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Saturday, 1 October 2016

नवरात्रि मनाबो

कुँवार के सुग्घर महीना आगे,
   सबोके मन कइसे हरियागे।
36गढ़ के माटी पावन होगे,
   माता के दरश मनभावन होगे।

जुरमिल के चलो जसगीत ल गाबो।
चल संगी नवरात्रि मनाबो।
नव दिन नव रात ले मइय्या,
    दरश ल सबला देथे।

भगत के लाज रखे बर दाई,
   दुःख पीरा ल हरथे।
आसथा बिसवास के जोत ल जगाबो
चल संगी नवरात्रि मनाबो।

झांझ मंजीरा मांदर बाजे,
   गली गांव पारा।
जुरमिल सबो लगावत हे,
   माता के जयकारा।

चलो संगी मन के मनौती ल पाबो
चल संगी नवरात्रि मनाबो।
नव दिन के हरे ए सुग्घर तिहार,
मातारानी के हाबे जेमे मया दुलार।

जग के पाप हरे बर दाई,
आथे होके बघवा म सवार |
संझा बिहनिया माँ के आरती ल गाबो।
चल संगी नवरात्रि मनाबो।

रचना- विनोद यादव
पंडरीपानी लोहझर (छुरा)

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