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Sunday, 26 June 2016

कैसे कहूं

यकीं को वहम
हकीकत को ख्वाब कैसे कहूं
बूझती हुई शमा हूं
खुद को च़िराग कैसे कहूं
मिलता है हर तरफ
पतन का ही खिताब
इन खिताबो को मैं
बहारे-सुराग कैसे कहूं
जश्ने-गम को मनाने
पीता हूं मैं श़राब
ये मौत का सामान सहीं
मगर मैं खराब कैसे कहूं
जिधर निगाह फेरूं
धुआं धुआं सा ही लगे
ये तो गर्दे-सफ़र है
गुबारे-गुलाल कैसे कहूं
यकीं को वहम...

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मेरी मघुशाला

बाँह मे है साकी की चाहत
अधरों पर हो मधु की प्याला
जाता हूँ बस इसी आस में
मरघट पीने  पावन हाला
पर है रहता मरघट सूना
गलियाँ सूनी जमघट सूना
रहा फिरता दिनभर यूँ ही
बिन पीये घर आता हूँ
यह ही मेरी नित्य की चर्या
यह ही मेरी मधुशाला 
  
रचनाकार - ललित वर्मा
ग्राम - छुरा
जिला- गरियाबंद (छ.ग.)

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