ,दूनो झन रोवत हे
मनखे काहत हे- "मोर गांव म बिकास होवत हे"

इसकूल के हाल छोड़ मनखे,
जुआ सट्टा के हिसाब राखत हे।
हो जाए कोनो करा जुगाड़ कहिके,
दूसर के मुहू ल ताकत हे।
गांव के लीम चांवरा ल,जुआखाना बनावत हे
मनखे काहत हे- "मोर गांव म बिकास होवत हे"

तीज़ तिहार के ठिकाना नइ हे,
मंद मऊहा म सनाए हे।
बात बात म लड़ई होके,
मुहु कान ह चनाए हे।
एक कप पी के, तिहार ल मनावत हे
मनखे काहत हे- "मोर गांव म बिकास होवत हे"

नर नियाव के तो ठिकाना नइ हे,
सिधवा के घेरी बेरी पेसी हे।
लबरा चोरहा नियाव पागे,
काबर ओकर घर अंगरेजी सन देसी हे।
आँखि म चेंदरी बांधे,बेवस्था ह चलत हे
मनखे काहत हे- "मोर गांव म विकास होवत हे"

अइसने बिकास होही,
त ओ गांव के का होही।
जनता करय कछु नही,
मुड़ धरके सबो रोही।
आहि सुमत कहिके सबो,सपना ल संजोवत हे,
मनखे काहत हे- "मोर गांव म बिकास होवत हे"

डोकरा के होस् अउ छोकरा के जोस,
मिलके जब आगू बढ़ही।
त निसचित हे एकात कनि,
परिवरतन ल आना परही।
सबो झन सुमत म ले दे के जुरियावत हे
मनखे कहत हे- "मोर गांव म बिकास होवत हे"

रचना - विनोद यादव
पंडरीपानी लोहझर
गरियाबंद 36गढ़

शिक्षक दिवस विशेष

आपके पदचिन्हो के पिछे-पिछे,
आजीवन चलता जाऊँगा ।

जो राह दिखाई है आपने,
मैं औरो को दिखलाऊंगा ।

सुखी डाली को हरियाली,
बेजान को जीवनदान दिया ।

काले अंधियारे जीवन को,
सौ सूरज से धनवान किया ।

कान पकड़ उठक-बैठक,
थी छड़ियो की बरसात हुई ।

समझ न पाया उस क्षण मै,
अनुशासन की शुरूवात हुई ।

जीवन को चलते रहना है,
लौ इसकी झिलमिल जलती है ।

जीवन के हर चौराहो पर,
बस कमी तुम्हारी खलती है ।

रचना - युवा कवि-लक्की गुप्ता
मुड़ागाँव (छुरा)गरियाबँद

बेटी अवतार ले

           !! १ !!
तोर चिन्हा बन के आवंव,
तैं सुन, मोरो गोहार ले..।
घर के, तुलसी मैं कहावंव,
मोला कोरा म, उतार ले..।

तोर बगिया म, फूले राहंव..।
मैं जग म, नाव बगरावंव,
दाई तैं अपन बेटी ल,
दुनिया म, अवतार ले......। २
            तैं सून, मोरो गोहार ले...। २

            !! २ !!
तोर दुलवरिन बन के आवंव,
तैं सून, मोरो गोहार ले..।
घर के लछ्मी, मैं कहावंव,
मोला बांही म, पोटार ले..।

तोर अंगना म, खेले हावंव..।
मैं कभू नाक नई कटावंव।
ददा तैं अपन बेटी ल,
गोदी म,बईठार ले........। २
               तैं सून, मोरो गोहार ले...। २

             !! ३ !!
तोर बर राखी धर के आवंव,
तैं सून, मोरो गोहार ले..।
आंसू बन के, मैं बोहावंव,
मोर डोली ल,...निहार ले..।

तोर संग म, पले हावंव..।
मैं बड़, भागमानी कहावंव,
भाई तैं अपन बहिनी ल,
थोकन, दुलार ले........। २
               तैं सून, मोरो गोहार ले...। २

ललित साहू "जख्मी" छुरा
जिला - गरियाबंद (छ.ग.)

समय

समय आज है ,समय कल है,
समय " युग" है ,समय पल है।

समय अटल है ,समय चल है,
समय सुधा है ,समय गरल है,
समय प्रश्न है  ,समय हल है।
समय आज............

समय बीज है समय फल है,
समय  मल  है ,समय विमल है,"
समय अतल है, समय तल है।
समय आज.............

समय सघन है ,समय विरल है,
समय कठिन है, समय सरल है,
समय अटल है ,समय चल है।
समय आज ................

