देवेन्द्र कुमार फुठहा करम की रचनाएँ
खुद को बेकरार करके...
उनके बगैर भी हम खुश रह लेंगे अकेले ही,
कह तो दिया...
मगर ऐसा है कि हमने,
कभी अदाकारी नही की...
सरन मा हव मै हिंगलाज माई वो
साज दे बिगड़े मोर काज दाई वो
भगत ला अब तो अपन दरस देखा जा
राख ले अब ते मोर लाज दाई वो ......
गजल.....
उनको अपना यूँ राजदार करके,
गलती की उनपर ऐतबार करके
गलती की उनपर ऐतबार करके
आने का वादा वक्त बीत जाता,
तन्हा ही है हम इन्तजार करके ।
तन्हा ही है हम इन्तजार करके ।
अब तो मेरे ये आँसु रोज बरसे,
हम तो रोयें हैं,आज प्यार करके ।
हम तो रोयें हैं,आज प्यार करके ।
अपने हिस्से में गम बेशुमार करके,
तड़पे खुद को यूँ बेकरार करके ।
तड़पे खुद को यूँ बेकरार करके ।
पछताये हम तो लेनदार बनके,
सौदा घाटे का बार बार करके ।
सौदा घाटे का बार बार करके ।
हमने जाना जब ठोकरें मिली है,
भुल की रास्ता ये इख्तियार करके ।
भुल की रास्ता ये इख्तियार करके ।
कविता...
उसकी बिंदिया...
गजब नूर चेहरे में,उस पर वो काला तिल ,
सब हार बैठा मैं,ये मुझसे छीने मेरा दिल,
मैं सिमट जाना चाहता हूँ इन्ही के दरमियाँ,
उनके माथे की बिंदिया ही,मेरी दुनिया ....
सब हार बैठा मैं,ये मुझसे छीने मेरा दिल,
मैं सिमट जाना चाहता हूँ इन्ही के दरमियाँ,
उनके माथे की बिंदिया ही,मेरी दुनिया ....
निकल पड़ा हूँ मैं,अब उन्हें पाने की आश में,
चैन शुकुन,अपनी उस जिंदगी की तलाश में,
यारों आजकल मैं बड़ा बेसब्र सा हो गया हूँ,
उनकी बिंदिया चुरा ले गई,मेरी निंदिया ...
चैन शुकुन,अपनी उस जिंदगी की तलाश में,
यारों आजकल मैं बड़ा बेसब्र सा हो गया हूँ,
उनकी बिंदिया चुरा ले गई,मेरी निंदिया ...
कविता...
रूठो ना....
अरे किसी से इतना ना रूठो
कि तुमको मनाने वाला ही तुम्ही से रूठ जाये.....
कि तुमको मनाने वाला ही तुम्ही से रूठ जाये.....
जिसके साथ की हमेशा खुदा से मांगी थी दुआ ,
कही ऐसे में उसी का साथ छुट न जाये....
कही ऐसे में उसी का साथ छुट न जाये....
बड़ा बेहतरीन रिश्ता कायम है जो दोनों के दरमियाँ ,
कही वो रिश्ता पल भर में टूट ना जाये.....
कविता...
कही वो रिश्ता पल भर में टूट ना जाये.....
कविता...
दीवानो के शहर में....
लगता है जैसे मैं सबको पहचानता हूँ,
मानो मैं यहाँ हर किसी को जानता हूँ,
आलम हैं,दीवानो सी,दीवानगी कर रहा हूँ,
जब से आया हूँ दीवानो के शहर में....
मानो मैं यहाँ हर किसी को जानता हूँ,
आलम हैं,दीवानो सी,दीवानगी कर रहा हूँ,
जब से आया हूँ दीवानो के शहर में....
सारे दीवानो का ये अल्फाज पढ़ते हैं,
सबके दिलो का ये गहरा राज पढ़ते हैं,
बन जाते है,दिल की आवाज हमेशा,
सबसे बड़े दीवाने है ये मेरी नजर में...
सबके दिलो का ये गहरा राज पढ़ते हैं,
बन जाते है,दिल की आवाज हमेशा,
सबसे बड़े दीवाने है ये मेरी नजर में...
सबके दिलो में प्यार का एहसास,
वादियों में घुली इश्क़ की मिठास,
चले दीवाने,करते मंजिल की तलाश,
फूलो की खुशबु बिखरी है इस डगर में...
वादियों में घुली इश्क़ की मिठास,
चले दीवाने,करते मंजिल की तलाश,
फूलो की खुशबु बिखरी है इस डगर में...
चैन शुकुन खोकर करते इन्तजार,
मिलेगा यार,बातों पे करके ऐतबार,
दिल की कश्ती,धड़कनों की पतवार,
उतरे हैं, इश्क़ के समंदर की लहर में...
मिलेगा यार,बातों पे करके ऐतबार,
दिल की कश्ती,धड़कनों की पतवार,
उतरे हैं, इश्क़ के समंदर की लहर में...
कविता ...
तलबगार....
