सरकार
मुक्तक -
" कइसे ये सरकार हे जी
कइसे ये सरकार ...म
जनता के जो काम न आये ,
समझो हे बेकार ......।।"
कइसे ये सरकार ...म
जनता के जो काम न आये ,
समझो हे बेकार ......।।"
कइसे होगे रे सरकार
जे आथे .....होथे लचार...
देखो का होही ....२
१
भूख ,गरीबी ,मंहगाई म
सोन चिरईया ,फंदागे हे ।
रक्छा करईया सुरसा होगिन,
मानवता हा,नंदागे हे ।।
संसद होगे ,तारे -तार ...
संत्री -मंत्री ,दागदार ...सोचो का होही
जे आथे .....होथे लचार...
देखो का होही ....२
१
भूख ,गरीबी ,मंहगाई म
सोन चिरईया ,फंदागे हे ।
रक्छा करईया सुरसा होगिन,
मानवता हा,नंदागे हे ।।
संसद होगे ,तारे -तार ...
संत्री -मंत्री ,दागदार ...सोचो का होही
२
नीति -नियम के,सोर नइये ..
मन -मरजी ,चलात हे ।
जेहर पाथे ,तेहर दुहथे ...
धारे - धार बोहात हे ...।।
जिहा जनता हे बीमार ...
जिहा भरे परे गद्दार ...सोचो का होही ।।
नीति -नियम के,सोर नइये ..
मन -मरजी ,चलात हे ।
जेहर पाथे ,तेहर दुहथे ...
धारे - धार बोहात हे ...।।
जिहा जनता हे बीमार ...
जिहा भरे परे गद्दार ...सोचो का होही ।।
३
फोकटाहा माल ,खवैया होगिन
मिहनत ले जी चुरात हे ...।
मंद -मऊहा के फेर म परके,
खेत -खार हा बेचात हे ...।।
राईट होगे हे मतवार ....
घर के होगे ,बंटाधार ...सोचो का होही ।।
फोकटाहा माल ,खवैया होगिन
मिहनत ले जी चुरात हे ...।
मंद -मऊहा के फेर म परके,
खेत -खार हा बेचात हे ...।।
राईट होगे हे मतवार ....
घर के होगे ,बंटाधार ...सोचो का होही ।।
४
कोंन हा आही ,किसना बनके
दुस्ट कंस ल मारे बर ...।
कोंन ह बनही राम इंहा के ..
दुखी प्रजा ल तारे बर ...।।
जिहा सोच म बेभिचार ....
नइये कोनो ल दरकार ...
देखो का होही ...सोचो का होही..।।
कोंन हा आही ,किसना बनके
दुस्ट कंस ल मारे बर ...।
कोंन ह बनही राम इंहा के ..
दुखी प्रजा ल तारे बर ...।।
जिहा सोच म बेभिचार ....
नइये कोनो ल दरकार ...
देखो का होही ...सोचो का होही..।।
रचना -धनराज साहू
बागबाहरा
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