समय एकल है ,समय दल है,
समय ठोस है ,समय तरल है,
समय संयम है ,समय संबल है।
समय आज ..............

समय निरस है,समय सजल है,
समय ईमान है, समय छल है,
समय "धन " है ,समय "बल "है।
समय आज.................

रचना - हीरालाल गुरूजी"समय"
छुरा जिला गरियाबंद

हिंद देश महान है

जहाँ की मिट्टी सोना चांदी,हीरे मोती की खान है।
जिसने जग को शून्य दिया,यह हिंद देश महान है।

जहाँ अन्न उगाता धरापुत्र,सुरक्षा करता जवान है।
जहाँ उगते बहु साग पुष्प,भिन्न भिन्न खान पान है।
विविधताओं से भरी धरा,यह  हिंद देश महान है।

जहाँ सिक्ख इसाई भाई,भाई हिन्दू- मुसलमान है।
जहाँ एक ओर गीता पाठ,दूसरी ओर अजान है।
विविधताओं से भरी धरा,यह हिंद देश महान है।

भिन्न भिन्न भाषा भाषी,पहनते विविध परिधान है।
भिन्न भिन्न धर्म के फूल,बगिया में एक समान है।
विविधताओं से भरी धरा,यह हिंद देश महान है।

सागर उतरती पनडुब्बी,गगन लांघता विमान है।
कल कारखाने की धूंध,हरियाली चाय बागान है।
विविधताओं से भरी धरा,वह हिंद देश महान है।

रचना - हीरालाल गरूजी"समय"
छुरा जिला गरियाबंद

मनखे काबर मुंहलुकवा होगे

आज मनखे काबर मुंहलुकवा होगे ।
रात करियाकर बिहाने सुकवा होगे।
आज मनखे............

लइका होय ,सियान होय,
बुढ़वा होय, सग्यान होय,
बैइरी होय, मितान होय,
सबके काया सुगसुगहा होगे।
आज मनखे काबर मुंहलुकवा होगे।

करजा म लदाय होय,
नउकरी म बंधाय होय।
निसा ल चढ़ाय होय,
सबके मन ह घुरघरहा होगे।
आज मनखे काबर मुंहलुकवा होगे।

रात करथे चोरी हारी,
दिन करथे भ्रस्टाचारी।
दिनरात करथे चुकली चारी,
सबके आंखी ह घुघवा होगे।
आज मनखे काबर मुंहलुकवा होगे।

रचना- हीरालाल गुरूजी"समय"
छुरा जिला गरियाबंद

सरसती गनेस तुंहर आरती उतारंव

सरसती गनेस ,तुंहर आरती उतारंव ।....2
हर लेव कलेस, तुंहर पांव मै पखारंव ।...2

फूलपान दूबी धरके,थारी सजावंव ।
गुलाल बंदन चंदन के,टीका लगावंव ।
नरियर गुर  लड्डू के, भोग चढ़ावंव।
आरती ऊतार के...2,अपन माथ नवांवव।
सरसती गनेस ,तुंहर आरती उतारंव ।....2
हर लेव कलेस, तुंहर पांव मै पखारंव ।...2

मैं हर आवंव तुंहर,नानकुन लइका।
ग्यान अऊ बुद्धि नईहे,नईहे पइसा ।
बिपती म परके तुंहर ,सरन म परेहंव।
मोर पीरा ल दाई...2 दुरिहा खेदारव।
सरसती गनेस ,तुंहर आरती उतारंव ।....2
हर लेव कलेस, तुंहर पांव मै पखारंव ।...2

सुख संमपति भंडार भरे,आसीस देवव।
ग्यान,मान,सम्मान मिले,आसीस देवव।
दाई-ददा के सेवा करंव अऊ,तुंहर गुन गावंव।
घीव अऊ कपूर के दाई...2 दिया मैं जलावंव।
सरसती गनेस ,तुंहर आरती उतारंव ।....2
हर लेव कलेस, तुंहर पांव मै पखारंव ।...2

रचना-हीरालाल गुरुजी
छुरा जिला गरियाबंद

पइसा कमाय बर सीख

गरीब हस त का होइस,अमीर असन दिख ।
कलजुग म जीना हे तब,पइसा कमायबर सीख ।

बनी कर बिगारी कर,चलाकी कर हुसयारी कर।
हिजगा कर चारी कर,सिरतोन कर लबारी कर।
काम बुता बेपार जम्मो ,राहय अड़बड़ निक।
कलजुग म जीना हे तब,पइसा कमायबर सीख ।

बड़हर घर बिहाव कर,मनखे देखके नियाव कर।
दाइज के चिन्हाव कर,अपन चीज के हियाव कर।
कारी ,गोरी, मोठबर,फोकटिया झिन पइसा म बिक।
कलजुग म जीना हे तब,पइसा कमायबर सीख।

