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Sunday, 26 June 2016

बरखा की पहली बूंद

तीव्र वेग समीर बह चली
रजकण गर्दिश चुमने चली

तरु की शाखा हिलने लगी
कुछ तो साथ छोड़ने लगी

मेघ काले मंडराने लगे
रविकिरण धुंधलाने लगे

विहंग कोटरों में दुबक गये
मनुज कोठरी मे छुपक गये

तड़ित की वैभव चमकने लगी
आकाश से शंख गरजने लगी

धीरे से छन-छन की आवाज कर
बरखा की पहली बुंद
         आई मेरे द्वार पर ...
         आई मेरे द्वार पर.....

रचनाकार - हीरालाल गुरुजी''समय"
ग्राम- छुरा  जिला-गरियाबंद

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