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Tuesday, 6 September 2016

गरिबहा के रात

अंधना कस पानी, डबकत हे जिनगी,
   न जुड़ न छांव हे
दुःख के गेरवा घेंच म बँधाए
   लचारी के ठेला म पाँव हे।

महँगाई ह घलो ऊपर ले मारत हे लात,
कइसे कटही गरिबहा के रात..।

संसो के दिंयार ह सपना ल चर डारिस
     हांसी घलो धुरियागे
पीरा के घुना तन ल खा डारिस
      गरीबी घलो हरियागे।

मिलत नइ हे खाए बर दार अउ भात,
कइसे कटही गरिबहा के रात..।

जिनगी बनगे खेलौना बरोबर
  जे पाय ते खेलत हे
कलेचुप फेर ओ बिचारा
   कइसनो करके झेलत हे।

बेरा घलो ओला दू आंसू हे रोवात,
कइसे कटही गरिबहा के रात।

घर हे काकरो महल अटारी
मुड़ म हे पांच मंजिला चादर
ओकर बर तो सरग हे,
टूटे छानही खुले बादर।

ले देके दिन ल ओ हे पोहात,
कइसे कटही गरिबहा के रात..।

रचना - विनोद यादव
पंडरीपानी लोहझर
गरियाबंद 36गढ़

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