तुझे पाकर फिर खो देने का डर है,
इससे अच्छा,
मैं तेरा तलबगार ही बेहतर हूँ.....
तुझे पाकर फिर खो देने का डर है,
इससे अच्छा,
मैं तेरा तलबगार ही बेहतर हूँ.....
तुझे खुशियां दिलाना मेरा बस एक मकसद है,
और अपनी ख़ुशी के लिये,
मैं तेरे गमो का हिस्सेदार बेहतर हूँ....
और अपनी ख़ुशी के लिये,
मैं तेरे गमो का हिस्सेदार बेहतर हूँ....
तू लगा भले बेवजह इल्जाम मुझपर बेवफाई का,
पर तुझसे वफ़ा निभाने,
मैं तेरा गुनहगार बेहतर हूँ.....
पर तुझसे वफ़ा निभाने,
मैं तेरा गुनहगार बेहतर हूँ.....
कभी मरहम ना लगाना मेरे जख्मो पे,
जानकर मेरा हाल,
मैं तेरे इश्क़ में बीमार बेहतर हूँ....
जानकर मेरा हाल,
मैं तेरे इश्क़ में बीमार बेहतर हूँ....
मुझे ना दवा चाहिए ना ही दुआ,
हर हकीम जानता है,
कि करके तेरा दीदार बेहतर हूँ...
हर हकीम जानता है,
कि करके तेरा दीदार बेहतर हूँ...
कविता ...
चिट्ठी...
जवान की चिट्ठी देशवाशियो के नाम ...
साथी सबके लिए खत लेकर आया है,
खुशियो की वो मोहलत लेकर आया है,
जवाब देने हैं हमें अब हर सवाल के,
आँखे नम मगर रखते हैं,सिसकियाँ सम्हाल के...
खुशियो की वो मोहलत लेकर आया है,
जवाब देने हैं हमें अब हर सवाल के,
आँखे नम मगर रखते हैं,सिसकियाँ सम्हाल के...
अपनों का ये हमें हाल चाल बताती है,
खत में अपनों की सूरत नजर आती है,
हमेशा से ही हमारा हौसला बढ़ाती हैं,
रखी है हमने, सारी चिट्ठियां सम्हाल के....
खत में अपनों की सूरत नजर आती है,
हमेशा से ही हमारा हौसला बढ़ाती हैं,
रखी है हमने, सारी चिट्ठियां सम्हाल के....
हर जगह दुश्मन पाँव पसारे मिलते हैं,
गली गली में जंग के नजारे मिलते हैं,
हम तो तैनात हैं सरहदों की सलामती को
आप रखना अपनी बस्तियां सम्हाल के
गली गली में जंग के नजारे मिलते हैं,
हम तो तैनात हैं सरहदों की सलामती को
आप रखना अपनी बस्तियां सम्हाल के
ये दुनिया मानो गहरा समुन्दर है,
कई राज छुपे हुये इसके अंदर है,
यहाँ जानलेवा भी लहरें उठती है,
रखना जिंदगी की कश्तियां सम्हाल के....
कई राज छुपे हुये इसके अंदर है,
यहाँ जानलेवा भी लहरें उठती है,
रखना जिंदगी की कश्तियां सम्हाल के....
देशहित में हर कोई अपना योगदान दे,
जरूरी नही है कि प्राणों का बलिदान दे,
वक़्त पड़े तो सबकुछ न्यौछावर कर देना,
रखना सीने में वतन परस्तियां सम्हाल के...
जरूरी नही है कि प्राणों का बलिदान दे,
वक़्त पड़े तो सबकुछ न्यौछावर कर देना,
रखना सीने में वतन परस्तियां सम्हाल के...
कितनी भी मुश्किलें आये,राहों में,
रखना अपनी मंजिल, निगाहों में ,
भले तकलीफे सहनी पड़े सह लेना,
रखना हमेशा इंसानी हस्तियां सम्हाल के ...
रखना अपनी मंजिल, निगाहों में ,
भले तकलीफे सहनी पड़े सह लेना,
रखना हमेशा इंसानी हस्तियां सम्हाल के ...
होली हमारी बेरंग,दिवाली में भले उदास,
पर आपकी खुशियां हमारे लिए है खास,
इधर हम तो जीतें है बारूदों के साये में
आप जलाना घर में फुलझड़ियां सम्हाल के....
पर आपकी खुशियां हमारे लिए है खास,
इधर हम तो जीतें है बारूदों के साये में
आप जलाना घर में फुलझड़ियां सम्हाल के....
कविता...
उनके बगैर...उनके बगैर भी हम खुश रह लेंगे अकेले ही,
कह तो दिया...
मगर ऐसा है कि हमने,
कभी अदाकारी नही की...
दिखाना चाहता था कि मैं भी गम सह सकता हूँ...
अरे कुछ देर और तड़प के ना धड़कता तो क्या था,,
मगर मेरी धड़कनो ने भी मुझसे वफादारी नही की...
अरे कुछ देर और तड़प के ना धड़कता तो क्या था,,
मगर मेरी धड़कनो ने भी मुझसे वफादारी नही की...
