ललित साहू जख्मी की कविताएं
"मेरी अनमोल बेटी"
पिताम्बरी ओढे़ रवि किरण
झरोखों से कुदकर आती है
चुम्बन करके ललाट पर
मेरी बिटिया को जगाती है
माधुर्य प्रेम का मधुर संगीत
कोयल नित भोर सुनाती है
आंखो से हटते ही बोझ पलकों का
किलकारी घर मे गुंज जाती है
नयनाभिराम दृश्य अलौकिक
भोभली बिटिया जब मुस्काती है
ललायित होता मन सबका
जब तुतला के ओ इठलाती है
नन्हे कदमों की खामोश आहट
वक्त को भी कुछ पल ठहराती है
कल तक पलने मे सोने वाली
आज पिछे सबको दौड़ाती है
मखमली अधर नासमझ जीव्हा
हर वस्तु का स्वाद बताती है
जिन्हें बडे भी नही काट पाते
उन्हें नाजुक मसुड़ों से चबाती है
पिति कम बुलबुले ज्यादा बनाती
वस्त्र बिछौनों को भिगाती है
लुका छुपी का खेल करती
मशखरों से खुश हो जाती है
भ्रमण करने हर पल आतुर
तितलियों सी फडफडाती है
देख उपवन झुले और पुष्प
'फुल' मेरी ललक दौंड़ जाती है
मटक चलती गिर भी जाती
'मृगनयनी' निर बहाती है
गिरती, उठती, लडखड़ाती फिर भी
अपने हौसलों से मंजिल पाती है
पुलकित करती अचंभीत अनोखी
अटखेलियों से मन हर्षाती है
कोमल हृदय निश्छल मातृमन
विचित्र करतबों से घबराती है
उगता सूरज देख मुखमण्डल
अस्त निद्रा संग हो जाती है
दिन गुजरते ही "जख्मी" को
यादों की नई सौगात मिल जाती है
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" वीरांगना बहु "
झरोखों से कुदकर आती है
चुम्बन करके ललाट पर
मेरी बिटिया को जगाती है
आंखो से हटते ही बोझ पलकों का
किलकारी घर मे गुंज जाती है
ललायित होता मन सबका
जब तुतला के ओ इठलाती है
वक्त को भी कुछ पल ठहराती है
कल तक पलने मे सोने वाली
आज पिछे सबको दौड़ाती है
हर वस्तु का स्वाद बताती है
जिन्हें बडे भी नही काट पाते
उन्हें नाजुक मसुड़ों से चबाती है
वस्त्र बिछौनों को भिगाती है
लुका छुपी का खेल करती
मशखरों से खुश हो जाती है
तितलियों सी फडफडाती है
देख उपवन झुले और पुष्प
'फुल' मेरी ललक दौंड़ जाती है
'मृगनयनी' निर बहाती है
गिरती, उठती, लडखड़ाती फिर भी
अपने हौसलों से मंजिल पाती है
अटखेलियों से मन हर्षाती है
कोमल हृदय निश्छल मातृमन
विचित्र करतबों से घबराती है
अस्त निद्रा संग हो जाती है
दिन गुजरते ही "जख्मी" को
यादों की नई सौगात मिल जाती है
पहली किरण संग उठ जाती
सबको सुला के ही वो सोती है
घर को अकेले संभालने वाली
वो वीरांगना बहु ही होती है
सबको सुला के ही वो सोती है
घर को अकेले संभालने वाली
वो वीरांगना बहु ही होती है
बच्चे की देखभाल करती
पती को चाय भी देती है
ससुर को देती ऐनक अखबार
और दुध भी बहु ही लेती है
पती को चाय भी देती है
ससुर को देती ऐनक अखबार
और दुध भी बहु ही लेती है
देवर के नखरे मस्ती सहती
ननंद की राजदार वो होती है
देवरानी की गुरु, सखी, बहिन
घर की रानी भी बहु ही होती है
ननंद की राजदार वो होती है
देवरानी की गुरु, सखी, बहिन
घर की रानी भी बहु ही होती है
पाक कला मे निपूर्ण होती
सास की सारी बातें सहती है
रहने दो मां जी मै कर लूंगी
ऐसा सिर्फ बहु ही कहती है
सास की सारी बातें सहती है
रहने दो मां जी मै कर लूंगी
ऐसा सिर्फ बहु ही कहती है
कपड़े बर्तन झाड़ू पोंछे का बोझ
बिचारी चुप-चाप ही सहती है
स्वस्थ दिखती है पर रहती नही
दर्द मे भी ठीक हूं बहु ही कहती है
बिचारी चुप-चाप ही सहती है
स्वस्थ दिखती है पर रहती नही
दर्द मे भी ठीक हूं बहु ही कहती है
होती है नौकरानी, चौकीदार
बहु घर की साहूकार भी होती है
ईश्वर का अहसास घर की लाज
सर का ताज भी बहु ही होती है
बहु घर की साहूकार भी होती है
ईश्वर का अहसास घर की लाज
सर का ताज भी बहु ही होती है
