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Wednesday, 31 August 2016

अवईया हावे तीजा-पोरा

उत्ता - धुर्रा चलावत हावे, कुम्हार अपन चाक,
बड़ जल्दी अवईया हावे, तीजा-पोरा के पाख।

कन्हार के माटी ल, बड़ सुग्घर सिरजावत हे,
रंग - बिरंगी नाद - बईला मनमाने बनावत हे।

पको डरे हे तिकर मन के, उघारत हे आंखी,
गुलाबी, लाल, सोनहा रंग ल पोतत हे काकी।

नानुक चुल्हा, नानुक बटलोही झारा बनाय हे,
बाल्टी, कढ़ई, तावा मे डंठल घलो धराय हे।

लईका रिझाये बर, गैस सिलेंडर घलो बनाय हे,
नाद-बईला के चक्का ल, रोंठ - रोंठ बनाय हे।

बईला गाड़ी म भर के, बेचे बर हाट जावत हे,
लेवईया आवत नई हे, बपूरा बईठे उंघावत हे।

तिहार ल दिन हे कहिके, कुम्हार आस लगाये हे,
फेर हमर संस्कृति बर परदेसिया घात लगाये हे।

अपन ल भुला के, पश्चिमी संस्कृति अपनावत हे,
सबो तिहार ल घर बईठे, मोबाइल म मनावत हे।

खेत-खार, तरिया-ड़बरा मसीन म खनावत हे,
गांव-गांव ले सिरतोन म, बईला हा नंदावत हे।

पलासटिक खिलौना हाट मे, आगे आनी-बानी,
कुम्हार के परवार बर कहां ले आये दाना-पानी।

ललित साहू "जख्मी"  छुरा
जिला - गरियाबंद (छ.ग.)

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