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Monday, 27 June 2016

"मोर बैरी होगे असाढ़"

ओकर संग चार दिन हरियाये रेहेंव
मानो सुख के बसन्त ल पाये रेहेंव
ओहा फूल कस झर के दुरिहा होगे
अब होगेव पतझड़ के ठुड़गा झाड़
मोर बर तो बैरी होगे ऐसो के असाढ़

मैहर मोर हाल बतावव कइसे
मोर मयारु चल देहे अपन मइके
एक-एक दिन लागे साल भर जइसे
मोर ऊपर टूट गेहे दुःख के पहाड़
मोर बर तो बैरी होगे ऐसो के असाढ़

बिजली चमक के ओखर सुरता देवावत हे
गरजथे बादर लागथे उही गोठियावत हे
पानी के बूँद परे ले मोर करेजा बेधावत हे
मैहर डुबे हावव आये हे सुरता के बाढ़
मोर बर तो बैरी होगे ऐसो के असाढ़

अब ओकरे डाहर सुध लमाये रहिथंव
अइसने अपन आप ला भुलाये रहिथंव
सब कोती सुन्ना-सुन्ना लागत हे अब तो
ओकर बिगन जिनगी लागत हे उजाड़
मोर बर तो बैरी होगे ऐसो के असाढ़

मोला अभी काहीच नई सुहावत हे
भात बासी घलो नई खवावत हे
घर मा ओकर लहुट के आवत ले
अइसे लागथे सुखा जहूँ मेहा ठाढ़
मोर बर तो बैरी होगे ऐसो के असाढ़
                               रचना
                  देवेन्द्र कुमार ध्रुव (डीआर)
                       फुटहा करम बेलर

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