माँ, बहन, बेटी, पत्नी, प्रेमिका
और नारी ही बहु भी होती है
दो कुलों के मजबूत रिश्तों की
आधार-शीला भी बहु ही होती है
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"जख्मी धारा 370"
सोंचा था अपना मुंह ना खोलुंगा
बेमतलब 370 पर कुछ ना बोलुंगा
पंचायती राज जैसा जहां कोई विधान नही
भारत मे होकर भी भारत का संविधान नही
भारत मे होकर भी भारत का संविधान नही
न्यायालय की बात मानने भी कोई तैयार नही
स्वतंत्र अभिव्यक्ति का जहां हथियार नही
स्वतंत्र अभिव्यक्ति का जहां हथियार नही
राष्ट्र ध्वज का अपमान जहां अपराध नही
मर्यादा पुरुषोत्तम राम जहां आराध्य नही
मर्यादा पुरुषोत्तम राम जहां आराध्य नही
सुचना मांगने का भी जहां अधिकार नही
बोलो तुम इसका करते क्यों प्रतिकार नही
बोलो तुम इसका करते क्यों प्रतिकार नही
क्यों उपेक्षित, क्यों वंचित आरक्षण से
कश्मीरी अल्प संख्यक रह जाते है
कश्मीरी अल्प संख्यक रह जाते है
क्यों फकत शादी से नागरिकता
पाकिस्तानीयों को मिल जाते है
पाकिस्तानीयों को मिल जाते है
बताओ किसके हाथों तिरंगे फाडे जाते है
जाने किस द्वेश मे नर जिंदा गाडे जाते है
जाने किस द्वेश मे नर जिंदा गाडे जाते है
क्यों मातम का माहौल स्वर्ग जैसी घाटी मे
क्यों बिखरा रक्त भारत की पावन माटी मे
क्यों बिखरा रक्त भारत की पावन माटी मे
जाने किस मंशा से चाचा ने टांग अंडाई थी
कर हस्तक्षेप संविधान पर धारा 370 बनवाई थी
कर हस्तक्षेप संविधान पर धारा 370 बनवाई थी
क्यों महिलाएं मजबूर सरिया कानून मानने को
"जख्मी" सदियों से बेचैन ऐसे तथ्य जानने को
"जख्मी" सदियों से बेचैन ऐसे तथ्य जानने को
एकता , अखंडता की शत्रु यह धारा
सच्चाई यह जग मे सर्व विदित है
सच्चाई यह जग मे सर्व विदित है
फिर क्यों जीवित, फलित है यह धारा
बोलो किसका स्वार्थ इसमे निहित है
बोलो किसका स्वार्थ इसमे निहित है
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"आजादी कितनी सच्ची"
सचमुच आजाद है हम ?
या ये ढ़ोग आजादी का है
बढ़ रहा भ्रष्टाचार, पापाचार
ये इशारा हमारी बर्बादी का है
या ये ढ़ोग आजादी का है
बढ़ रहा भ्रष्टाचार, पापाचार
ये इशारा हमारी बर्बादी का है
रोटी के लिए मरते गरीब कई
कहते हो दोष बढती आबादी का है
कचरे मे पडे मिलते है अनाज
ये उंचे महलों मे हुई शादी का है
कहते हो दोष बढती आबादी का है
कचरे मे पडे मिलते है अनाज
ये उंचे महलों मे हुई शादी का है
राम के मुखौटो के पीछे
है बहरुपिया रावण खडा
लालच की महक से भरा
ये लिबास जरुर खादी का है
है बहरुपिया रावण खडा
लालच की महक से भरा
ये लिबास जरुर खादी का है
बहनो को तार-तार करता भेंडीया
देखता ख्वाब सहजादी का है
कोख मे बेटियों की होती मैतें
ये करतूत इंसानी जल्लादी का है
कोख मे बेटियों की होती मैतें
ये करतूत इंसानी जल्लादी का है
हो जाती है रौशनी चिरागों से भी
बारुद का शौक भटके जेहादी का है
भरे चौंक कुचली जाती मानवता
ये किस्सा अमीरों की उन्मादी का
बारुद का शौक भटके जेहादी का है
भरे चौंक कुचली जाती मानवता
ये किस्सा अमीरों की उन्मादी का
मैने देखा "जख्मी" आंखो से
आंसू बनकर टपकाता लहू
लाशों पर नाचता बेसुध राक्षस
हमारी ही संप्रदायिक वादी का है
आंसू बनकर टपकाता लहू
लाशों पर नाचता बेसुध राक्षस
हमारी ही संप्रदायिक वादी का है
कांक्रीटों का घनघोर जंगल
उद्घोषक हमारी नाँदी का है
जरा सुनो बगावत की सरसराहट
ये शोर सिसकियों की आंधी का है
उद्घोषक हमारी नाँदी का है
जरा सुनो बगावत की सरसराहट
ये शोर सिसकियों की आंधी का है
बहुत सुंदर प्रयास है मित्र। शुभकामनाओं सहित ।
ReplyDeleteबधाई हो