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Thursday, 7 July 2016

"का इही हमर गांव हे "

उघरा परे संस्कीरति 
उजरे परे ठाँव हे ।
  देख तो भाई मंगलू 
   का इही हमर गाँव हे ।।..२
कँहा गे रे भाई ..
वो बर रुख के छाँव हा ,
   भांय -भांय लागत हे
     मोर मयारू गाँव हा ..२
सोनहा बिहान जिन्हा २लछमी के पाँव हे ....देख तो भाई ....
सुरता हा आवत हे
ननपन के संगी
   हांसी -खुसी जिनगी चले
    रहय कतको तंगी ।।...२
सबो जिनिस होगे हे २ तभो हाँव -हांव हे ....देख तो भाई मंगलू....
एक महीना आगू
  नंगारा ह बाजे
    लइका -सियान जम्मों
      गुड़ी भीतरी नांचे ।।...२
परे हे नंगारा बाजे ..२ डीजे काँव काँव हे ...देख तो भाई ....
डंडा -रहस खोर गली में
जेती-देखो तेती
   संउहत बिरीज लागे
     गाँव चारो कोती ।।...२
गाय -गरु ,दूध -दही नइये २ भाठी म पाँव हे ...देख तो भाई....
का ठेठरी, का खुरमी
अईरसा हे राजा ,
   मीठ नूनछुर ,आनी - बानी
     रंग -रंग के खाजा ।।...२
मुहु मन म पानी आवय...२ लागे खांव -खांव हे।।...देख तो भाई...
संगी जहुंरिया के,
हांसी -ठिठोली
  रस घोरे भौजी के
    बानी मीठ बोली ।।...२
सरग सही लागे गाँव २ उल्टा परे दांव हे ।।....देख तो भाई ....
चार -तेंदु ,आमा मौरे
लट-झूमर लागे
    परसा के फ़ुलवा के
      रँग सूंदर लागे ।।२....
रुखराई ,ठुठवा परे..२ जंगल बस नाँव हे ।।..देख तो भाई....
गाँव भर म ,नता होवे
बबा ,कका, काकी
   सुख -दुख म खड़ा होवें
      उही हमर साथी ..।।
भाई चारा बख्ठी परे...२इरखा भारी पाँव हे।।
देख तो भाई ....

रचना -धनराज साहू
बागबाहरा

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