मैं मुर्दा हूं
मैं मुर्दा हूं
तुम्हें जीना सीखा रहा हूं
तिमिर रंध्र गलियों में कब से
अनहद गीत गा रहा हूं
मैं मुर्दा हूं तुम्हें जीना सीखा रहा हूं।
तुम्हें जीना सीखा रहा हूं
तिमिर रंध्र गलियों में कब से
अनहद गीत गा रहा हूं
मैं मुर्दा हूं तुम्हें जीना सीखा रहा हूं।
अरे! भौतिकता में मस्त मानवों
अत्याधुनिक दानवों
तुम सरपट भागे जा रहे हो
तुम्हें पता है? तुम कहां जा रहे हो?
तनिक रूको, मुझे देखो
मैं तुझे तेरा भविष्य दिखा रहा हूं
मैं मुर्दा हूं, तुम्हें जीना सीखा रहा हूं।
अत्याधुनिक दानवों
तुम सरपट भागे जा रहे हो
तुम्हें पता है? तुम कहां जा रहे हो?
तनिक रूको, मुझे देखो
मैं तुझे तेरा भविष्य दिखा रहा हूं
मैं मुर्दा हूं, तुम्हें जीना सीखा रहा हूं।
अरे! धर्म की गठरी धोने वालों
धार्मिकता की आबरू लूटनें वालों
तुम व्यर्थ गाल बजा रहे हो
तुम्हें पता है,तुम क्या कह रहे हो
तनिक रूको, मुझे सुनों
मैं प्रणव का धुन सुना रहा हूं
मैं मुर्दा हूं, तुम्हें जीना सीखा रहा हूं।
धार्मिकता की आबरू लूटनें वालों
तुम व्यर्थ गाल बजा रहे हो
तुम्हें पता है,तुम क्या कह रहे हो
तनिक रूको, मुझे सुनों
मैं प्रणव का धुन सुना रहा हूं
मैं मुर्दा हूं, तुम्हें जीना सीखा रहा हूं।
अरे! खुदा की चाह में घर छोडनें वालों
सृष्टि का पथ मोडनें वालों
तुम जीवन के विरूद्ध जा रहे हो
तु्म्हें पता है,तुम क्या कर रहे हो
तनिक रूको,सेवा करो
गृहस्थी कूंभ है,तुम्हें यह बतला रहा हूं
मैं मुर्दा हूं,तम्हें जीना सीखा रहा हूं ।
सृष्टि का पथ मोडनें वालों
तुम जीवन के विरूद्ध जा रहे हो
तु्म्हें पता है,तुम क्या कर रहे हो
तनिक रूको,सेवा करो
गृहस्थी कूंभ है,तुम्हें यह बतला रहा हूं
मैं मुर्दा हूं,तम्हें जीना सीखा रहा हूं ।
रचना:- ललित वर्मा "अंतर्जश्न" छुरा
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