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Tuesday, 6 September 2016

गरिबहा के रात

अंधना कस पानी, डबकत हे जिनगी,
   न जुड़ न छांव हे
दुःख के गेरवा घेंच म बँधाए
   लचारी के ठेला म पाँव हे।

महँगाई ह घलो ऊपर ले मारत हे लात,
कइसे कटही गरिबहा के रात..।

संसो के दिंयार ह सपना ल चर डारिस
     हांसी घलो धुरियागे
पीरा के घुना तन ल खा डारिस
      गरीबी घलो हरियागे।

मिलत नइ हे खाए बर दार अउ भात,
कइसे कटही गरिबहा के रात..।

जिनगी बनगे खेलौना बरोबर
  जे पाय ते खेलत हे
कलेचुप फेर ओ बिचारा
   कइसनो करके झेलत हे।

बेरा घलो ओला दू आंसू हे रोवात,
कइसे कटही गरिबहा के रात।

घर हे काकरो महल अटारी
मुड़ म हे पांच मंजिला चादर
ओकर बर तो सरग हे,
टूटे छानही खुले बादर।

ले देके दिन ल ओ हे पोहात,
कइसे कटही गरिबहा के रात..।

रचना - विनोद यादव
पंडरीपानी लोहझर
गरियाबंद 36गढ़

गाँव म बिकास होवत हे

आजो घलो ए बात मोला खलत हे
गांव के संसकिरिति आँय बाँय चलत हे
लाज शरम मरयादा सबो सुतत हे
मनखे काहत हे- "मोर गांव म बिकास होवत हे"

लोग लइका के संसकार बदलगे,
छोटे बड़े ल नइ जाने ।
दाई ददा के मरयादा ल,
चिखला कस साने।
आज के बचपन कोन डाहन जावत हे
मनखे काहत हे- "मोर गांव म बिकास होवत हे"

बेटा बहू  के चाल चलन म,
परवार के नेंव खलप गे।
देख करनी दूनो परानी के,
महतारी के आतमा कलप गे।
माथा ल धरके दाई ददा ,दूनो झन रोवत हे
मनखे काहत हे- "मोर गांव म बिकास होवत हे"

इसकूल के हाल छोड़ मनखे,
जुआ सट्टा के हिसाब राखत हे।
हो जाए कोनो करा जुगाड़ कहिके,
दूसर के मुहू ल ताकत हे।
गांव के लीम चांवरा ल,जुआखाना बनावत हे
मनखे काहत हे- "मोर गांव म बिकास होवत हे"

तीज़ तिहार के ठिकाना नइ हे,
मंद मऊहा म सनाए हे।
बात बात म लड़ई होके,
मुहु कान ह चनाए हे।
एक कप पी के, तिहार ल मनावत हे
मनखे काहत हे- "मोर गांव म बिकास होवत हे"

नर नियाव के तो ठिकाना नइ हे,
सिधवा के घेरी बेरी पेसी हे।
लबरा चोरहा नियाव पागे,
काबर ओकर घर अंगरेजी सन देसी हे।
आँखि म चेंदरी बांधे,बेवस्था ह चलत हे
मनखे काहत हे- "मोर गांव म विकास होवत हे"

अइसने बिकास होही,
त ओ गांव के का होही।
जनता करय कछु नही,
मुड़ धरके सबो रोही।
आहि सुमत कहिके सबो,सपना ल संजोवत हे,
मनखे काहत हे- "मोर गांव म बिकास होवत हे"

डोकरा के होस् अउ छोकरा के जोस,
मिलके जब आगू बढ़ही।
त निसचित हे एकात कनि,
परिवरतन ल आना परही।
सबो झन सुमत म ले दे के जुरियावत हे
मनखे कहत हे- "मोर गांव म बिकास होवत हे"

