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Wednesday, 31 August 2016

और भी हैं दाना मांझी

आज उसकी व्यथा देखकर,
अचानक ही सब गांधी हो गये।
बन के मांझी के शुभचिन्तक,
संवेदनाओं की आंधी हो गये।
     मानवता का यह उफनता जोश,
     मोबाईल तक ही थम जायेगा।
     दौंड़ता रक्त, आंखों का आंखों में,
     दो दिन में वापस जम जायेगा।
क्यों समझते हो, मांझी एक है,
मांझीयों की तो लंबी कतार है।
इंसानियत पर ऐसे किस्सों की,
अनगिनत सिसकियां उधार है।
     जो बने रहे, तमाशबीन परिदर्शक,
     बेशक उन सबको ही धिक्कार है।
     पर झुठा आंसू बहाने वाला भी,
     निहायत ही दोगला है, मक्कार है।
हर रोज कोई असहाय मांझी,
अपनी संगिनी का लाश ढोता है।
बताओ सोशल मिडिया वालों,
उसके साथ खड़ा, कौन होता है?
     तुम ही तो इंतजार करते रहते हो,
     किसी की आबरु के लूट जाने का।
     अब क्यों सहानुभूति दिखाते हो,
     किसी के सांसों के रुक जाने का।
बिना अॉक्सीजन के अस्पताल,
क्या तुम्हें, कभी नजर नही आते?
कुछ लाशें, यूं ही सड़ जाती है,
कोई उन्हें ले जाने भी नही आते।
     महज मोबाईल की सोहबत से,
     किसी मांझी का भला नही होगा।
     यकीन नही, तो इतिहास देख लो,
     बातों से ही, मुसीबत टला नही होगा।

ललित साहू "जख्मी" छुरा
जिला- गरियाबंद (छ.ग.)

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