नेता होय, सरकार होय,नत्ता होय परिवार होय।
नउकरी होय बेपार होय,सुबिचार होय बेवहार होय।
सहर, गांव ,खेत-खार कोन्हो बिषय बर लिख।
कलजुग म जीना हे तब,पइसा कमायबर सीख ।

गरब कर गुमान कर,जांगर टोर कि अराम कर।
अकल कर धियान कर,अपन कर कि बिरान कर।
दुख-सुख तीजतिहार म,मांगे झिन परय भीख।
कलजुग म जीना हे तब,पइसा कमायबर सीख।

गरीब हस त का होइस,अमीर असन दिख ।
कलजुग म जीना हे तब,पइसा कमायबर सीख ।

रचना-हीरालाल गुरुजी "समय"
छुरा जिला गरियाबंद

Wednesday, 31 August 2016

गुरुकुल ह इस्कूल बनगे

गुरुकुल ह इस्कूल बनगे,
रद्दा भुलागे सिक्छा।
सिस्यमन आगू बढ़त हे,
बिना देवाय परिच्छा।

राम-कृष्ण गुरुकुल जाके,
गुरु ले पाईन सिक्छा।
जग म ऊँखर पूजा होवथे,
कथा चलत हे अच्छा।

धनुरधारी बनेबर अर्जुन,
आँखी म मारिस तीर।
युधिष्ठीर भीम घलो सबल,
गुरु ह बनाइस बीर।

चाणक्य कर जाके चंन्द्रगुप्त,
देशभक्ति के सिक्छा पाईस।
अखंड भारत बनाके ओहा,
जग म नाव अपन कमाईस।

"समय" बदल गे, नीत बदल गे,
बदल गे सिक्छा के अधिकार।
सकल बिकास के नारा बदलगे,
गुरु अऊ सिक्छा होगे बेकार।

गुरु के पाँव परे बर आज,
चेला ल लाज आवथे।
गुरु-चेला के नत्ता गोत्ता,
एकरे सेती दुरिहावथे।

गुरुपुन्नी अब टीचरडे बनगे,
सर ह आज पूजाथे।
सरकार से बिनती हे सोचय,
सिक्छा कोन कोती जाथे।

रचना- हीरालाल गुरुजी"समय"
छुरा जिला - गरियाबंद

अवईया हावे तीजा-पोरा

उत्ता - धुर्रा चलावत हावे, कुम्हार अपन चाक,
बड़ जल्दी अवईया हावे, तीजा-पोरा के पाख।

कन्हार के माटी ल, बड़ सुग्घर सिरजावत हे,
रंग - बिरंगी नाद - बईला मनमाने बनावत हे।

पको डरे हे तिकर मन के, उघारत हे आंखी,
गुलाबी, लाल, सोनहा रंग ल पोतत हे काकी।

नानुक चुल्हा, नानुक बटलोही झारा बनाय हे,
बाल्टी, कढ़ई, तावा मे डंठल घलो धराय हे।

लईका रिझाये बर, गैस सिलेंडर घलो बनाय हे,
नाद-बईला के चक्का ल, रोंठ - रोंठ बनाय हे।

बईला गाड़ी म भर के, बेचे बर हाट जावत हे,
लेवईया आवत नई हे, बपूरा बईठे उंघावत हे।

तिहार ल दिन हे कहिके, कुम्हार आस लगाये हे,
फेर हमर संस्कृति बर परदेसिया घात लगाये हे।

अपन ल भुला के, पश्चिमी संस्कृति अपनावत हे,
सबो तिहार ल घर बईठे, मोबाइल म मनावत हे।

खेत-खार, तरिया-ड़बरा मसीन म खनावत हे,
गांव-गांव ले सिरतोन म, बईला हा नंदावत हे।

पलासटिक खिलौना हाट मे, आगे आनी-बानी,
कुम्हार के परवार बर कहां ले आये दाना-पानी।

ललित साहू "जख्मी"  छुरा
जिला - गरियाबंद (छ.ग.)