रचना - विनोद यादव
पंडरीपानी लोहझर
गरियाबंद 36गढ़

शिक्षक दिवस विशेष

आपके पदचिन्हो के पिछे-पिछे,
आजीवन चलता जाऊँगा ।

जो राह दिखाई है आपने,
मैं औरो को दिखलाऊंगा ।

सुखी डाली को हरियाली,
बेजान को जीवनदान दिया ।

काले अंधियारे जीवन को,
सौ सूरज से धनवान किया ।

कान पकड़ उठक-बैठक,
थी छड़ियो की बरसात हुई ।

समझ न पाया उस क्षण मै,
अनुशासन की शुरूवात हुई ।

जीवन को चलते रहना है,
लौ इसकी झिलमिल जलती है ।

जीवन के हर चौराहो पर,
बस कमी तुम्हारी खलती है ।

रचना - युवा कवि-लक्की गुप्ता
मुड़ागाँव (छुरा)गरियाबँद

बेटी अवतार ले

           !! १ !!
तोर चिन्हा बन के आवंव,
तैं सुन, मोरो गोहार ले..।
घर के, तुलसी मैं कहावंव,
मोला कोरा म, उतार ले..।

तोर बगिया म, फूले राहंव..।
मैं जग म, नाव बगरावंव,
दाई तैं अपन बेटी ल,
दुनिया म, अवतार ले......। २
            तैं सून, मोरो गोहार ले...। २

            !! २ !!
तोर दुलवरिन बन के आवंव,
तैं सून, मोरो गोहार ले..।
घर के लछ्मी, मैं कहावंव,
मोला बांही म, पोटार ले..।

तोर अंगना म, खेले हावंव..।
मैं कभू नाक नई कटावंव।
ददा तैं अपन बेटी ल,
गोदी म,बईठार ले........। २
               तैं सून, मोरो गोहार ले...। २

             !! ३ !!
तोर बर राखी धर के आवंव,
तैं सून, मोरो गोहार ले..।
आंसू बन के, मैं बोहावंव,
मोर डोली ल,...निहार ले..।

तोर संग म, पले हावंव..।
मैं बड़, भागमानी कहावंव,
भाई तैं अपन बहिनी ल,
थोकन, दुलार ले........। २
               तैं सून, मोरो गोहार ले...। २

ललित साहू "जख्मी" छुरा
जिला - गरियाबंद (छ.ग.)

समय

समय आज है ,समय कल है,
समय " युग" है ,समय पल है।

समय अटल है ,समय चल है,
समय सुधा है ,समय गरल है,
समय प्रश्न है  ,समय हल है।
समय आज............

समय बीज है समय फल है,
समय  मल  है ,समय विमल है,"
समय अतल है, समय तल है।
समय आज.............

समय सघन है ,समय विरल है,
समय कठिन है, समय सरल है,
समय अटल है ,समय चल है।
समय आज ................

समय एकल है ,समय दल है,
समय ठोस है ,समय तरल है,
समय संयम है ,समय संबल है।
समय आज ..............

समय निरस है,समय सजल है,
समय ईमान है, समय छल है,
समय "धन " है ,समय "बल "है।
समय आज.................

रचना - हीरालाल गुरूजी"समय"
छुरा जिला गरियाबंद

हिंद देश महान है

जहाँ की मिट्टी सोना चांदी,हीरे मोती की खान है।
जिसने जग को शून्य दिया,यह हिंद देश महान है।

जहाँ अन्न उगाता धरापुत्र,सुरक्षा करता जवान है।
जहाँ उगते बहु साग पुष्प,भिन्न भिन्न खान पान है।
विविधताओं से भरी धरा,यह  हिंद देश महान है।

जहाँ सिक्ख इसाई भाई,भाई हिन्दू- मुसलमान है।
जहाँ एक ओर गीता पाठ,दूसरी ओर अजान है।
विविधताओं से भरी धरा,यह हिंद देश महान है।

भिन्न भिन्न भाषा भाषी,पहनते विविध परिधान है।
भिन्न भिन्न धर्म के फूल,बगिया में एक समान है।
विविधताओं से भरी धरा,यह हिंद देश महान है।

सागर उतरती पनडुब्बी,गगन लांघता विमान है।
कल कारखाने की धूंध,हरियाली चाय बागान है।
विविधताओं से भरी धरा,वह हिंद देश महान है।

रचना - हीरालाल गरूजी"समय"
छुरा जिला गरियाबंद

मनखे काबर मुंहलुकवा होगे

आज मनखे काबर मुंहलुकवा होगे ।
रात करियाकर बिहाने सुकवा होगे।
आज मनखे............

