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Saturday, 1 October 2016

वाह रे मंहगाई

सबो जिनिस के बाढ़गे रेट,
का करबे का नी करबे होगे मटियामेट|
पउर के करजा छुटाए नई हे,
तगादा भेजथे भारी सेट।

करजा म मनखे ल अउ कतका सोवाबे
वा रे मंहगाई अउ कतका रोवाबे।
धान ले जादा बीमारी मनखे म लगे हे,
सेट साहूकार मन जनता ल ठगे हे।

बइठके गद्दी म ओ करत हे जनता के खेदा,
मारत हे गरीब के पेट म ओ लबेदा।
अउ मनखे ल ते कतका भोगवाबे
वा रे मंहगाई अउ कतका रोवाबे।

मंहगाई के मार म मनखे ह अइलाए हे,
सरकार के रन्निति म कइसे घइलाए हे।
सुखावत बबा ल पूछ पारेव काहे तोर चक्कर,
कथे बबा महीना ले नई पीएहों चाहा भाव बढ़गेहे सक्कर।
मंहगाई के डोंगा ल अउ कतका खोवाबे
वारे मंहगाई अउ कतका रोवाबे।

फोकट म बाटथस किलो-किलो नून,
थोरकून मोर बात ल तो सून।
देनच हे त फोकट म दे दार सक्कर तेल,
बदल दे तेंहा अब मंहगाई के खेल।
कब तैं जनता के आंसू ल पोछाबे,
वारे मंहगाई अउ कतका रोवाबे।

विनोद यादव
पंडरीपानी लोहझर
गरियाबंद 36गढ़

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