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Saturday, 1 October 2016

बेटी

ददा के संसो बेटी ह करथे
अपन लइका संही जतनथे।
होवत बिहनिया,बडे फजर ले
मयारु दाई अस चहा अमरथे।।

नहाये खातिर पानी तिपोथे
जरय झन कइके छुथे-टमरथे।
बेरा नइ चूके,जेवन बनाथे
महतारी कस बइठे मोला जेंवाथे।।

मोर थोरिक रिस ल
अडबड डर्राथे।
चुप हो जा बाबू!
कहिके मनाथे।।

ओकर आँसू
सरी रिस ल बुताथे
का कर डारेंव?
मन बढ पछताथे।।

नान्हे बेटी मोर
अब होगे सजोर!
सगा अगोरत हंव
निहारत हंव खोर!!

कइसे करहूँ
सब किस्मत के लेखी।
पर के हो जाही
मोर मयारू बेटी!

कोने ह अब दसना दसाही
दवई-बूटी ल बेरा म खवाही?
एसो के जाड,जब लाहो लिही
सुन्ना गोरसी ल कोन सिपचाही?

एक नजर देखे बर
आँखी तरसही!
तोर सुरता म बेटी
मोर जीव ह कलपही!
मोर जीव ह कलपही!!!!

रीझे यादव
टेंगनाबासा(छुरा)

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