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Sunday, 21 August 2016

 ऐसे ही सावन में 

सरसराती पवन के झोंके
देखो तेज बारिश की बौछार,
रिमझिम की मदमस्त छीटें
करती हरियाली का मनुहार।

मन मयूरा नाचे मेरा ऐसे ही सावन मे,
बरस रे बदरा बरस मेरे घर के आंगन मे ।।

बेलपत्र, धतुरा, दुध और दही
लिये खड़े सब मंदिर के द्वार,
बोल - बम का जाप निरंतर
करते भोले के भगत हजार ।

जपुं मैं भी भोले को ऐसे ही सावन मे,
बरस रे बदरा बरस मेरे घर के आंगन मे ।।

झूले पर झूलती सखी-सहेली
हर्षित मन हो उठता अपार,
निश्छल स्वच्छंद उनकी हंसी
संग खिलखिला उठता गुलबहार ।

खुशियां मैं भी पा लूं ऐसे ही सावन मे,
बरस रे बदरा बरस मेरे घर के आंगन में ।।

खल-खल कर बौराती नदिया
तृप्त धरती, बावले तरण ताल,
नवसृजन का ये पावन महीना
देखो बेल लताओं के बुने जाल ।

मैं फिर से जी उठा, ऐसे ही सावन में,
बरस रे बदरा बरस मेरे घर के आंगन में ।।

ललित साहू "जख्मी"  छुरा
जिला-गरियाबंद (छ.ग.)

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