विनोद यादव की रचनाएँ
सत् के महिमा.
.गिरउधपुरी के संत,
मांहगु अमरउतीन के लाला ए।
जग म जेहा नाम कमइस,
पहिरे सत् के माला ए।
जग म जेहा नाम कमइस,
पहिरे सत् के माला ए।
सत् के रद्दा बताए बर,
ए भुइंया म लिस अवतार।
सादा रंग पहिरे बाबा,
तोर महिमा अपरमपार।
ए भुइंया म लिस अवतार।
सादा रंग पहिरे बाबा,
तोर महिमा अपरमपार।
नाम हे जेकर अजर-अमर,
जइसे धरती अकास।
कंठ म सब सुमरन करलो,
सत् हे घासीदास।
जइसे धरती अकास।
कंठ म सब सुमरन करलो,
सत् हे घासीदास।
सत् के दीया अन्तस् म बरही,
उजियार होही गली-खोर।
जब तक रहि चन्दा-सुरुज,
तोर नाम के रही अंजोर।
उजियार होही गली-खोर।
जब तक रहि चन्दा-सुरुज,
तोर नाम के रही अंजोर।
दुनिया की रीत अजीब,अजीब यहां इंसान।
कोई जाना-पहचाना चेहरा,कोई है अंजान।
कोई जाना-पहचाना चेहरा,कोई है अंजान।
भिन्न-भिन्न रहन-सहन,अलग-अलग है वेश।
भांति-भांति के लोग है,होते नित्य छल द्वेष।
भांति-भांति के लोग है,होते नित्य छल द्वेष।
मानव होकर मानव पर,करते है अत्याचार।
स्वार्थ लिप्त होकर,क्यों भूलते है संस्कार।
स्वार्थ लिप्त होकर,क्यों भूलते है संस्कार।
धन दौलत सब कुछ रहकर भी,कोई है परेशान।
कुछ नहीँ है पास जिनके,सुखी है वो इंसान।
कुछ नहीँ है पास जिनके,सुखी है वो इंसान।
कोई दर्द में रोता है,कोई गम छुपाने हँसता है।
है पास जिनके सुख ऐश्वर्य,चेहरे में मायूसी बसता है।
है पास जिनके सुख ऐश्वर्य,चेहरे में मायूसी बसता है।
जीवन का ना कोई ठिकाना,कब आना कब जाना।
मौत आती है जब,तो नही ढूढ़ती कोई बहाना।
मौत आती है जब,तो नही ढूढ़ती कोई बहाना।
सबसे मिलो हँसकर यहाँ,खुशनुमा खयालात हो।
ना जाने कब किस से,आखिरी मुलाकात हो।
ना जाने कब किस से,आखिरी मुलाकात हो।
समझ नही पाओगे ज़माने के रंग,ना करो खुद पे गुरुर।
जियो परिस्थितियों से जूझकर,अज़ीब है यहाँ के दस्तूर..
जियो परिस्थितियों से जूझकर,अज़ीब है यहाँ के दस्तूर..
माँ की ममता जग में,
जीने का सहारा होता है।
इन पर जीवन का,
हर ख़ुशी न्यौछावर होता है।
जीने का सहारा होता है।
इन पर जीवन का,
हर ख़ुशी न्यौछावर होता है।
पिता का हृदय सागर सा गहरा,
जिनका ना थाह होता है।
संतानो के लिए उनका जीवन,
खुशहाली की राह होता है।
जिनका ना थाह होता है।
संतानो के लिए उनका जीवन,
खुशहाली की राह होता है।
माँ-बाप के बिना जग में,
हर सुख गवारा होता है।
वही तो कच्ची डोर का,
हरदम सहारा होता है।
हर सुख गवारा होता है।
वही तो कच्ची डोर का,
हरदम सहारा होता है।
ना दुखाना दिल कभी,
वही दुनिया के भगवान है।
सेवा करना निःस्वार्थ होकर,
जीवन में सच्चा सम्मान है।
वही दुनिया के भगवान है।
सेवा करना निःस्वार्थ होकर,
जीवन में सच्चा सम्मान है।
करो कोई भी काम सदा उनका ध्यान रहे।
होठों में सदा उनका ही गुणगान रहे।
ऋण से उनके ऊऋण न होगा,
इस बात से तू ना अंजान रहे।
होठों में सदा उनका ही गुणगान रहे।
ऋण से उनके ऊऋण न होगा,
इस बात से तू ना अंजान रहे।
मैं नीरस जिंदगी वीरान की तरह..
तू आई पतझड़ में सावन की तरह..
था मैं एक थका मोर की तरह..
तेरी अहमियत-
खुशियों की बादल की तरह..
