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Monday, 25 July 2016

सिंगार ..


का मैं सिंगार लिखव
  का करव बखान ओ ...२

जब ले देखेव तोला बही ...
   होगेंव हलाकान ओ ...जब 

तोर रूप म गोई ,भगवान देखे हौ,
  मान झीन मान ,मोर परान देखे हौ।।

हिरदे के पंछी ,कुहुक मारे मन ला
  नैना के आगी ,जराए मोर तन ला ..
मुस्की ह तोर मोर ,दुःख ल मेटाये
  रेंगना ह तोर, मोर मन ल लुभाये ..२
अंतस म तोर ,पहिचान देखे हौ ..मान

सुरता हा आठो पहर ,मन ल मताथे
तोर बोली बैना ह हिरदे जुड़ाथे ..२
आंखी के काजर ले बदरी लजाथे
तोर होंठ देख बही कमल मुसकाथे ..२
तोर बर मोर मन मा सनमान देखे हौ..
           मान झीन ...

गोई तोर बेनी के गजरा बन जातेव
माथे के टिकली बन ,महू इतरातेव.२
हार बन जातेव में तोर गर के संगी
गीत बन जातेव में तोर स्वर के संगी.
गीत म मोर तोरेच मुसकान देखे हौ..२

मान झीन मान ,मोर परान देखे हौ।।

गीतकार - धनराज साहू , बागबाहरा

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