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Saturday, 1 October 2016

आगे पितर पाख

आगे पितर पाख रे संगी,
पितर देंवता ल परघाबो।
मुहाटी म चऊक पुर के,
अपन पुरखा ल बलाबो।

मुंदरहा ले नदिया जाके,
पितर डुबकी हमन लगाबो।
तिल,जौं,फूल,दुब धर के,
उहें अंजरी म जल चघाबो।

नई करन ये पाख नवा बुता,
जम्मों ल जुन्नहा म पहाबो।
जे पुरखा बिते रीहिस तिकर,
पितर पाख म सोक मनाबो।

एक काड़ी मुखारी,पानी,
अऊ पिढ़ा,लोटा ल मढाबो।
फूल पान गुलाल चघा के,
सरद्धा में माथ ल नवाबो।

खीर,पुरी अऊ बरा रांधबो,
बरी बर उरीद दार बिसाबो।
दार,भात,साग,रोटी के भोग,
तोरई पान म करके लगाबो।

गाय,कौंआ,करिया कुकुर ल,
कलेवा संग जेवन कराबो।
पुरखा जईसन खाये तईसन,
खाबो अऊ सबला खवाबो।

जब जे पुरखा के तिथि आही,
सेवा करके आसिस ल पाबो।
सगा सोदर जम्मों ल नेऊत के,
पुरखा पसंद के जेवन कराबो।

आखिर के दिन, बिदा करके,
पुरखा सुरता म आंसू बोहाबो।
पितर पाख के नेघ ल करके,
पुरखा मन के जीव ल हीताबो।

ललित साहू "जख्मी" छुरा
जिला - गरियाबंद (छ.ग.)

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