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Monday, 25 July 2016

क्या ये वही आजादी है

अपने जेबों मे नोटे रख कर
कहते आदर्श हमारे गांधी हैं
अब वही हांथ वहशी हो गए
जिन हांथों पर राखी बांधी है

जैसा बापू ने बूना था
क्या ये वैसा ही खादी है
जिसकी खातिर वीर शहीद हुए
क्या ये वही आजादी है

अपने बच्चों का लहू देख
हर रोज तिरंगा रोता है
कायर आतंकी करतूतों से
मेरा भारत शर्मिंदा होता है

तलवे अमीरों के चाट रहे
क्या आत्मा जिल्लत की आदी है
जिसकी खातिर टूकड़ों मे बांटे
क्या ये वही आजादी है

सरहद की लड़ाई ने
मानवता का शीश झुकाया है
जान लूटा कर जवानों ने
माँ का कर्ज चुकाया है

लालच से सनी राजनीति
बारुद घूली सारी वादी है
जिस पर अमन टिक सके
क्या ये वही आजादी है ?

दंगे लूट बालात्कार की
रोज-रोज कहानी होती है
आधुनिकता की चकाचौंध मे
गुमराह जवानी होती है

जिसने खुद को दो भाग किया
आज ओ माँ सिसक कर रोती है
जिसमें बहन बेटियों की लाज रह सके
क्या ये वही आजादी है

ललित साहू "जख्मी" ग्राम - छुरा
जिला - गरियाबंद ( छ.ग.)

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