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Thursday, 7 July 2016

"कइसे ममहाही नेकी के फूल"

कइसे ममहाही नेकी के फूल अइलाये हे
धरम करम के मीठ फर ल कीरा खाये हे
सबला छईहाँ आसरा देवैय्या पाना झरगे
तभे तो सुन्ता के अतेक मजबूत खांधा सरगे 
मया पिरीत छोड़ सब अपन मा भुलाये हे
तभे तो आज मानवता के रूख हा मरगे

अब कोनो काज नई करय परहित बर
दूसरा के लहू बोहाथे अपन हित बर
खईहा खनथे मनखे अपने मीत बर
बेईमानी अब्बड़े करथे अपन जीत बर
का का उदीम करिन सुख ल पाये बर
तभो ले मनखे के हिस्सा म दुःख हा परगे

कभु कोन्हों गुरतुर मीठ बोली नई जानिन
मीत मितानी कभु हांसी ठिठोली नई जानिन
सियान मनके कभु कोन्हों बात नई मानिन
काकरो करा अपन मुड़ी नवाये नई जानिन
जब निकलथे गोठ दूसर बर सरापा निकलथे
दूसरा ला बखाने मा अपने मुँह हा जरगे

बेरा बुलक जाथे ताहन सब  पछ्ताथे
पहली ले जानबूझ के अपने मन पछवाथे
दूसरा के तरक्की देख आगी अंगरा हो जथे
भाई हा भाई संग आजकल झगरा हो जथे
पर के झोली म दुःख पीरा डारे के फेर मा
सिरतोन अपने चैन अऊ सुख हा बिदरगे

कोन्हों काकरो अब हियाव नई करय
अब्बड़ भटके ल लागथे अपनेच हक़ बर
आजकल कोन्हो सही नियाव नई करय
अपन सुवारथ के सब रोटी सेंक लेथे
पंच परमेश्वर मन घलो ईमान बेच देथे
सब इहाँ पइसा वाला के रसूख ल डरगे

सुमत के ककरो घर आगी नई सिपचय
काकरो मन मा सतकरम नई उपजय
मनखे के हिरदे म सदभाव के अकाल
सब एक दूसर ल अपन बैरी मानथे 
सब कोई ल एक दूसरा ले जलन हे
सबके बुद्धि मा मानो राख़ हा परगे

बहिनी करा राखी बंधवईय्या कतको
बेटा बर सुन्दर बहू मंगईय्या कतको
इहाँ तो मिलथे भेदभाव करईय्या कतको
फोकटे फोकट काँव काँव करईय्या कतको
नवकन्या भोज बर नोनी खोंजईया भुलागे
के ओकर बेटी ओकरे सेती कोख मा मरगे

गरीब ल तो सबो मिल के चपकत हे
पइसा के गुमान म अमीर हा मटकत हे
पेट के खातिर कोनो ऐती ओती भटकत हे
अइसन दुःख कतको फाँसी मा लटकत हे
बड़े आदमी रोज अन्न के बरबादी करथे
नई देखय कभु के कोन आज भूख मा मरगे

रचना- देवेन्द्र ध्रुव
(फुटहा करम)  बेलर 
जिला- गरियाबंद (छ.ग.)

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