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Saturday, 1 October 2016

मैं और क्या कहूं ?

        जानते हो जहर है, फिर भी,
        नशे के तुम आदी हो गए।
        खोखली बातों मे उलझकर,
        जवानी में उन्मादी हो गए।
आचरण अपना गिराकर,
तुम धन तो बहुत कमाते रहे।
ज्ञान और पद का रौब हमेशा,
अपनो को ही दिखाते रहे।
          गुरु को, गुरु ना समझा,
          माँ-बाप को भी दुत्कारते रहे।
          गौ माता को तुमने तरसाया,
          और कुत्ते को पुचकारते रहे।
तुम्हारी इस हरकत पर
बताओ.! मैं और क्या कहूं ?
          जब तुम खुद ही नही चाहते,
          कि मैं जिन्दगी की बात सिखूं।
तो भला मुझे क्या पड़ी है,
जो मैं तुम पर कविता लिखूं।
तुम, सुहाग की निशानी,
सिंदूर को भी छुपाने लगी।
औरत का सबसे मंहगा गहना,
शर्म को भी भुलाने लगी।
         आँचल सर पे रखने से भी,
         अब तुम कतराने लगी।
         किसी असहाय बेवा की तरह,
         बालों को बिखराने लगी।
मम्मी, मॉम मन को भाया,
माँ शब्द से हिचकिचाने लगी।
भारतीयता तुम्हें चुभती है,
और अंग्रेजीयत पर ईतराने लगी।
          तुम्हारी इस हरकत पर,
          बताओ.! मैं और क्या कहूं ?
जब तुम खुद ही नही चाहती,
कि मैं पावन पुनीता दिखूं।
          तो भला मुझे क्या पड़ी है,
          जो मैं तुम पर कविता लिखूं।
अपराधों के बने मूकदर्शक,
शोषण के तमाशबीन हो गयेे।
संबंधों पर किया आघात,
दौलत के आधीन हो गये।
         सच बोलना हो मना जहां,
         वहां मैं अपनी व्यथा कैसे कहूं।
         आलोचनाओं से डरकर मैं,
         चूप भी भला कैसे रहूं।
घुट-घुट कर मरने से अच्छा है,
मैं बेखौफ ही जीना सिखूं।
मेरी भी जिन्दगी सामने खड़ी है,
सोंचता हूं, अब उसी पर कविता लिखूं।

रचना - ललित साहू "जख्मी" छुरा
जिला- गरियाबंद (छ.ग.)

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