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Saturday, 16 July 2016

"मन भा गे रे असाढ़"

झमा-झम गिरत हे पानी
नरवा-नदिया मे आ गे बाढ़
पऊर सबला तै बड़ ठगे रेहे
एसो के मन भा गे रे असाढ़

हरियर-हरियर सब खेत खार
लहकत हे डोली अऊ कछार
सुरुर-सुरुर जुड़ हवा चलत हे
बेंगवा कहात हे आ गे रे असाढ़

छानी, अंगना अऊ रद्दा धोआगे
चुक-चुक ले होगे डोंगर-पहाड़
रुख-राई सब झुमरत डोलत हे
एसो तै गरज के आये रे असाढ़

चिरई चिरगुन के पियास बुतागे
अऊ भुईंया के घलो मन गे माढ़
सब मनखे के अब जीव थिरागे
तै बड़ गजब के आये रे असाढ़

मोर मया के सुरता आवत हे
जबले देखेंव रिमझिम फुहार
तोरे कस लचकत मिले आवय
थोरकिन पतिया ना रे असाढ़

तोर आय ले सब फुदकत हावे
झन करबे तै एको पईत आड़
तै दुनिया परकिरती के सिंगार
किसान के मितान तिही रे असाढ़

ललित साहू "जख्मी"  ग्राम-छुरा
जिला- गरियाबंद ( छ.ग.)

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