hindi

Saturday, 1 October 2016

दुरलभ हे मनखे तन

जिनगी के मोल गजब हे
   झन समझो एला गरू
मनखे तन आमा कस मीठ
   झन करव एला करू
महत ल एकर जान पावन करले मन
  दुरलभ हे मनखे तन....

सुग्घर तन ला पाके,,मोह माया म भुलागे
का करनी तैंहा करे,,दई ददा ह रूलागे
छोटे बड़े के चिनहारी नई जाने
    आदर सतकार दूरियागे
साथी संगत म चाल बिगड़गे
    आनी बानी के पीरा हरियागे
दुनियादारी छोड़ बने करले जतन
  दुरलभ हे मनखे तन....

नशा पानी म निच्चट भिनगे
  तन ला तहूँ खिया डारे
किसम किसम के रोग रई म
  आधा जिनगी सिरा डारे
का समझे ए तन के महत ल
   बिरथा दिन ला पोहा दे
नई मिलय अइसन दुबारा
   हांसी ठिठौली म बोहा दे
जिनगी सुधारे बर अब तो कर लगन
   दुरलभ हे मनखे तन....

मनखे तन हे सुग्घर फुलवारी
किसम किसम के फूल लगाले
दया धरम के गोंदा अउ संसकार के गुलाब महकाले
बेवहार म रख मिठास,छोटे बड़े के चिनहारि
जस के काम करे बर,मिले हे जनम उधारी
बैर भाव ल भुलाके पावन करले अन्तरमन
  दुरलभ हे मनखे तन....

विनोद यादव
पंडरीपानी लोहझर
गरियाबंद 36गढ़

No comments:

Post a Comment