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Sunday, 17 July 2016

गजल ए हबीब समर


इस तरहा आप मुझको ,
रुसवा न कीजिये ...
औरो से अपने इश्क का ,
  चर्चा न कीजिये ।।...
करना ही है ,गर यूँ ही तो ...
ऐसा ही कीजिये ..
कर दीजिये फ़ना ,
मगर शोहरा न कीजिये ...
इससे हमारे प्यार को ...
रूसवाइयां मिलेगी ,
दिल -दिल से लगे रहने दो ..
तन्हा न कीजिये।।...
फिर दर्द ,दिल में उट्ठेगा ...
गर होगा ये जुदा ...
फिर खुद भी ,तड़प जाओगे..
ऐसा न कीजिये।।...
तड़पा रहा है ,दर्द
मेरे दिल को ऐ समर ,
अब आप और ,दर्दे दिल पैदा न कीजिये।

हबीब "समर "
                     बागबाहरा

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