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Saturday, 1 October 2016

मातृभाषा

हम ही जिम्मेदार होंगे अपनी सभ्यता के पतन का....
सम्हलना होगा,समय है ये अपनी संस्कृति के जतन का ....
मातृभाषा ही है,जो हम सबको एक सूत्र में पिरोती है.....
मगर अब ऐसा बदला हाल देखकर चुभता सीने में शूल है ....
अपनी ही मातृभाषा को महत्व ना देना हमारी सबसे बड़ी भूल है....

आज पश्चिमी सभ्यता,हमारे देश में हावी होकर बढ़ रही है .....
हित अहित से अनजान,इसके फेर में हमारी भावी पीढ़ी पड़ रही है ....
समझना और समझाना होगा,सबको मातृभाषा का महत्व.....
हट जानी चाहिए सबकी मानसिकता में जमी धुल है .....
अपनी ही मातृभाषा को महत्व ना देना हमारी सबसे बड़ी भूल है....

हमारी मातृभाषा हिन्दी तो,हिन्दुस्तान की जान है .....
हम भारत वालो की तो जग में,इसी से ही पहचान है....
कानो में जैसे मधुरस घोले,ऐसी इसकी मिठास है.....
सबके मन की बगिया महकाने वाला ये सुन्दर फूल है .....
अपनी ही मातृभाषा को महत्व ना देना हमारी सबसे बड़ी भूल है....

हर कोई आज आधुनिकता का राग अलाप रहा है ....
ऐसे ही हम गर्त समाये जा रहे है कोई नही भांप रहा है ....
सब बदलाव का ढोंग कर,नई रीत अपनाने में लगे है....
पुराने रिवाज बिसरा दिए गये,समय भी बड़ा प्रतिकूल है....
अपनी ही मातृभाषा को महत्व ना देना हमारी सबसे बड़ी भूल है....
                      रचना
           देवेन्द्र कुमार ध्रुव (डी आर)
                 फुटहा करम बेलर
             जिला गरियाबंद (छ. ग.)

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