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Sunday, 21 August 2016

जिन्दगी की कश्ती

कभी पेट में तो कभी झोपड़ियो में
आग ही लगती है गरीबो की बस्ती में

लगता है डोर सचमुच गैरो के हाथ है
तभी हारकर कोई लटकता रस्सी में

हमेशा बीच भंवर में डूब ही जाती है
सुराख इतने है जिंदगी की कश्ती में

कोई अपनी जरुरते भी नही जुटा पाता है
कोई मगरूर है अपने पैसो की शक्ति में 

मतलबी दुनिया के राज बड़े गहरे है
दिखावा है जो डूबे कोई भाव भक्ति में

अक्सर कीचड़ उछाले जाते है औरो पर
ताकि दाग ना लगे बड़े लोगो की हस्ती में 

कही लोग भूखे मर जाते है आये दिन
कही खाना बर्बाद होता है मौज मस्ती में

आँखों से नींद भी रूठ गई है इनकी
घूमते है आवारा जैसे निकले हो गश्ती में]

कई वादे करते है गरीबो से ताज के लिये
भूल जाते है सब जब चढ़ जाये तख्ती में

सब दिखता है पर नजरअंदाज करना है
तो ढँक लो ये आँखे बेईमानी की पट्टी में

 रचना  देवेन्द्र कुमार ध्रुव (डीआर)
           फुटहा करम बेलर
        जिला गरियाबंद (छ ग)

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