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Tuesday, 6 September 2016

गाँव म बिकास होवत हे

आजो घलो ए बात मोला खलत हे
गांव के संसकिरिति आँय बाँय चलत हे
लाज शरम मरयादा सबो सुतत हे
मनखे काहत हे- "मोर गांव म बिकास होवत हे"

लोग लइका के संसकार बदलगे,
छोटे बड़े ल नइ जाने ।
दाई ददा के मरयादा ल,
चिखला कस साने।
आज के बचपन कोन डाहन जावत हे
मनखे काहत हे- "मोर गांव म बिकास होवत हे"

बेटा बहू  के चाल चलन म,
परवार के नेंव खलप गे।
देख करनी दूनो परानी के,
महतारी के आतमा कलप गे।
माथा ल धरके दाई ददा ,दूनो झन रोवत हे
मनखे काहत हे- "मोर गांव म बिकास होवत हे"

इसकूल के हाल छोड़ मनखे,
जुआ सट्टा के हिसाब राखत हे।
हो जाए कोनो करा जुगाड़ कहिके,
दूसर के मुहू ल ताकत हे।
गांव के लीम चांवरा ल,जुआखाना बनावत हे
मनखे काहत हे- "मोर गांव म बिकास होवत हे"

तीज़ तिहार के ठिकाना नइ हे,
मंद मऊहा म सनाए हे।
बात बात म लड़ई होके,
मुहु कान ह चनाए हे।
एक कप पी के, तिहार ल मनावत हे
मनखे काहत हे- "मोर गांव म बिकास होवत हे"

नर नियाव के तो ठिकाना नइ हे,
सिधवा के घेरी बेरी पेसी हे।
लबरा चोरहा नियाव पागे,
काबर ओकर घर अंगरेजी सन देसी हे।
आँखि म चेंदरी बांधे,बेवस्था ह चलत हे
मनखे काहत हे- "मोर गांव म विकास होवत हे"

अइसने बिकास होही,
त ओ गांव के का होही।
जनता करय कछु नही,
मुड़ धरके सबो रोही।
आहि सुमत कहिके सबो,सपना ल संजोवत हे,
मनखे काहत हे- "मोर गांव म बिकास होवत हे"

डोकरा के होस् अउ छोकरा के जोस,
मिलके जब आगू बढ़ही।
त निसचित हे एकात कनि,
परिवरतन ल आना परही।
सबो झन सुमत म ले दे के जुरियावत हे
मनखे कहत हे- "मोर गांव म बिकास होवत हे"

रचना - विनोद यादव
पंडरीपानी लोहझर
गरियाबंद 36गढ़

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