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Saturday, 27 August 2016

मैं छत्तीसगढ़िया किसान

मैं छत्तीसगढ़िया किसान
मिहनत मोर संगी मितान.....2
           ये माटी मोर माता......2
           आकाश पिता समान..
मैं छत्तीसगढ़िया किसान...........

1.  फोर के पथरा..ताप के भोंभरा
     भुंईया ल कोन सरग बनाही.....2
      ये धरती के मैं हौं सिपाही
      मोर सिवा अन्न कोन उपजाही...२
      घाम पियास अऊ बारो मास
      खेत म जी परान......
      मैं छत्तीसगढ़िया किसान.....

2.  बिजरी चमके बादर बरसे
      चारो डाहर होगे हरियाली....२
      जतके पानी ओतके पसीना
      तब आथे जी धान म बाली ....२
      बासी चटनी मैं ह खवईया
      ये ही हे मोर पहिचान......
      मैं छत्तीसगढ़िया किसान......

3.  घर कुरिया हे खपरा छानी
     चारो कोयि टपकय पानी.....२
      दुख दरद बर मैं संगवारी
      भाखा निरमल मंदरस बानी....२
     नवा रद्दा नवां अंजोर
     आगे नवा बिहान.....

     मैं छत्तीसगढ़िया किसान
     मिहनत मोर संगी मितान

रचना:-- दीनदयाल टंडन
शास .उ. मा. वि. पीपरछेड़ी

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