गरिबहा के रात
अंधना कस पानी, डबकत हे जिनगी,
न जुड़ न छांव हे
दुःख के गेरवा घेंच म बँधाए
लचारी के ठेला म पाँव हे।
न जुड़ न छांव हे
दुःख के गेरवा घेंच म बँधाए
लचारी के ठेला म पाँव हे।
महँगाई ह घलो ऊपर ले मारत हे लात,
कइसे कटही गरिबहा के रात..।
कइसे कटही गरिबहा के रात..।
संसो के दिंयार ह सपना ल चर डारिस
हांसी घलो धुरियागे
पीरा के घुना तन ल खा डारिस
गरीबी घलो हरियागे।
हांसी घलो धुरियागे
पीरा के घुना तन ल खा डारिस
गरीबी घलो हरियागे।
मिलत नइ हे खाए बर दार अउ भात,
कइसे कटही गरिबहा के रात..।
कइसे कटही गरिबहा के रात..।
जिनगी बनगे खेलौना बरोबर
जे पाय ते खेलत हे
कलेचुप फेर ओ बिचारा
कइसनो करके झेलत हे।
जे पाय ते खेलत हे
कलेचुप फेर ओ बिचारा
कइसनो करके झेलत हे।
बेरा घलो ओला दू आंसू हे रोवात,
कइसे कटही गरिबहा के रात।
कइसे कटही गरिबहा के रात।
घर हे काकरो महल अटारी
मुड़ म हे पांच मंजिला चादर
ओकर बर तो सरग हे,
टूटे छानही खुले बादर।
मुड़ म हे पांच मंजिला चादर
ओकर बर तो सरग हे,
टूटे छानही खुले बादर।
ले देके दिन ल ओ हे पोहात,
कइसे कटही गरिबहा के रात..।
कइसे कटही गरिबहा के रात..।
रचना - विनोद यादव
पंडरीपानी लोहझर
गरियाबंद 36गढ़
पंडरीपानी लोहझर
गरियाबंद 36गढ़