तू आई पतझड़ में सावन की तरह..
था मैं एक थका मोर की तरह..
तेरी अहमियत-
खुशियों की बादल की तरह..
बेमतलब जा रहा था ए जीवन,
बेनूर बेसहारे की तरह।
थाम ली हाथ तूने मेरा,
तेरी अहमियत-
...सहारे की तरह।
बेनूर बेसहारे की तरह।
थाम ली हाथ तूने मेरा,
तेरी अहमियत-
...सहारे की तरह।
तपती धुप में तप रहा था रेत की तरह,
तेरी चाहत शीतल नीर की तरह।
टूटते बिखरते रिश्तों में,
तेरी अहमियत-
..मेरी पहचान की तरह।
तेरी चाहत शीतल नीर की तरह।
टूटते बिखरते रिश्तों में,
तेरी अहमियत-
..मेरी पहचान की तरह।
यादों की समुन्दर में तू मोती की तरह,
मैं तलासता तुम्हें शीप की तरह।
हर तरफ मुखौटे बदलते कपड़ो की तरह
तेरी अहमियत-
..मेरे तक़दीर की तरह।
मैं तलासता तुम्हें शीप की तरह।
हर तरफ मुखौटे बदलते कपड़ो की तरह
तेरी अहमियत-
..मेरे तक़दीर की तरह।
नहीँ हो सकती तू दूर मुझसे,
मैं आंसू तू नयन की तरह।
नही धड़केगा दिल मेरा
तेरी अहमियत-
..धड़कन की तरह।
मैं आंसू तू नयन की तरह।
नही धड़केगा दिल मेरा
तेरी अहमियत-
..धड़कन की तरह।
त्याग समर्पण की तू मूरत,
मैं पत्थर का बना मंदिर की तरह।
मैं प्रेम का हूँ राही,
तेरी अहमियत-
..प्रेम की देवी की तरह।
मैं पत्थर का बना मंदिर की तरह।
मैं प्रेम का हूँ राही,
तेरी अहमियत-
..प्रेम की देवी की तरह।
तेरी अहमियत
जिंदगी में बता नही सकते।
ख्याल पल भर तेरा मन से हटा नही सकते।
तेरे बिना मैं चलता फिरता लाश,
तेरी अहमियत-
..मुझमे साँस की तरह।
जिंदगी में बता नही सकते।
ख्याल पल भर तेरा मन से हटा नही सकते।
तेरे बिना मैं चलता फिरता लाश,
तेरी अहमियत-
..मुझमे साँस की तरह।
ना जाने क्यों महफ़िल में,
एक डर सा लगता है।
अपनों के बीच भी,
सूना अहसास सा लगता है।
एक डर सा लगता है।
अपनों के बीच भी,
सूना अहसास सा लगता है।
लूट गई हो दुनिया जिसकी,
खुशियां भी वीरान सा लगता है।
लाखों के भीड़ में भी,
हर मंजर भी सुनसान सा लगता है।
खुशियां भी वीरान सा लगता है।
लाखों के भीड़ में भी,
हर मंजर भी सुनसान सा लगता है।
अजब सी चुभन है दिल में,
सिसक भी सुकून सा लगता है।
दर्द सुनाए भी तो किसे भला,
हर दिल पत्थर सा लगता है।
सिसक भी सुकून सा लगता है।
दर्द सुनाए भी तो किसे भला,
हर दिल पत्थर सा लगता है।
है बाजार में कई बदलते चेहरे,
हर चेहरा फ़िका सा लगता है।
ओढ़ बेरुखी की चादर,
बेनूर भी नूर सा लगता है।
हर चेहरा फ़िका सा लगता है।
ओढ़ बेरुखी की चादर,
बेनूर भी नूर सा लगता है।
सजे है लोग घिनौने रूपो में,
इंसानियत मरा सा लगता है।
मिटा सपना अब जीवन का,
ए जग उजड़ा आशियाँ सा लगता है।
नी जानो आज समाज,
कोन डाहन जावत हे।
सन्सकिरिति ह मनखे ले,
भारी दुरियावत हे।
कोन डाहन जावत हे।
सन्सकिरिति ह मनखे ले,
भारी दुरियावत हे।
सभियता अउ संस्कार ह,चिखला कस सनावत हे।
आज के बचपन ह,भटक भटक जावत हे।
आज के बचपन ह,भटक भटक जावत हे।
ददा होगे दरुहा त,
टुरा ल दारू मंगावत हे।
संगे म बइठार के वहुला,
थोक-थोक पियावत हे।
टुरा ल दारू मंगावत हे।
संगे म बइठार के वहुला,
थोक-थोक पियावत हे।
दिंयार कस नसा ह,सबला चिक्कट खावत हे।
