hindi

Sunday, 21 August 2016

बेटी के सिक्छा अऊ संस्कार


मानुस जनम धरे के करजा उतार लव
बेटी ल सुघ्घर सिक्छा अउ संस्कार दव।

बेटी ह बने पढही,भविस्य ल सुघ्घर गढही,
पुरखा रीत-नेत पाही,धरम अउ नेंग निभाही।
सिरजनकर्ता ल सिरजन के हथियार दव,
बेटी ल सुघ्घर सिक्छा अउ संस्कार दव।

बेटी घर के मान,मर्यादा-सम्मान
दाई के हरे करेजा,ददा के नाक-कान
समता-ममता के गोदी म मया दुलार दव,
बेटी ल सुघ्घर सिक्छा अउ संस्कार दव।

बेटी मईके के डोंहडी,पिया के घर के फूल
दुनो बगिया म महके,अईसन सींच मत भूल
सीख अउ सदगुन के सोला सिंगार दव,
बेटी ल सुघ्घर सिक्छा अउ संस्कार दव।

बेटी सुख के सागर,सेवा करे उमर भर
गृहस्थी के एकठन मुडका,घर थामे रहिथे 
सुघ्घर  सिक्छा के छानही संस्कृति के मिंयार दव,
बेटी ल सुघ्घर सिक्छा अउ संस्कार दव।

मानुस जनम धरे के करजा उतार लव
बैटी ल सुघ्घर सिक्छा अउ संस्कार दव।

रचना:-ललित वर्मा "अंतर्जश्न" छुरा

No comments:

Post a Comment