बरखा की पहली बूंद

तीव्र वेग समीर बह चली,
रजकण गर्दिश चुमने चली।

तरु की शाखा हिलने लगी,
कुछ तो साथ छोड़ने लगी।

मेघ काले मंडराने लगे,
रवि किरण धुंधलाने लगे।

विहंग कोठरों में दुबक गये,
मनुज कोठरी मे छुपक गये।

तड़ित की वैभव चमक उठी,
आकाशवाणी की शंखनाद उठी।

धीरे से छन-छन की आवाज कर,
बरखा की पहली बुंद,
         आई मेरे द्वार पर ।
         आई मेरे द्वार पर।

हीरालाल गुरुजी ''समय"
       छुरा-गरियाबंद

और भी हैं दाना मांझी

आज उसकी व्यथा देखकर,
अचानक ही सब गांधी हो गये।
बन के मांझी के शुभचिन्तक,
संवेदनाओं की आंधी हो गये।
     मानवता का यह उफनता जोश,
     मोबाईल तक ही थम जायेगा।
     दौंड़ता रक्त, आंखों का आंखों में,
     दो दिन में वापस जम जायेगा।
क्यों समझते हो, मांझी एक है,
मांझीयों की तो लंबी कतार है।
इंसानियत पर ऐसे किस्सों की,
अनगिनत सिसकियां उधार है।
     जो बने रहे, तमाशबीन परिदर्शक,
     बेशक उन सबको ही धिक्कार है।
     पर झुठा आंसू बहाने वाला भी,
     निहायत ही दोगला है, मक्कार है।
हर रोज कोई असहाय मांझी,
अपनी संगिनी का लाश ढोता है।
बताओ सोशल मिडिया वालों,
उसके साथ खड़ा, कौन होता है?
     तुम ही तो इंतजार करते रहते हो,
     किसी की आबरु के लूट जाने का।
     अब क्यों सहानुभूति दिखाते हो,
     किसी के सांसों के रुक जाने का।
बिना अॉक्सीजन के अस्पताल,
क्या तुम्हें, कभी नजर नही आते?
कुछ लाशें, यूं ही सड़ जाती है,
कोई उन्हें ले जाने भी नही आते।
     महज मोबाईल की सोहबत से,
     किसी मांझी का भला नही होगा।
     यकीन नही, तो इतिहास देख लो,
     बातों से ही, मुसीबत टला नही होगा।

ललित साहू "जख्मी" छुरा
जिला- गरियाबंद (छ.ग.)

अईसन छत्तीसगढ़ हे मोर

अईसन छत्तीसगढ़ हे मोर ...२
आदि -अनादि काल ले जेकर
   उड़त हावय सोर ...२ अईसन छत्तीसगढ़
१.
एकर महिमा में का बखानव
मोरतधज के नगरी हे ,
अत्रि ,श्रृंगी अउ बाल्मीकि के
छछले ज्ञान के गगरी हे ...२
संत भूमि ये छत्तीसगढ़ हा $$  २
सत के करे अंजोर ....अईसन
२.
कोसल के परताप ला देखव
महकोसल ये कहाये हे ,
राजिम लोचन ,कमल क्षेत्र ल
  कोख अपन सिरजाये हे ...२
पुन्य भूमि जिन्हा लव कुश जन्मे $$..२
कौशिल्या के ललोर ....अईसन
३.
सिरपुर ,भोरमदेव ,आरंग हर
  स्वाभिमान छत्तीसगढ़ के
अरपा ,पैरी ,महानदी हा
  जिनगी हे छत्तीसगढ़ के ....२
भेलई ,कोरबा ,बैलाडीला $$ हे ...२
एखर बहाँ सजोर ....अईसन छत्तीसगढ़...

रचना - धनराज साहू, बागबाहरा (छ.ग.)

Saturday, 27 August 2016

मैं छत्तीसगढ़िया किसान

मैं छत्तीसगढ़िया किसान
मिहनत मोर संगी मितान.....2
           ये माटी मोर माता......2
           आकाश पिता समान..
मैं छत्तीसगढ़िया किसान...........

1.  फोर के पथरा..ताप के भोंभरा
     भुंईया ल कोन सरग बनाही.....2
      ये धरती के मैं हौं सिपाही
      मोर सिवा अन्न कोन उपजाही...२
      घाम पियास अऊ बारो मास
      खेत म जी परान......
      मैं छत्तीसगढ़िया किसान.....

2.  बिजरी चमके बादर बरसे
      चारो डाहर होगे हरियाली....२
      जतके पानी ओतके पसीना
      तब आथे जी धान म बाली ....२
      बासी चटनी मैं ह खवईया
      ये ही हे मोर पहिचान......
      मैं छत्तीसगढ़िया किसान......

3.  घर कुरिया हे खपरा छानी
     चारो कोयि टपकय पानी.....२
      दुख दरद बर मैं संगवारी
      भाखा निरमल मंदरस बानी....२
     नवा रद्दा नवां अंजोर
     आगे नवा बिहान.....

     मैं छत्तीसगढ़िया किसान
     मिहनत मोर संगी मितान

रचना:-- दीनदयाल टंडन
शास .उ. मा. वि. पीपरछेड़ी