आज के बचपन ह,भटक भटक जावत हे।
आज के बचपन ह,भटक भटक जावत हे।
इस्कूल जाथन कहिके लईका,
रोज दिन घर ले जावत हे।
अलकरहा टुरा मन सन रहिके,
आनि-बानि के धुंवा उड़ावत हे।
रोज दिन घर ले जावत हे।
अलकरहा टुरा मन सन रहिके,
आनि-बानि के धुंवा उड़ावत हे।
आगि बरोबर उँकर जवानी,चनचन ले भुंजावत हे।
आज के बचपन ह,भटक भटक जावत हे।
आज के बचपन ह,भटक भटक जावत हे।
बेरा रेहे के पहिली,
अइसन इस्थिति ले बचाना हे।
बने सिक्षा अउ परवरिस ले,
लईका के जिनगी ल,
सुग्घर बनाना हे।
अइसन इस्थिति ले बचाना हे।
बने सिक्षा अउ परवरिस ले,
लईका के जिनगी ल,
सुग्घर बनाना हे।
अतकिच बात ल तो,ए विनोद ह गोहरावत हे।
आज के बचपन ह,भटक भटक जावत हे।
आज के बचपन ह,भटक भटक जावत हे।
विनोद यादव
पंडरीपानी छुरा गरियाबंद 36गढ़
समाज...पंडरीपानी छुरा गरियाबंद 36गढ़
बनकर दीप जग में,
जल रहे हो आज।
शिक्षा संस्कार बिखेरने का,
कर रहे हो काज।
जल रहे हो आज।
शिक्षा संस्कार बिखेरने का,
कर रहे हो काज।
आप है तो मानव का,
है धरा में साज।
मानव को मानव बनाने का,
हो रहा आगाज।
है धरा में साज।
मानव को मानव बनाने का,
हो रहा आगाज।
नमन है मेरा आपको,
हे श्रेष्ठ समाज..
हे श्रेष्ठ समाज..
आप है तो धरा में,
मानव का पहचान है।
आप है तो मानव का,
पद और सम्मान है।
मानव का पहचान है।
आप है तो मानव का,
पद और सम्मान है।
आप से ही सुसज्जित है,
मानवता का ताज।
नमन है मेरा आपको,
हे श्रेष्ठ समाज।
मानवता का ताज।
नमन है मेरा आपको,
हे श्रेष्ठ समाज।
नव संकल्पों का पाठ पढ़ाया ।
उंच-नीच का भेद मिटाया।
जिसने जानी तेरी महत्ता,
अमूल्य रत्न उसने पाया।
उंच-नीच का भेद मिटाया।
जिसने जानी तेरी महत्ता,
अमूल्य रत्न उसने पाया।
आप से ही है,इंसानियत को नाज।
नमन है मेरा आपको,
हे श्रेष्ठ समाज..
नमन है मेरा आपको,
हे श्रेष्ठ समाज..
विनोद यादव
पंडरीपानी छुरा गरियाबंद 36गढ़
पंडरीपानी छुरा गरियाबंद 36गढ़
सच्चा पालक..
बुराइयों से लड़ना सिखाये,
अच्छाइयों के भाव भरे।
संस्कारवान गुणगान बनाकर,
राष्ट्र का निर्माण करे।
अच्छाइयों के भाव भरे।
संस्कारवान गुणगान बनाकर,
राष्ट्र का निर्माण करे।
संग जिसके रहकर,
नेक बने बालक।
वही तो है इस जग में,
सच्चा पालक..
नेक बने बालक।
वही तो है इस जग में,
सच्चा पालक..
माँ है तो ममता दुलार,
संग सादर सत्कार है।
पिता है तो डाँट सबक,
संग उसके पुचकार है।
संग सादर सत्कार है।
पिता है तो डाँट सबक,
संग उसके पुचकार है।
औलाद का मार्गदर्शन करे,
बनकर वो चालक
वही तो है इस जग में,
सच्चा पालक..
बनकर वो चालक
वही तो है इस जग में,
सच्चा पालक..
चुभे कांटे पैरो में उनके,
माँ बाप को दर्द होता है।
खुशियो की खातिर उनके,
माँ बाप को एहसास होता है।
माँ बाप को दर्द होता है।
खुशियो की खातिर उनके,
माँ बाप को एहसास होता है।
चेहरे में दिखे जिनके,
शिष्टता की झलक।
वही तो है इस जग में,
सच्चा पालक..
शिष्टता की झलक।
वही तो है इस जग में,
सच्चा पालक..
विनोद यादव
पंडरीपानी छुरा गरियाबंद 36गढ़
पंडरीपानी छुरा गरियाबंद 36गढ़
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