क्या लिखूँ
सोचता हूँ क्या लिखूँ ?
किस पर लिखूँ ?
गर्त में जाते पथभ्रष्ट पर,
दिशाहीन समाज से,
क्या प्रेरणा लूँ ?क्या सीखूँ ?
किस पर लिखूँ ?
गर्त में जाते पथभ्रष्ट पर,
दिशाहीन समाज से,
क्या प्रेरणा लूँ ?क्या सीखूँ ?
स्वार्थ का अजगर,
निगल रहा सब कुछ।
शोषण का जोंक खून चूस रहा,
दृष्टिहीन भ्रमित विनाश को आतुर।
बस भेड़ चाल अपना रहा
हिस्सा हूं मैं भी इसी भीड़ का,
फिर सबसे जुदा कैसे दिखूँ !
सोंचता हूँ..............
निगल रहा सब कुछ।
शोषण का जोंक खून चूस रहा,
दृष्टिहीन भ्रमित विनाश को आतुर।
बस भेड़ चाल अपना रहा
हिस्सा हूं मैं भी इसी भीड़ का,
फिर सबसे जुदा कैसे दिखूँ !
सोंचता हूँ..............
नफरत का लावा धधक रहा,
सहमी सी घबराई सी मानवता।
सिसक-सिसक कर रो रही,
प्रेम के नाम पर मैं क्यों मिटूँ।
सोंचता हूं.................
सहमी सी घबराई सी मानवता।
सिसक-सिसक कर रो रही,
प्रेम के नाम पर मैं क्यों मिटूँ।
सोंचता हूं.................
करुंगा उपभोग हर एक पल का,
जीवन का रस लूंगा क्षणिक,
नस्वर जीवन का,
वर्तमान है बस मेरा।
खुद के लिए जिऊँ,
अनिश्चित भविष्य के लिए,
जहर का प्याला भला मैं क्यों पीऊँ ?
जीवन का रस लूंगा क्षणिक,
नस्वर जीवन का,
वर्तमान है बस मेरा।
खुद के लिए जिऊँ,
अनिश्चित भविष्य के लिए,
जहर का प्याला भला मैं क्यों पीऊँ ?
सोचता हूँ ठहर जाऊँ,
बस अब ना लिखूँ, ना लिखूँ ।
रचना - रीझे यादव ग्राम - टेंगनाबासा
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