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Saturday, 27 August 2016

इंहे सरग हे

इंहे सरग हे$$$ इंहे नरक हे$$
इंहे करम धरम हे.....
झांकव अपन मन म
मिले काबर जीवन हे
इंहे जीयन अऊ मरन$$$..

बड़ दुख म $$$...२ ये काया पायेन
माया म भरमायेन
हीरा जइसन काया हमन के.....२
प्रभु चरनन म अरपन........
भाव भक्ति म होके मगन.....
इंहे जीयन अऊ मरन$$$....

लोभ मोह म $$$...२ रहिके सब झन
बिरथा जनम गवांयेन
आही बुढ़ापा कर पछतावा $$$...२
करके सेवा भजन ....
प्रभु के आयेन शरन$$....
इंहे जीयन अऊ मरन......२

प्रभु के बिना $$..२इक हिलय न पत्ता
और चलय न सत्ता
भवसागर से तर जा मनवा....२
बनके राम किसन ...
अंधरी अंधरा के बन जा सरवन....
इंहे जीयन अऊ मरन.....

इंहे सरग हे$$$ इंहे नरक हे$$
इंहे करम धरम हे.....
झांकव अपन मन म
मिले काबर जीवन हे
इंहे जीयन अऊ मरन$$$..
इंहे जीयन अऊ मरन ।

रचना:-- दीनदयाल टंडन
शास .उ. मा. वि. पीपरछेड़ी

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