बसंती होली.....
ऋतुराज बसन्त धरती पर छाया,
मानो होली का स्वागत करने आया।
लगी सजने धरा रंग-बिरंगे फूलों से,
मानो दुल्हन ने नव सृंगार किया।
मानो होली का स्वागत करने आया।
लगी सजने धरा रंग-बिरंगे फूलों से,
मानो दुल्हन ने नव सृंगार किया।
सज रही प्रकृति दुल्हन की तरह,
पलास आम्र के बौरों से।
निकल रहे नगमें मधुर तान में,
कलियों संग मिल भौरों से।
पलास आम्र के बौरों से।
निकल रहे नगमें मधुर तान में,
कलियों संग मिल भौरों से।
चल रही बसंती पुरवइय्या होकर मतवाली,
महूए के रस में डूबी निकली प्रेम की बोली।
बूढ़े जवान सब डूबे रास रंग में,
बन राधा कृष्ण मना रहे अद्भुत होली..
.............................. .....
देवनारायण यदु
पंडरीपानी लोहझर
गरियाबंद 36गढ़.....
महूए के रस में डूबी निकली प्रेम की बोली।
बूढ़े जवान सब डूबे रास रंग में,
बन राधा कृष्ण मना रहे अद्भुत होली..
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देवनारायण यदु
पंडरीपानी लोहझर
गरियाबंद 36गढ़.....
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