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Thursday, 7 July 2016

"मैं भूला हूं"

मैं भूला हूं
हां, कुछ तो भूला हूं

क्या भूला यह लापता
पर भूला हूं
हां, कुछ तो भूला हूं

इस धरा पर आकर
नाम व रूप पाकर
रिश्तों का बाग सजाकर
मस्त गृहस्थ बन झूला हूं
मैं भूला हूं

मैं कौन हूं, और हूं कहां
आया कहां से, जाना कहां
सच ये जहां, या वो जहां
या दोनों जहां में घूला हूं
मै भूला हूं

जग सम्पूर्ण खंगाला हूं
आनंद-शांति से दिवाला हूं
अब काल का निवाला हूं
फिर भी मोह में फूला हूं
मैं भूला हूं

अब ढूंढ रहा हूं मधुशाला
जहां बहे प्रेम सागर-हाला
पीकर बन जाऊं मतवाला
किंतु साकी बिन लूला हूं
मैं भूला हूं 
                
अब खुद को मैं जानूंगा
साक्षात्कार को ठानूंगा
जप-तप-योग मैं तानूंगा
अब समाधि मे जाने को तूला हूं

तन-मन अर्पण गुरू चरणों में
सर्वस्व समर्पण गुरू चरणों में
अहं का तर्पण गुरू चरणों में
दया कर दया निधान
कृपा कर कृपा निधान
अब भव-बंध से खूला हूं
मैं भूला हूं

मैं भूला हूं
हां, कुछ तो भूला हूं....

रचना:- ललित वर्मा
ग्राम-छुरा
जिला- गरियाबंद (छ.ग.)

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