लइका होय ,सियान होय,
बुढ़वा होय, सग्यान होय,
बैइरी होय, मितान होय,
सबके काया सुगसुगहा होगे।
आज मनखे काबर मुंहलुकवा होगे।

करजा म लदाय होय,
नउकरी म बंधाय होय।
निसा ल चढ़ाय होय,
सबके मन ह घुरघरहा होगे।
आज मनखे काबर मुंहलुकवा होगे।

रात करथे चोरी हारी,
दिन करथे भ्रस्टाचारी।
दिनरात करथे चुकली चारी,
सबके आंखी ह घुघवा होगे।
आज मनखे काबर मुंहलुकवा होगे।

रचना- हीरालाल गुरूजी"समय"
छुरा जिला गरियाबंद

सरसती गनेस तुंहर आरती उतारंव

सरसती गनेस ,तुंहर आरती उतारंव ।....2
हर लेव कलेस, तुंहर पांव मै पखारंव ।...2

फूलपान दूबी धरके,थारी सजावंव ।
गुलाल बंदन चंदन के,टीका लगावंव ।
नरियर गुर  लड्डू के, भोग चढ़ावंव।
आरती ऊतार के...2,अपन माथ नवांवव।
सरसती गनेस ,तुंहर आरती उतारंव ।....2
हर लेव कलेस, तुंहर पांव मै पखारंव ।...2

मैं हर आवंव तुंहर,नानकुन लइका।
ग्यान अऊ बुद्धि नईहे,नईहे पइसा ।
बिपती म परके तुंहर ,सरन म परेहंव।
मोर पीरा ल दाई...2 दुरिहा खेदारव।
सरसती गनेस ,तुंहर आरती उतारंव ।....2
हर लेव कलेस, तुंहर पांव मै पखारंव ।...2

सुख संमपति भंडार भरे,आसीस देवव।
ग्यान,मान,सम्मान मिले,आसीस देवव।
दाई-ददा के सेवा करंव अऊ,तुंहर गुन गावंव।
घीव अऊ कपूर के दाई...2 दिया मैं जलावंव।
सरसती गनेस ,तुंहर आरती उतारंव ।....2
हर लेव कलेस, तुंहर पांव मै पखारंव ।...2

रचना-हीरालाल गुरुजी
छुरा जिला गरियाबंद

पइसा कमाय बर सीख

गरीब हस त का होइस,अमीर असन दिख ।
कलजुग म जीना हे तब,पइसा कमायबर सीख ।

बनी कर बिगारी कर,चलाकी कर हुसयारी कर।
हिजगा कर चारी कर,सिरतोन कर लबारी कर।
काम बुता बेपार जम्मो ,राहय अड़बड़ निक।
कलजुग म जीना हे तब,पइसा कमायबर सीख ।

बड़हर घर बिहाव कर,मनखे देखके नियाव कर।
दाइज के चिन्हाव कर,अपन चीज के हियाव कर।
कारी ,गोरी, मोठबर,फोकटिया झिन पइसा म बिक।
कलजुग म जीना हे तब,पइसा कमायबर सीख।

नेता होय, सरकार होय,नत्ता होय परिवार होय।
नउकरी होय बेपार होय,सुबिचार होय बेवहार होय।
सहर, गांव ,खेत-खार कोन्हो बिषय बर लिख।
कलजुग म जीना हे तब,पइसा कमायबर सीख ।

गरब कर गुमान कर,जांगर टोर कि अराम कर।
अकल कर धियान कर,अपन कर कि बिरान कर।
दुख-सुख तीजतिहार म,मांगे झिन परय भीख।
कलजुग म जीना हे तब,पइसा कमायबर सीख।

गरीब हस त का होइस,अमीर असन दिख ।
कलजुग म जीना हे तब,पइसा कमायबर सीख ।

रचना-हीरालाल गुरुजी "समय"
छुरा जिला गरियाबंद