जब वो जाने लगे दूर मुझसे,क्यों मेरा हाल ना समझ पाये....
लगातार यूँ ही आँखो से बहते रहे भले ,
मगर मेरे आंसुओं ने भी मेरी तरफदारी नही की....
लगातार यूँ ही आँखो से बहते रहे भले ,
मगर मेरे आंसुओं ने भी मेरी तरफदारी नही की....
हिंगलाज माई ...
मुक्तक - 01सरन मा हव मै हिंगलाज माई वो
साज दे बिगड़े मोर काज दाई वो
भगत ला अब तो अपन दरस देखा जा
राख ले अब ते मोर लाज दाई वो ......
मुक्तक -02
भगतन के दुःख हरे तै बुढ़ीमाई वो
झोली मा सुख भरे तै महामाई वो
डोंगर मा तै बईठे घटारानी माँ
कतको ठन रुप धरे तै दुर्गा दाई वो.....
जिंदगी....
जिंदगी इक जंग का मैदान है
सोचना भी मत बहुत आसान है..
जिंदगी का ये सफर थम जो गया
आखिरी ठौर सबका शमशान है..
वक्त का ही खेल हैं जो हो रहा
फेर में इसके पड़ा इंसान है..
शोर शराबा कभी होता दिखे
दूसरे पल हर तरफ सुनसान है..
ना रही अब मांग कलियों की यहाँ
इधर कांटो से सजा गुलदान है..
मंहगी होती सभी चीजे यहाँ
जान लो अब आज,सस्ती जान है..
जिक्र ना हो जी रहे उस शख्स का
मौत पर होता यहाँ गुणगान है..
जिंदगी तो अब पहेली बन रही
जो इसे अब ना बुझे नादान है..
सोचना भी मत बहुत आसान है..
जिंदगी का ये सफर थम जो गया
आखिरी ठौर सबका शमशान है..
वक्त का ही खेल हैं जो हो रहा
फेर में इसके पड़ा इंसान है..
शोर शराबा कभी होता दिखे
दूसरे पल हर तरफ सुनसान है..
ना रही अब मांग कलियों की यहाँ
इधर कांटो से सजा गुलदान है..
मंहगी होती सभी चीजे यहाँ
जान लो अब आज,सस्ती जान है..
जिक्र ना हो जी रहे उस शख्स का
मौत पर होता यहाँ गुणगान है..
जिंदगी तो अब पहेली बन रही
जो इसे अब ना बुझे नादान है..
उड़ सी गई ख्वाब..
(गजल)
देखने की कभी भी लगी जो तलब,
आपकी ही गली में टहलता रहा।
आप पलकों तले यूँ समाते रहे,
नींद उड़ सी गई ख्वाब पलता रहा।
रोज ही राह तकते हुई है सुबह,
रोज ही इसतरह शाम ढलता रहा।
वक्त ने की कई बार ये साजिशें,
दे दगा वो मुझे रोज छलता रहा।
जंग अब है छिड़ी रोज ही नींद से,
रात भर करवटें मैं बदलता रहा।
आपको देखकर हो गया मोम सा,
मन्द सी आंच में मैं पिघलता रहा।
आपको यार अपना बना के खुदा,
पूजने का वही दौर चलता रहा।
आप जानें लगे जब मुझे छोड़कर,
तब खड़ा मैं वही हाथ मलता रहा।
गजल.....
आज उनका हो गया हूँ मैं बताकर चल दिए,
हक़ अभी से यार अपना वो जताकर चल दिए।
हक़ अभी से यार अपना वो जताकर चल दिए।
चोट सीने में लगी तो दर्द मीठा सा हुआ,
तीर आँखों से अभी जब वो चलाकर चल दिए।
तीर आँखों से अभी जब वो चलाकर चल दिए।
जब निहारा आइने को यूँ बड़ी ही देर तक,
लाज से वो चेहरा अपना छुपाकर चल दिए।
लाज से वो चेहरा अपना छुपाकर चल दिए।
इश्क़ उन्हें हो गया है ये पता है अब हमें,
हाँ कहा अपनी पलक वो जब झुकाकर चल दिए।
हाँ कहा अपनी पलक वो जब झुकाकर चल दिए।
वो हमारी धड़कनों में यूँ समाते ही गये,
यार दिल में आशियाना वो बनाकर चल दिए
अब तलक तो मैं किसी से भी कभी हारा नही,
इश्क की बाजी मुझे अब वो हराकर चल दिए।
यार दिल में आशियाना वो बनाकर चल दिए
अब तलक तो मैं किसी से भी कभी हारा नही,
इश्क की बाजी मुझे अब वो हराकर चल दिए।
ये घना सा अंधियारा तो मिटेगा आज से,
प्यार की ये रौशनी जो वो जलाकर चल दिए।
प्यार की ये रौशनी जो वो जलाकर चल दिए।
इश्क के गहरे समुंदर में उतारी नाव जब ,
बन लहर आये मुझे तो वो डुबाकर चल दिए।
बन लहर आये मुझे तो वो डुबाकर चल दिए।
देवेन्द्र कुमार ध्रुव....
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