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Wednesday, 31 August 2016

बरखा की पहली बूंद

तीव्र वेग समीर बह चली,
रजकण गर्दिश चुमने चली।

तरु की शाखा हिलने लगी,
कुछ तो साथ छोड़ने लगी।

मेघ काले मंडराने लगे,
रवि किरण धुंधलाने लगे।

विहंग कोठरों में दुबक गये,
मनुज कोठरी मे छुपक गये।

तड़ित की वैभव चमक उठी,
आकाशवाणी की शंखनाद उठी।

धीरे से छन-छन की आवाज कर,
बरखा की पहली बुंद,
         आई मेरे द्वार पर ।
         आई मेरे द्वार पर।

हीरालाल गुरुजी ''समय"
       छुरा-गरियाबंद

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