जिन्दगी की कश्ती
कभी पेट में तो कभी झोपड़ियो में
आग ही लगती है गरीबो की बस्ती में
आग ही लगती है गरीबो की बस्ती में
लगता है डोर सचमुच गैरो के हाथ है
तभी हारकर कोई लटकता रस्सी में
तभी हारकर कोई लटकता रस्सी में
हमेशा बीच भंवर में डूब ही जाती है
सुराख इतने है जिंदगी की कश्ती में
सुराख इतने है जिंदगी की कश्ती में
कोई अपनी जरुरते भी नही जुटा पाता है
कोई मगरूर है अपने पैसो की शक्ति में
कोई मगरूर है अपने पैसो की शक्ति में
मतलबी दुनिया के राज बड़े गहरे है
दिखावा है जो डूबे कोई भाव भक्ति में
दिखावा है जो डूबे कोई भाव भक्ति में
अक्सर कीचड़ उछाले जाते है औरो पर
ताकि दाग ना लगे बड़े लोगो की हस्ती में
ताकि दाग ना लगे बड़े लोगो की हस्ती में
कही लोग भूखे मर जाते है आये दिन
कही खाना बर्बाद होता है मौज मस्ती में
आँखों से नींद भी रूठ गई है इनकी
घूमते है आवारा जैसे निकले हो गश्ती में]
घूमते है आवारा जैसे निकले हो गश्ती में]
कई वादे करते है गरीबो से ताज के लिये
भूल जाते है सब जब चढ़ जाये तख्ती में
भूल जाते है सब जब चढ़ जाये तख्ती में
सब दिखता है पर नजरअंदाज करना है
तो ढँक लो ये आँखे बेईमानी की पट्टी में
तो ढँक लो ये आँखे बेईमानी की पट्टी में
रचना देवेन्द्र कुमार ध्रुव (डीआर)
फुटहा करम बेलर
जिला गरियाबंद (छ ग)
जिला गरियाबंद (छ ग)
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